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Wednesday, January 22, 2014

sayyad

صياد  : أردو

س +يا +د

Sayyad (हिंदी : सय्याद ) Means a hunter or a bird catcher , one who uses a net to catch birds.
The word has been used prolifically in popular hindi (bolliwood) songs and in urdu poetry as well. 

Tuesday, January 21, 2014

Buniyaad kuchh to ho


Ku-e-sitam ki khamoshi aabad kuchh to ho
kuchh to kaho sitam kashon, Fariyaad kuchh to ho.

Bedad gar se shikwa, Bedad kuchh to ho,
bolo to , shor-e-hashr ki , aijad kuchh to ho.


Marane chale to satwat-e-qatil ka khouf kya,
Itna to hoke bandhne paye na dast-o-pa

Maqtal main kuchh to rang jame jashn-e-raqs ka
rang-e-lahoo se panjaa-e-sayyad kuchh to ho

Khoon par gawah daman-e-jallad kuchh to ho
jab khoon baha , talab karen, buniyaad kuchh to ho. 

Gar tan nahin, Zubaan sahi, Aazad kuchh to ho
Dushnaam naala ha o hu, Fariyaad kuchh to ho.

Cheekhe hai dard-e-dil-e-barbaad kuchh to ho
Bolo to shor-e-hashra ki ijaad kuchh to ho.

Bolo ki roz-e-adal ki buniyaad kuchh to ho.

 

"Buniyad kuchh to ho"- written by Faiz ahmed Faiz. 

Saturday, September 11, 2010

Faiz



Subah footi to Aasman pe tere,
Rag-e-rukhsaar ki fuhaar giri
Raat chhai to ru-e-alam par,
teri zulfon ki aabshar giri.

Tuesday, September 8, 2009

कभी कभी याद में उभरते हैं- फ़ैज़

कभी कभी याद में उभरते हैं नक़्श-ए-माज़ी
मिटे मिटे से
वो आज़माइश दिल-ओ-नज़र की, वो कुर्बतें सी, वो फासले से

कभी कभी आरजू के सेहरा में,आ के रुकते हैं क़ाफ़िले से

वो सारी बातें लगाव की सी, वो सारे अन्वां विसाल के से

निगाह-ओ-दिल को क़रार कैसा , निशात-ओ-ग़म में कमी कहाँ की

वो जब मिले हैं तो उन से, हर बार की है उल्फ़त नए सिरे से

बहुत गिरां है ये ऐश-ए-तन्हाई , कहीं सबक तर , कहीं गवारा

वो दर्द-ए-पिन्हाँ के सारी दुनिया रफ़ीक़ थी वास्ते से

तुम्ही कहो रिंद-ओ-महतसब में है आज सब को न फ़र्क़ ऐसा

ये आ के बैठे हैं मैकदे में , वो उठ के आए हैं मैकदे से .

Thursday, September 3, 2009

"वहीं है " दिल कराइन तमाम कहते हैं-फ़ैज़

वहीं है दिल, कराइन तमाम कहते हैं
वो एक ख़लिश के जिसे तेरा नाम कहते हैं

तुम आ रही हो के बजती हैं मेरी जंजीरें
न जाने क्या मेरे दीवार-ओ-बाम कहते हैं

यही किनार-ए-फ़लक का सियाह्तरीन गोशा
यही है मतला-ए-माह-ए-तमाम , कहते हैं

पियो के मुफ्त लगा दी गई है खून-ए-दिल की कसीर
गिरां है के अब के मय लाल फ़ाम कहते हैं

फ़कीह शहर से मय का जवाज़ क्या पूछें
के चांदनी को भी हज़रत हराम कहते हैं

नवा-ए-मुर्ग़ को कहते हैं अब ज़ियाँ-ए-चमन
खिले न फूल उसे इंतिज़ाम कहते हैं

कहो तो हम भी चलें फ़ैज़ अब नहीं सर-ए-दार
फर्क-ए-मर्तबा ख़ास-ओ-आम कहते हैं

Monday, August 24, 2009

क्या करें- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मेरी तेरी निगाह में
जो लाख इंतज़ार हैं
जो मेरे तेरे तन बदन में
लाख दिल फ़िगार हैं
जो मेरी तेरी उँगलियों की बेहिसी से
सब क़लम नज़ार हैं
जो मेरे तेरे शहर की
हर गली में
मेरे तेरे नक़्श-ए-पा के बेनिशाँ मज़ार हैं
जो मेरी तेरी रात के
सितारे ज़ख्म ज़ख्म हैं
जो मेरी तेरी सुबह के
गुलाब चाक चाक हैं
ये ज़ख्म सारे बे दवा
ये चाक सारे बे रफू
किसी पे राख चाँद की
किसी पे ओस का लहू
ये है भी नहीं,बता ?
ये है के महज़ जाल है
मेरे तुम्हारे इनक्बूत-ए-वहम का बुना हुआ
जो है तो इसका क्या करें
नहीं,है तो भी क्या करें
बता, बता
बता,बता

Sunday, August 23, 2009

तीरगी जाल है और भाला है नूर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

तीरगी जाल है और भाला है नूर,
एक शिकारी है दिन, एक शिकारी है रात ,
जग समन्दर है जिस में किनारे से दूर,
मछलियों की तरह इब्न-ए-आदम की ज़ात,
जग समन्दर है,साहिल पे हैं माही गीर ,
जाल थामे ,कोई भाला लिए,
मेरी बारी कब आएगी,क्या जानिए,
दिन के भाले से मुझको करेंगे शिकार,
रात के जाल में या करेंगे असीर

Friday, August 21, 2009

मंज़िलें मंज़िलें - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मंज़िलें मंज़िलें,
शौक़-ए-दीदार की मंज़िलें,
हुस्न-ए-दिलदार की मंज़िलें,प्यार की मंज़िलें,
प्यार की बेपनाह रात की मंज़िलें,
कह्कशानों की बारातकी मंज़िलें,
सब्र बुलंदी की, हिम्मत की, परवाज़ की,
जोश-ए-परवाज़ की मंज़िलें
राज़ की मंज़िलें

जिंदगी की कठिन राह की मंज़िलें,
सब्र बुलंदी की, हिम्मत की, परवाज़ की मंज़िलें,
जोश-ए-परवाज़ की मंज़िलें,
राज़ की मंज़िलें

आज मिलने के दिन,
फूल खिलने के दिन,
वक़्त के घोर सागर में सुबह की ,
शाम की मंज़िलें ,
चाह की मंज़िलें, आस की,
प्यार की मंज़िलें।
हसरत-ए-यार की,
प्यार की मंज़िलें,
मंज़िलें हुस्न-ए-अलम के गुलनार की,
मंज़िलें, मंज़िलें।

Tuesday, August 18, 2009

सारे सुख़न हमारे- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम ने सब शेर में सँवारे थे,
हम से जितने सुख़न तुम्हारे थे।

रंग-ओ-खुशबू के हुस्न-ओ-खूबी के,
तुम से जितने इस्तिआरे थे।

तेरे क़ौल-ओ-क़रार से पहले ,
अपने कुछ और भी सहारे थे।

जब वोह लअलगुहर हिसाब किए,
जो तेरे गम ने दिल पे वारे थे।

मेरे दामन आ गिरे सारे,
जितने तश्त-ऐ-फलक में तारे थे।

उम्र जावेद की दुआ करते,
फ़ैज़ इतने वो कब हमारे थे।


बासठ्वीं सालगिरह पर - "तुम ही कहो "- फ़ैज़

जब दुःख की नदिया में हम ने,जीवन की नाव डाली थी,
था कितना कस बल बाहों में, लोहों में कितनी लाली थी।

यूँ लगता था, दो हाथ लगे और नाव पूरम पार चली,
ऐसा न हुआ , हर धारे में कुछ अनदेखी मझधारें थीं,
कुछ मांझी थे अनजान बहुत,
कुछ बे परखीं पतवारें थीं,
अब जो भी चाहो छान करो,
अब जितना चाहो दोष धरो,
नदिया तो वही है नाव वही,
अब तुम ही कहो क्या करना है,
अब कैसे पार उतरना है।

जब अपनी छाती में हम ने,
उस देस के घाव देखे थे,
था वेदों पर विश्वास बहुत,
और याद बहुत से नुस्खे थे ,
यूँ लगता था बस कुछ दिन में ,
सारी बिपदा कट जायेगी,
और सब घाव भर जाएंगे,
ऐसा न हुआ की रोग अपने ,
कुछ इतने ढेर पुराने थे,
वेद उनकी टोह को पा न सके,
और टोटके सब बेकार गए,
अब जो भी चाहो छान करो,
अब जितना चाहो दोष धरो ,
छाती तो वही है,
घाव वही,
अब तुम ही कहो क्या करना है,
ये घाव कैसे भरना है।



Monday, August 17, 2009

कब तक दिल की खैर मनाएं-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

कब तक दिल की खैर मनाएं, कब तक रह दिखलावेंगे
कब तक चमन की मोहलत दोगे,कब तक याद न आओगे

बीता दीद उम्मीद का मौसम, खाक उड़ती है आंखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल, कब बरखा बरसाओगे

अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो
अपने बस की बात ही क्या है,हम से क्या मन्वाओगे

किस ने वस्ल का सूरज देखा , किस पर हिज्र की रात ढली
गेसुओं वाले कौन थे क्या थे, उन को क्या जतलाओगे

फ़ैज़ दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी,
तुम उस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर , कितने दिन इतराओगे ?




Saturday, August 15, 2009

दर्द जी रात ढल चली है-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बात बस से निकल चली है,
दिल की हालत सम्हाल चली है।

अब जूनून हद से बढ़ चला है,
अब तबीयत सम्हल चली है।

अश्क खूनाब हो चले हैं,
गम की रंगत बदल चली है।

लाख पैगाम हो गए हैं,
जब सबा इक पल चली है।

जाओ, अब सो रहो सितारों,
दर्द की रात ढल चली है।

Tuesday, August 11, 2009

दिल-ए-मन मुसाफिर-ए-मन - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

मेरे दिल,मेरे मुसाफिर,
हुआ फिरसे हुक्म सादिर ,
के वतन बदर हों हम तुम

दें गली गली सदाएं,
करें रुख नगर नगर का,
के सुराग़ कोई पाएं,
किसी यार-ए-नामाबर का।

हर एक अजनबी से पूछें,
जो पता था अपने घर का,
सर-ए-कूए नाशेनायाँ ,
हमें दिन से रात करना।

कभी इस से बात करना,
कभी उस से बात करना,
तुम्हें क्या कहूं की क्या है,
शब् ए ग़म बुरी बला है।

हमें ये भी था गनीमत,
जो कोई शुमार होता,
हमें क्या बुरा था मरना,
अगर एक बार होता।

फ़ैज़

हिम्मत-ए-इल्तजा नहीं बाक़ी,
सब्त का हौसला नहीं बाक़ी।

इक तेरी दीद छीन गई मुझ से,
वरना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी।

अपनी मश्क़-ए-सितम से हाथ न खेंच,
मै नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी।

तेरी चश्म-ए-आलम नवाज़ की खैर,
दिल में कोई गिला नहीं बाक़ी।

हो चुका ख़त्म अहद-ए-हिज्र-ओ-विसाल,
जिंदगी में मज़ा नहीं बाक़ी।

Wednesday, July 15, 2009

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढ्ता फिरता है ख़याल - फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल,
मध् भरा हर्फ़ कोई , ज़हर भरा हर्फ़ कोई।
दिलनशीं हर्फ़ कोई , क़हर भरा हर्फ़ कोई,
हर्फ़-ए-उल्फत कोई दिलदार नज़र हो जैसे,
जिससे मिलती है नज़र बोसा-ए-लब की सूरत,
इतना रोशन के सर-ए-मौज-ए-ज़रहो जैसे।
सोहबत-ए-यार में आगाज़-ए-तरफ़ की सूरत,
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-गज़ब हो जैसे
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।
ता अबद शहर-ए-सितम जिससे तबाह हो जाएँ ,
इतना तारीक़के शमशान की शब् हो जैसे,
लब पे लाऊँ तो मेरे होंठ स्याह हो जाएँ।
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।


Tuesday, July 14, 2009

शाम-ए-फ़राक - फैज़

शाम-ए-फराक़ 'अब न पूछ' आई और आके ढल गई ,
दिल था के फ़िर बहल गया जाँ थी के फिर सम्हल गई।
बज्म-ए-ख़याल में तेरे हुस्न की शम्में जल गई ,
दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई।
जब तुझे याद कर लिया सुबह महक महक उठी,
जब तेरा गम जला लिया , रात मचल मचल गई।
दिल से तो हर मआमूल करके चले थे साफ़ हम,
कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई।
आखिर-ए-शब् के हम सफर 'फैज़' न जाने क्या हुए,
रह गई कसजग सबा, सुबह किधर निकल गई.

शाख़ पर खून-ए-गुल - फ़ैज़

शाख़ पर खून-ए-गुल रवां है वही ,
शोखी-ए-रंग-ए-गुलिस्तान है वही।
सर वही है तो आस्तां है वही,
जाँ वही है तो जानेजाँ है वही।
बर्क़ सौ बार गिर के खाक हुई,
रौनक़-ए-खाक-ए-आशियाँ है वही।
आज की शब् वस्ल की शब् है,
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही।
चाँद तारे इधर नहीं आते,
वरना ज़िन्दाँ में आसमाँ है वही.

Monday, July 13, 2009

तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं - फैज़

तुम ये कहते हो वो जंग हो भी चुकी!

जिस में रखा नहीं है किसी ने क़दम

कोई उतरा न मैदान में दुश्मन न हम

कोई सफ बन न पाई न कोई अलम

मन्त्षर दोस्तों को सदा दे सका

अजनबी दुश्मनों का पता दे सका

तुम ये कहते वो जंग हो भी चुकी।

जिसमें रखा नहीं है हम ने अब तक क़दम ,

तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं,

जिस्म खस्ता है हाथों में यारा नहीं।



अपने बस का नहीं बार-ए-संग-ए-सितम,

बार-ए-संग-ए-सितम,बार-ए-कह्सार-ए-अनम,





ग़ज़ल-फैज़

कब ठहरेगा दर्द-ऐ-दिल कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी।

कब जान लहू होगी,कब अश्क गोहर होगा,
किस दिन तेरी सुनवाई ऐ दीदः -ऐ-तर होगी।

कब महकेगी फ़स्ल-ऐ-गुल कब बहकेगा मैखाना,
कब सुबह-ऐ-सुखन होगी,कब शाम-ऐ-नज़र होगी।

कब तक अब राह देखें ऐ क़ामत-ऐ-जानाना ,
कब हश्र मुआइन है,तुझको तो ख़बर होगी।

वाइज़ है न ज़ाहिद है, नासेह है न क़ातिल है,
अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी.