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Wednesday, September 2, 2009

आँख मिलते ही बाहम छा गई - दाग़

आँख मिलते ही बाहम छा गई हैरानियाँ,
आईने की शक्ल याँ,आलम वहाँ तस्वीर का।

हाए वो दिन हो के वो दिल थाम कर तुझसे कहे ,
हाए जालिम तेरा नालाँ भी है किस तासीर का ।

Sunday, August 16, 2009

अदू को देख कर-दाग़ देहलवी

अदू को देख कर आंखों में अपनी खूँ उतरा,
वो समझे बादा-ए-गुल-रंग का सुरूर आया।

क़सम भी वो कभी क़ुरान की नहीं खाते ,
ये रश्क है उन्हें क्यूं इसमें ज़िक्र-ए-हूर आया।

दाग़ देहलवी

पड़ा है बल जबीं पर , क्या सबब क्या वजह क्या बाईस?
हुआ क्यूं तेज़ खंजर ,क्या सबब? क्या वजह? क्या बाईस?

कहा अगर हमने हरजाई तो तुमने क्यों बुरा माना?
फिर करते हो दिन भर, क्या सबब?क्या वजह ? क्या बाईस?

इशारों में हुईं थीं मुझसे उनसे कुछ बातें,
यही चर्चा है घर घर , क्या सबब ? क्या वजह ? क्या बाईस?

Thursday, August 13, 2009

लुत्फ़-ऐ-मय- दाग़ देहलवी

लुत्फ़ -ए-मय तुझसे क्या कहूं ज़ाहिद,
हाए कमबख्त तूने पी ही नहीं!!

उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से,
कभी गोया किसी में थी ही नहीं।

'दाग' क्यों तुमको बेवफ़ा कहता ,
वह शिकायत का आदमी ही नहीं।

Wednesday, August 12, 2009

दाग़ देहलवी

यूँ चलिए राह-ए-शौक़ में ऐसे हवा चले,
हम बैठ बैठकर जो चले भी तो क्या चले।

बैठे उदास उठे परेशाँ ख़फ़ा चले,
पूछे तो कोई आपसे,क्या आए थे क्या चले ?

बैठा है ऐतकाफ़ में ए दाग़-ए-रोज़ादार
ऐ काश! मैकदे को ये मर्द-ए-खुदा चले।