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Tuesday, January 21, 2014

Aitbar

तेरे  वादे पर जिए हम तो ये जान झूठ जानां
के ख़ुशी से मर न जाते , अगर ऐतबार होता

  I remembered this couplet from Ghalib, out of blue and i thought of his wonderful poetry.
I first heard Mirza Ghalib through Jagjeet Singh and we sang him like crazy, day and night, and it was not because i could understand the poetry but only because of the compositions.
Now after 20 years when i am 37 years of age and have been through some of the bad and good phases of life, i realize the poetry and understand it.As  the great Leonard Cohen says "One has to close himself to world sometime. The heart , it opens and closes and opens again, one can't trust his or her heart" and i know that my heart did closed and opened many times in so many years and it keeps doing the same everyday.
The loss of love,friendship and aspirations, the daily grind , made me understand the beauty of poetry and now i smile like everyone else when he realizes that "Yes, I have felt that way".

Lets learn how to write Eitbaar (हिंदी- ऐतबार ): أردو

أعتبر 

اي+ ت +ب  ا +ر





 

Friday, August 21, 2009

ज़ुल्मतकदे में मेरे शब्-ए-गम - ग़ालिब

ज़ुल्मतकदे में मेरे,शब्-ए-गम का जोश है,
इक शम्मा है दलील-ए-सहर, सो खामोश है।

न मुज़्दा-ए-विसाल न नज़ारा-ए-जमाल,
मुद्दत हुई की आस्तीं-ए-चश्म-ओ-गोश है।

मैंने किया है हुस्न-ए-खुद्दार को बे हिजाब ,
ऐ शौक़ याँ इजाज़त-ए-तस्लीम-ए-होश है।

गौहर को इक़्द-ए-गर्दन -ए-खुबाँमें देखना,
क्या औज पर सितारा-ए-गौहरफ़रोश है।

दीदार ,वादा , हौला, साक़ी निगाह-ए-मस्त,
बज़्म-ए-ख़याल मैक़दा-ए-बेखरोश है।

दाग़-ए-फिराक़-ए-सोहबत-ए-शब् की जली हुई,
इस शम्मा रह गई है सो वो भी खामोश है।

आते हैं गैब से ये मज़ामीं ख्याल में,
गालिब, सरीर-ए-खामाँ नवा-ए-सरोश है.

Sunday, August 9, 2009

ग़ालिब-ग़ज़ल

कुञ्ज में बैठा रहूँ,यूँ पर खुला,काश के होता क़फ़स का दर खुला,

'हम पुकारें और खुले' यूँ कौन जाए? यार का दरवाज़ा पावें गर,खुला।

हम को है इस राज़दारी पर घमंड, दोस्त का है राज़ दुश्मन पर खुला।

वाकई दिल पर भला लगता था दाग़,ज़ख्म लेकिन दाग़ से बेहतर,खुला।

सोज़-ए-दिल का क्या कहें बाराँ-ए-अश्क, आग भड़की मुहँ अगर दम भर खुला ।

नामे के साथ आ गया पैगाम-ए-मर्ग ,रह गया ख़त मेरी छाती पर खुला।


देखियो ग़ालिब से गर उलझा कोई ,
है वली पोशीदः और काफ़िंर, खुला .


Monday, July 27, 2009

ग़ालिब

'आइना देख' अपना सा मुंह ले के रह गए,
साहब को दिल न देने पे कितना गुरूर था,
क़ासिद को अपने हाथ से गर्दन न मारिये,
उसकी खता नहीं है ये मेरा क़सूर था।

ग़ालिब

दोस्त' गम्ख्वारी में मेरी सअइ फरमाएंगे क्या?
ज़ख्म के भरने तलक,नाखून न बढ़ जायेंगे क्या?

बेनयाज़ी हद से गुज़री "बन्दापरवर "कब तलक?
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फरमाएंगे - क्या?

हज़रात-ए-नासेह गर आवें,दीद-ओ-दिल फर्श-ए-राह,
कोई मुझ को ये तो समझा दो,के समझावेंगे क्या?

आज वां तेग़-ओ-कफ़न बांधे हुए जाता हूँ मै
अज़र मेरे क़त्ल करने में वोह अब लावेंगे क्या?

गर किया नासेह ने हम की कैद 'अच्छा' यूँ सही,
ये जूनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छूट जावेंगे क्या?

खानजाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों?
हैं गिरफ्तार-ए-वफ़ा ,ज़िन्दाँ से घबराएँगे क्या?


है अब इस म'अमूर में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फत 'असद',
हम ने ये माना "दिल्ली में रहें " - खायेंगे क्या?

Wednesday, June 17, 2009

क्यों कर उस बुत से रखूँ-ग़ालिब

क्यों कर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ ,
क्या नहीं है मुझे इमान अज़ीज़,
दिल से निकला,पे न निकला दिल से,
है तेरे तीर का पैकान अज़ीज़,

ताब लाए' ही बनेगी ग़ालिब,
वक़्त सख्त है और जान अज़ीज़।

पैकान: नोक(तीर या तलवार की)
ताब: शक्ती,सामर्थ्य,धैर्य,इज्ज़त।
अज़ीज़-प्यार।

गोया एक ही बादशाह के-ग़ालिब

गोया एक ही बादशाह के सब खानजाद हैं ,
दरबारदार लोग बहम आशना नहीं,
कानों पे हाथ धरते हैं करते हुए सलाम,
इससे है ये मुराद के हम आशना नहीं।

Tuesday, June 16, 2009

हर एक बात पे-ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम के " तू क्या है"?
तुम्ही कहो के ये अंदाज़-ऐ-गुफ्तगू क्या है?

न शअल में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा,
कोई बताओ के वोह शोख़-ऐ-तुंदखूँ क्या है?

ये रश्क है के वोह होता है हमसुखन तुम से,
वगरना खौफ़-ऐ-बद आमोज़ी-ऐ-अदू क्या है।

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाज़त-ऐ-रफू क्या है।

जला है जिस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा!
कुरेदते हो जो अब राख जूस्तजू क्या है?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?

वोह चीज़,जिस के लिए हमको हो बहशत अज़ीज़,
सिवाए बादः-ऐ-गुलफ़ाम-ऐ-मुश्क बू ,क्या है?

पियूं शराब,अगर खुम भी देख लूँ दो चार,
शीशा-ओ-करह-ओ-कोजः-ओ-सबू क्या है?

रही न ताक़त-ऐ-गुफ्तार,और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है!

हुआ है "शाह का मुसाहिब",फिरे है इतराता,
वगरना शहर में ग़ालिब तेरी आबरू क्या है?

बर्क़-बिजली
शोख़-चंचल,चपल।
बद आमोज़ी-अशिक्षा,कुशिक्षा।
बादः-शराब।
गुलफ़ाम-गुलाबी,खूबसूरत फूल।
मुश्कबू-कस्तूरी की महक।
कदह-जाम,प्याला।
सबू-घडा(शराब का )।
खुम-गागर,पीपा(शराब जिसमें रखी जाती है)


Monday, June 15, 2009

ग़ालिब

उग रहा है दर-ओ-दीवार से सब्ज़ाह ग़ालिब!
हम बयाबाँमें है और घर में बहार आई है.

Sunday, June 14, 2009

ग़ज़ल - ग़ालिब

कोई उम्मीद बेर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती।

मौत का एक दिन मुईन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती।

आगे आती थी हाल-ऐ-दिल पे हंसी,अब किसी बात पर नहीं आती।

जानता हूँ सवाब-ऐ-ताअत ओ ज़हद,पर तबीयत इधर नहीं आती।

है कुछ ऐसी ही बात के चुप हूँ,वरना क्या बात करनी नहीं आती?

क्यों न चीखूं के याद करते हैं, मेरी आवाज़ गर नहीं आती।


मरते हैं आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती।

क़ाबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब ! शर्म तुमको मगर नहीं आती।

ग़ज़ल- ग़ालिब

कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है,
अपने जी में हमने ठानी और है।

आतिश-ए-दोज़ख में ये गर्मी कहाँ?
सोज़-ए-ग़म हाए नेहानीऔर है।

बारहा देखी हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है।

दे के ख़त मुंह देखता है नामावर,
कुछ तो पैगाम-ऐ-जुबानी और है।

हो चुकीं ग़ालिब बलाएँ सब तमाम,
एक मार्ग-ऐ-ना गहानी और है।

Friday, May 15, 2009

रहिये अब ऐसी जगह-ग़ालिब

रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो,
हम सुखन कोई न हो और हम ज़बां कोई न हो।

बे दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए,
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।

पड़िये गर बीमार तो कोई न हो बीमार दार,
और अगर मर जाएँ तो नोचख्वां कोई न हो।


Thursday, May 14, 2009

गई वो बात के - ग़ालिब

गयी वोह बात के हो गुफ्तगू "तो क्यों कर हो"
कहे से कुछ न हुआ , फिर हो ,तो क्यों कर हो ?

हमारे ज़हन में इस फ़िक्र का है नाम विसाल ,
के गरन हो तो कहाँ जाएँ, हो तो क्यों कर हो?

अदब है और यही कशमकश तो क्या कीजे,
हया है और यही गोमगो तो क्यों कर हो?

तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का,
बुतों की हो अगर ऐसी ही खु तो क्यों कर हो?

उलझते हो तुम अगर देखते हो आइना,
जो तुम से शहर में हों एक,दो,तो क्यों कर हो?

जिसे नसीब हो रोज़-ऐ-स्याह मेरा सा
वो शख्स दिन न कहे रात को,तो क्यों कर हो?

हमें फिर उन से उम्मीद, और उन्हें हमारी क़द्र!
हमारी बात ही पूछें न वो तो क्यों कर हो?

गल्त न था हमें ख़त पर गुमाँ तसल्ली का,
न माने दीद-ओ-दीदार जो, तो क्यों कर हो?

मुझे जुनूँ नहीं ग़ालिब! वले बकौल-ऐ-हुज़ूर,
फिराक-ऐ-यार में तस्कीँ हो,तो क्यों कर हो?

मेहरबां हो के-ग़ालिब

मेहरबां हो के बुला लो मुझे,चाहो जिस वक़्त,
मै गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूं ।

दअफ़ में ताना-ग़यारक्या शिकवा क्या है?
बात कुछ सर तो नहीं है के उठा भी न सकूं

ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर ! वरना
क्या क़सम है तेरे मिलने की के खा भी न सकूं ।

Tuesday, May 12, 2009

ग़ालिब

दाइम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मै,
खाक ऐसी जिंदगी पे के पत्थर नहीं हूँ मै ।

क्यों गर्दिश-ऐ-मुद्दाम से घबरा न जाए दिल ?
इंसान हूँ,प्याला-ओ-सागर नहीं हूँ मै।

या रब! ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए?
लोह-ऐ-जहाँ पे हर्फ़-ऐ-मुकद्दर नहीं हूँ मै।

हद चाहिए सज़ा में अकूबत के वास्ते,
आख़िर गुनाहगार हूँ,काफिर नहीं हूँ मै।

किस वास्ते अज़ीज़ नहीं जानते मुझे,
लाल-ओ-ज़म्रद-ओ-ज़ेर-ओ-गौहर नहीं हूँ मै।

रखते हो तुम क़दम मेरी आंखों से क्यों दरेग़,
रुतबे में महरो माह से कमतर नहीं हूँ मै

करते हो मुझको मना क़दमबोस किस लिए?
क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मै?

ग़ालिब ! वज़ीफ़ख्वार हूँ ,दूँ शाह को दुआ,
वोह दिन गए के कहते थे " नौकर नहीं हूँ मै"

दाइम -हमेशा,निरंतर।
गर्दिश-ऐ-मुद्दाम-निरंतर बदकिस्मती।
हर्फ़-अक्षर,लिखा हुआ।
अकूबत-दर्द।
काफिर-नास्तिक,न मानने वाला।
ज़म्रद-पन्ना।
ज़ेर-सोना।
गौहर-मोती।
दरेग़-दूर जाना,पल्ला झाड़ना।
क़दमबोस-पैर चूमना।

Monday, December 8, 2008

ग़ालिब

गई वोह बात के हो गुफ्तगू तो क्यों कर हो
कहे से कुछ न हुआ " फिर कहो " -तो क्यों कर हो?
हमारे ज़हन में इस फिक्र का है नाम विसाल
के गर "न हो "तो कहाँ जाएँ " हो " - तो क्यों कर हो ?
अदब है और यही कशमकश तो क्या कीजिए ?
हया है और यही गो मगो- तो क्यों कर हो ?
तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का
बुतों की हवा गर ऐसी ही खु -तो क्यों कर हो?
उलझते हो तुम अगर देखे हो आइना
जो तुम से शहर में हों एक दो- तो क्यूँ कर हो?
जिसे नसीब हो रोज़ स्याह मेरा सा,
वोह शख्स दिन न कहे रात को- तो क्यों कर हो?
हमें फिर उन से उम्मीद और उन्हें हमारी क़द्र?
हमारी बात बात ही पूछें न वोह -तो क्यों कर हो ?
ग़लत न था ' हमें ख़त पर ' गुमानतसल्ली का
न माने ' दीद, दीदार जो ' -तो क्यों कर हो?
बताओ उस मशर को देख कर के मुझ को करार ,
ये नेश हो रग-ऐ-जान में फरो- तो क्यूँ कर हो?

मुझे जुनून नहीं ग़ालिब वले बकूल-ऐ-हज़रत
फिराक-ऐ-यार में तस्कीं हो तो- क्यूँ कर हो?