Monday, July 20, 2009

ज़ौक़

आदमी हो गर मुकद्दर क्या कसूर इदराक का,
खाक़ का पुतला है ये,कुछ तो असर हो खाक़ का।

मुकद्दर का मतलब है गन्दा ,घिनौना , जो साफ़ न रहता हो । ये शब्द मुक़द्दर से अलग है जिसका मतलब होता है भाग्य।

इदराक-ज्ञान,प्रतिभा,समझ.

ज़ौक़

जो कहोगे तुम, तो कहेंगे हम,हाँ यूँ ही सही,
आप की यूँही खुशी है,मेहरबान यूँ ही सही।
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हम हैं गुलाम उन के जो हैं वफ़ा के बन्दे,
इस को यकीन मानो गर हो खुदा के बन्दे।
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Wednesday, July 15, 2009

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढ्ता फिरता है ख़याल - फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल,
मध् भरा हर्फ़ कोई , ज़हर भरा हर्फ़ कोई।
दिलनशीं हर्फ़ कोई , क़हर भरा हर्फ़ कोई,
हर्फ़-ए-उल्फत कोई दिलदार नज़र हो जैसे,
जिससे मिलती है नज़र बोसा-ए-लब की सूरत,
इतना रोशन के सर-ए-मौज-ए-ज़रहो जैसे।
सोहबत-ए-यार में आगाज़-ए-तरफ़ की सूरत,
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-गज़ब हो जैसे
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।
ता अबद शहर-ए-सितम जिससे तबाह हो जाएँ ,
इतना तारीक़के शमशान की शब् हो जैसे,
लब पे लाऊँ तो मेरे होंठ स्याह हो जाएँ।
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।


Tuesday, July 14, 2009

शाम-ए-फ़राक - फैज़

शाम-ए-फराक़ 'अब न पूछ' आई और आके ढल गई ,
दिल था के फ़िर बहल गया जाँ थी के फिर सम्हल गई।
बज्म-ए-ख़याल में तेरे हुस्न की शम्में जल गई ,
दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई।
जब तुझे याद कर लिया सुबह महक महक उठी,
जब तेरा गम जला लिया , रात मचल मचल गई।
दिल से तो हर मआमूल करके चले थे साफ़ हम,
कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई।
आखिर-ए-शब् के हम सफर 'फैज़' न जाने क्या हुए,
रह गई कसजग सबा, सुबह किधर निकल गई.

शाख़ पर खून-ए-गुल - फ़ैज़

शाख़ पर खून-ए-गुल रवां है वही ,
शोखी-ए-रंग-ए-गुलिस्तान है वही।
सर वही है तो आस्तां है वही,
जाँ वही है तो जानेजाँ है वही।
बर्क़ सौ बार गिर के खाक हुई,
रौनक़-ए-खाक-ए-आशियाँ है वही।
आज की शब् वस्ल की शब् है,
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही।
चाँद तारे इधर नहीं आते,
वरना ज़िन्दाँ में आसमाँ है वही.

Monday, July 13, 2009

तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं - फैज़

तुम ये कहते हो वो जंग हो भी चुकी!

जिस में रखा नहीं है किसी ने क़दम

कोई उतरा न मैदान में दुश्मन न हम

कोई सफ बन न पाई न कोई अलम

मन्त्षर दोस्तों को सदा दे सका

अजनबी दुश्मनों का पता दे सका

तुम ये कहते वो जंग हो भी चुकी।

जिसमें रखा नहीं है हम ने अब तक क़दम ,

तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं,

जिस्म खस्ता है हाथों में यारा नहीं।



अपने बस का नहीं बार-ए-संग-ए-सितम,

बार-ए-संग-ए-सितम,बार-ए-कह्सार-ए-अनम,





ग़ज़ल-फैज़

कब ठहरेगा दर्द-ऐ-दिल कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी।

कब जान लहू होगी,कब अश्क गोहर होगा,
किस दिन तेरी सुनवाई ऐ दीदः -ऐ-तर होगी।

कब महकेगी फ़स्ल-ऐ-गुल कब बहकेगा मैखाना,
कब सुबह-ऐ-सुखन होगी,कब शाम-ऐ-नज़र होगी।

कब तक अब राह देखें ऐ क़ामत-ऐ-जानाना ,
कब हश्र मुआइन है,तुझको तो ख़बर होगी।

वाइज़ है न ज़ाहिद है, नासेह है न क़ातिल है,
अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी.

फैज़

आ गयी फ़स्ल-ऐ-सुकूँ चाक गरीबाँ वालों,
सिल गए होंठ कोई ज़ख्म सिले या न सिले ,
दोस्तों बज़्म सजाओ के बहार आई है,
खिल गए ज़ख्म कोई फूल खिले या न खिले।

Monday, June 22, 2009

तुम - कैफ़ी आज़मी

शगुफ्तगी का लताफत का शाहकार हो तुम,
फ़क़त बहार नहीं हासिल-ऐ-बहार हो तुम,
जो इक फूल में है कैदवोह गुलिस्तान हो,
जो इक कली में है पिन्हाँ वो लालाज़ार हो तुम।

हलावतों की तमन्ना,मलाहतों की मुराद,
ग़रूर कलियों का कलियों का इन्कसार हो तुम,
जिसे तरंग में फितरत ने गुनगुनाया है,
वो भैरवी हो , वो दीपक हो,वो मल्हार हो तुम ।
तुम्हारे जिस्म में ख्वाबीदा हैं हजारों राग,
निगाह छेड़ती है जिसको वोह सितार हो तुम,
जिसे उठा न सकी जुस्तजू वो मोती हो,
जिसे न गूँथ सकी आरज़ू वो हार हो तुम।
जिसे न बूझ सका इश्क़ वो पहेली हो,
जिसे समझ न सका प्यार वो प्यार हो तुम
खुदा करे किसी दामन में जज़्ब हो न सके
ये मेरे अश्क-ऐ-हसीं जिन से आशकार हो तुम.



अल्लाह रे!शबाब का ज़माना

हर जुम्बिश-ए-चश्म वालहाना,हर मौज-ए-निगाह साहराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
अपनी ही अदा पे आप सदके,अपनी ही नज़र का ख़ुद निशाना,
अल्लाह रे! शबाब का ज़माना
अपने ही से आप महो तमकीं,अपने ही से ख़ुद फरेब खाना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
ये जौक-ए-नज़र ये बदगुमानी,चिलमन के क़रीब छुप के आना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
पलकों में ये बेकरार वादा,चितवन में ये मुतमईन बहाना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
ये बच के बचा के मश्क-ऐ-अम्ज़ा,ये सोच समझ के मुस्कुराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
ये मस्त खरामियाँ दुहाई,इक इक कदम पे लडखडाना ,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
माथे पे ये संदली तबस्सुम,होठों पे ये शकरी तराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
चेहरे की दमक फरोग-ऐ-इमाँ, जुल्फों की गिरफ्त काफिराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना

अहसास में शबनमी लताफ़त,अनफास में सोज़ शायराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
मर्कूम जबीं पे खुदी पर, ऐसे में महाल है जगाना
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
हाथों के क़रीब माह-ओ-अंजुम,क़दमों के तले शराब खाना ,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
आईने में गाड़ के निगाहें,बे कसद किसी का गुनगुनाना
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना

याद- फ़ैज़

दस्त-ऐ-तन्हाई में ऐ जान-ऐ-जहाँ लरज़ाँ हैं ,
तेरी आवाज़ के साए तेरे होठों के सराब,
दस्त-ऐ-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-खाशाद तले
खिल रहे हैं तेरे पहलू के समन और गुलाब।

उठ रही है कहीं क़ुरबत से तेरी साँस की आंच,
अपनी खुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम,
दूर- उफ़क़ पार चमकती हुई कतरा कतरा,
गो रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम।

इस क़दर प्यार से ऐ जान-ऐ-जहाँ रखा है,

दिल के रुखसार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ,
यूँ गुमाँ होता है,गर च है अभी सुबह-ऐ-फिराक़,
ढल गया हिज्र का दिल आ भी गयी वस्ल की रात।

Wednesday, June 17, 2009

बादः -शराब

ب-ब
ا-अ
د-द
ۃ-अः

ب+ا+د+ۃ=باد‏‎ۃ

‎‎

बद-आमोज़ी-अशिक्षा,कुशिक्षा .

ب-ब
د-द
آ-आ
م-म
و-ओ
ز-ज़
ي-ई

ب+د+آ+م+و+ز+ي=بدآموزي

शोख़-चंचल

ش-श
و-ओ
خ-ख़

ش+و+خ=شوخ

बर्क़-बिजली

ب-ब
ر-र
ق-क़

ب+ر+ق=برق

अज़ीज़-प्यारा(ई)

ع-अ
ز-ज़
ی-इ
ز-ज़

ع+ز+ی+ز=عزيز

क्यों कर उस बुत से रखूँ-ग़ालिब

क्यों कर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ ,
क्या नहीं है मुझे इमान अज़ीज़,
दिल से निकला,पे न निकला दिल से,
है तेरे तीर का पैकान अज़ीज़,

ताब लाए' ही बनेगी ग़ालिब,
वक़्त सख्त है और जान अज़ीज़।

पैकान: नोक(तीर या तलवार की)
ताब: शक्ती,सामर्थ्य,धैर्य,इज्ज़त।
अज़ीज़-प्यार।

गोया एक ही बादशाह के-ग़ालिब

गोया एक ही बादशाह के सब खानजाद हैं ,
दरबारदार लोग बहम आशना नहीं,
कानों पे हाथ धरते हैं करते हुए सलाम,
इससे है ये मुराद के हम आशना नहीं।

Tuesday, June 16, 2009

हर एक बात पे-ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम के " तू क्या है"?
तुम्ही कहो के ये अंदाज़-ऐ-गुफ्तगू क्या है?

न शअल में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा,
कोई बताओ के वोह शोख़-ऐ-तुंदखूँ क्या है?

ये रश्क है के वोह होता है हमसुखन तुम से,
वगरना खौफ़-ऐ-बद आमोज़ी-ऐ-अदू क्या है।

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाज़त-ऐ-रफू क्या है।

जला है जिस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा!
कुरेदते हो जो अब राख जूस्तजू क्या है?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?

वोह चीज़,जिस के लिए हमको हो बहशत अज़ीज़,
सिवाए बादः-ऐ-गुलफ़ाम-ऐ-मुश्क बू ,क्या है?

पियूं शराब,अगर खुम भी देख लूँ दो चार,
शीशा-ओ-करह-ओ-कोजः-ओ-सबू क्या है?

रही न ताक़त-ऐ-गुफ्तार,और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है!

हुआ है "शाह का मुसाहिब",फिरे है इतराता,
वगरना शहर में ग़ालिब तेरी आबरू क्या है?

बर्क़-बिजली
शोख़-चंचल,चपल।
बद आमोज़ी-अशिक्षा,कुशिक्षा।
बादः-शराब।
गुलफ़ाम-गुलाबी,खूबसूरत फूल।
मुश्कबू-कस्तूरी की महक।
कदह-जाम,प्याला।
सबू-घडा(शराब का )।
खुम-गागर,पीपा(शराब जिसमें रखी जाती है)


Monday, June 15, 2009

ग़ालिब

उग रहा है दर-ओ-दीवार से सब्ज़ाह ग़ालिब!
हम बयाबाँमें है और घर में बहार आई है.

Sunday, June 14, 2009

ग़ज़ल - ग़ालिब

कोई उम्मीद बेर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती।

मौत का एक दिन मुईन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती।

आगे आती थी हाल-ऐ-दिल पे हंसी,अब किसी बात पर नहीं आती।

जानता हूँ सवाब-ऐ-ताअत ओ ज़हद,पर तबीयत इधर नहीं आती।

है कुछ ऐसी ही बात के चुप हूँ,वरना क्या बात करनी नहीं आती?

क्यों न चीखूं के याद करते हैं, मेरी आवाज़ गर नहीं आती।


मरते हैं आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती।

क़ाबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब ! शर्म तुमको मगर नहीं आती।

ग़ज़ल- ग़ालिब

कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है,
अपने जी में हमने ठानी और है।

आतिश-ए-दोज़ख में ये गर्मी कहाँ?
सोज़-ए-ग़म हाए नेहानीऔर है।

बारहा देखी हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है।

दे के ख़त मुंह देखता है नामावर,
कुछ तो पैगाम-ऐ-जुबानी और है।

हो चुकीं ग़ालिब बलाएँ सब तमाम,
एक मार्ग-ऐ-ना गहानी और है।

Wednesday, June 3, 2009

Nothing to do with Urdu-Its just my favourite

वृक्ष हों भले खड़े,हो घने, हो बड़े,
एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
तू न थकेगा कभी!तू न थमेगा कभी!तू न मुड़ेगा कभी!
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
ये महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत् रक्त से,लथ पथ, लथ पथ, लथ पथ !
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!

Saturday, May 30, 2009

रात ढलने लगी है- फ़ैज़

रात ढलने लगी है सीनों में,
आग सुलगाओ आबगीनों में,
दिल-ऐ-मुश्ताक़की ख़बर लेना,
फूल खिलते हैं इन महीनों में।

ग़म न कर ग़म न कर-फैज़

दर्द थम जाएगा,ग़म न कर,ग़म न कर,
यार लौट आयेंगे,दिल ठहर जाएगा,ग़म न कर ग़म न कर,
ज़ख्म भर जाएगा,ग़म न कर, ग़म न कर।

दिन निकल आएगा,
ग़म न कर,ग़म न कर,
अब्र खिल जाएगा,रात ढल जाएगी,
ग़म न कर,ग़म न कर
ऋत बदल जाएगी,ग़म न कर ग़म न कर.



Thursday, May 28, 2009

वासोख्तः-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

सच है हमीं को आप के शिकवे बजा न थे,
बेशक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे।

हाँ! जो जफा भी आप ने की कायदे से की,
हाँ हम ही कारबंद-ऐ-उसूल-ऐ-वफ़ा न थे।

आए तो यूँ के जैसे हमेशा थे मेहरबां,
भूले तो यूँ के गोया कभी आशना न थे।

शाख़ पर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

शाख़ पर खून-ऐ-गुल रवाँ है वही,
शोखी-ऐ-रंग-गुलिस्तान है वही ।

सर वही है तो आस्तां है वही ,
जाँ वही है तो जान-ऐ-जाँ है वही।

अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई ,
कूचा-ऐ-यार मेहरबां है वही।

बरक़ सौ बार गिर के खाक हुई,
रौनक़-ऐ-खाक-ऐ-आशियाँ है वही।

आज की शब विसाल की शब है,
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही।

चाँद तारे इधर नही आते,
वरना ज़िन्दाँ में आसमान है वही .




Tuesday, May 26, 2009

Complete works of Faiz Ahmed Faiz

It was the one of those eveings during Ramzaan,Me alongwith with my few other foody friends,
went to bhedi baazaar in Mumbai,we tried street food and the famous "Barah handi" situated
in a thinly street next to Badshah juice shop in Crawford market,however this post is not about the food adventure,I found in Bhedi bazaar the most amazing shop where i found complete works of Faiz,Mirza Ghalib and many others.It was a pleasant surprise,I was a real armature then and i haven't taken big leaps in Urdu studies however the joy to find such books on really affordable prices made me happy.
I wrote this post when i read posts from people who were not able to find these works and if one needs to find the complete works,He can visit Bhedi bazaar in Mumbai,These books are available at Usmania book store at Muhammad Ali Road.

नौह-फैज़ अहमद फ़ैज़

मुझे शिकवा है मेरे भाई के तुम जाते हुए,
ले गए साथ मेरी उम्र-ऐ-गुज़िश्ता की किताब ,
उसमें तो मेरी बहोत कीमती तस्वीरें थीं,
उसमें बचपन था मेरा और मेरा अहद-ऐ-शबाब,
उस के बदले मुझे तुम दे गए जाते जाते,
अपने गम का ये दमकता हुआ खूँ रंग गुलाब,
क्या करून भाई ! ये ऐज़ाज़ में क्यों न कर पहनूं,
मुझ से ले लो मेरी सब चाक कमीज़ों का हिसाब,
आखरी बार है! लो मान लो इक ये भी सवाल,
आज तक तुम से मई लौटा नहीं मायूस जवाब,
आ के ले जाओ तुम अपना ये दमकता हुआ फूल,
मुझको लौटा दो मेरी उम्र-ऐ-गुज़िश्ता की किताब।

हमारे दम से है-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हमारे दम से है कू-ऐ-जुनूँ में अब भी खजल,
अबा-ऐ-शेख़ क़बा-ऐ-अमीर-ओ-ताज-ऐ-शही।
हमीं से सुन्नत-ऐ-मंसूर-ओ-कैस जिंदा है,

हमीं से बाकी है गुल-दामनी -ओ-कजकुलही ।

Monday, May 25, 2009

न पूछ- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

न पूछ जब से तेरा इंतज़ार कितना है,
के जिन दिनों से मुझे तेरा इंतज़ार नहीं।

तेरा ही अक्स है उन अजनबी बहारों में,
जो तेरे लब,तेरे बाज़ू,तेरा किनार नहीं।

लोह-ओ-कलम-फ़ैज़

हम परवरिश-ऐ-लोह-ओ-कलम करते रहेंगे,
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे।
असबाब-ऐ-ग़म -ऐ-अश्क़ बहम करते रहेंगे,
वीरानी-ऐ-दौराँ पे करम करते रहेंगे।
हाँ! तल्खी-ऐ अय्याम अभी और बढेगी,
हाँ! अहल-ऐ-सितम मश्क-ऐ-सितम करते रहेगी।
मन्ज़ूर ये तल्खी, ये सितम हमको गवारा,
दम है तो मुद्दवाले अलम करते रहेंगे।
मैखाना सलामत है तो हम सुर्खी-ऐ-मय से,
तज़इन दर-ओ-बाम-ऐ-हरम करते रहेंगे।
बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क़ से पैदा,
रंग-ऐ-लब-ओ-रुख़सार-ऐ-सनम करते रहेंगे।

इक तर्ज़-ऐ-तगाफ़ुल है सो वो अम्न को मुबारक,
इक अर्ज़-ऐ-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे।

Friday, May 22, 2009

तराना- फ़ैज़

दरबार-ऐ-वतन में जब एक दिन सब जाने वाले जायेंगे,
कुछ अपनी सज़ा को पहोचेंगे कुछ अपनी जज़ाले जायेंगे।

ऐ खाक़नशीनों उठ बैठो वोह वक़्त क़रीब आ पहुँचा है
जब तख्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे।

अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िन्दानोंकी ख़ैर नहीं,
जो दरया झूम के उठ्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएंगे।

कटते भी चलो,बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहोत हैं सर भी बहोत,
चलते भी चलो के अब डेरे,मंज़िलपे ही डाले जायेंगे ।

ऐ ज़ुल्म के मातों लब खोलो चुप रहने वालों चुप कब तक
कुछ हश्र तो उनसे उठ्ठेगा,कुछ दूर तो नाले जायेंगे।