Showing posts with label मीर. Show all posts
Showing posts with label मीर. Show all posts

Friday, August 21, 2009

हर जी हयात का है- मीर

हर जी हयात का है, सबब जो हयात का,
निकले है जी उसी के लिए,कायनात का।

बिखरे हैं ज़ुल्फ़ उस रुख-ऐ-आलमफरोज़ पर,
वरना बनाव होवे न दिन और रात का।

उसके फ़रोग-ए-हुस्न से झलके है सब में नूर,
शम्म-ए-हरम हो या के दिया सोमनाथ का।

क्या मीर तुझ को नामासियाही की फ़िक्र है ?
ख़त्म-ए-रसूल सा शख्स है ज़ामिन निजात का।

Friday, August 14, 2009

मीर तक़ी मीर- दुनिया में हुस्न-ओ-खूबी

दुनिया में हुस्न-ओ-खूबी एक अजीब शै है,
रिन्दांपारसा याँ जिस पर रखें नज़र सब।