Sunday, August 9, 2009

बेनियाज़ी

बेनियाज़ी का मतलब है indifference या बेपरवाह,स्वछन्द :
बे =ب+ے=بے
नियाज़ी= ن+ي+ا+ز=نيازي
बेनियाज़ी=بےنيازي

क़ासिद

क़ासिद का मतलब है संदेश पढने वाला,पत्रले जाने वाला या पोस्टमन।
ग़ालिब का इक बहुत मक़्बूल शेर है:

क़ासिद के आते आते,ख़त इक और लिख रखूँ,
मै जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में।

और ध्यान रखिये ये जो क़ लिखा जाएगा वो क़ है नहीं:

का =قا
स+इ=صي
द=د
क़ासिद =قاصير


बाज़रगाँ

बाज़रगाँ का मतलब है व्यापारी, आइये देखते हैं इसे कैसे लिखा जाता है:
ब+अ+ज+अ+र+अ+ग+आन=बाज़रगान

ب+ا+ز+ر+گ+ا+‏‌‍ں=بازرگاں

Wednesday, July 29, 2009

soliloquy

खल्वत की रातें,फ़ोन की बातें,महबूब की मेरे बात "कुछ और",
महफिल में जो आप मिलें , बनते हैं जनाब "कुछ और"

आपकी चाहत,आपकी आराइश,आपके लुत्फ़-ओ-ख्वाब "कुछ और"
बाज़रगाँ फिर हाथ मलें और आप कहें - " कुछ और , कुछ और "।

आज कहा इस दिल ने मेरे "बहुत हुआ " करें काज "कुछ और "
मैंने कहा या तू चुप रह या कर ले तू बात "कुछ और "

Monday, July 27, 2009

ग़ालिब

'आइना देख' अपना सा मुंह ले के रह गए,
साहब को दिल न देने पे कितना गुरूर था,
क़ासिद को अपने हाथ से गर्दन न मारिये,
उसकी खता नहीं है ये मेरा क़सूर था।

ग़ालिब

दोस्त' गम्ख्वारी में मेरी सअइ फरमाएंगे क्या?
ज़ख्म के भरने तलक,नाखून न बढ़ जायेंगे क्या?

बेनयाज़ी हद से गुज़री "बन्दापरवर "कब तलक?
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फरमाएंगे - क्या?

हज़रात-ए-नासेह गर आवें,दीद-ओ-दिल फर्श-ए-राह,
कोई मुझ को ये तो समझा दो,के समझावेंगे क्या?

आज वां तेग़-ओ-कफ़न बांधे हुए जाता हूँ मै
अज़र मेरे क़त्ल करने में वोह अब लावेंगे क्या?

गर किया नासेह ने हम की कैद 'अच्छा' यूँ सही,
ये जूनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छूट जावेंगे क्या?

खानजाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों?
हैं गिरफ्तार-ए-वफ़ा ,ज़िन्दाँ से घबराएँगे क्या?


है अब इस म'अमूर में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फत 'असद',
हम ने ये माना "दिल्ली में रहें " - खायेंगे क्या?

Wednesday, July 22, 2009

ज़ौक़

कुछ दर्द-ए-निहाँ दिल का बयान हो नहीं सकता,
गूंगे का सा है ख्वाब,बयाँ हो नहीं सकता।

ज़ौक़

या रब इस ज़माने के लोगों को क्या हुआ,
जिसका बुरा हो उन को ये कहना - भला हुआ।

ज़ौक़

हुए इंसान सब सोज़-ए-मोहब्बत के लिए पैदा,
फ़रिश्ता होते,गर होते,इबादत के लिए पैदा.

ज़ौक़

मस्जिद में उस ने हम को,आँखें दिखा के मारा,
काफिर की देखो शोखी,घर में बुला के मारा.

ज़ौक़


बरसों हो हिज्र,वस्ल हो इक दम नसीब,कम होगा मुझ सा कोई मुहब्बत में कम नसीब

गर मेरी खाक़ को हो तुम्हारे कदम नसीब,खाया करे नसीब की मेरे,कसम ,नसीब।

माही हो या वोह माह, वो इक हो या हज़ार,बेदाग़हो न दस्ते फलक से ड्रम नसीब।

बेहतर हैं लाख लुत्फ़-ओ-करम से ,तेरे सितम,अपने ज़हेनसीब,के हों ये सितम, नसीब।

इमाँ है तेरा शौक़-ए-बक़ा,जिस को ये न हो ,दीदार उसे ख़ुदा का न हो ऐ सनम,नसीब।

जाते हैं कू-ए-यार को इस में जो हो सो हो,ऐ ज़ौक़ आज़माते हैं आज अपने हम,नसीब।

Monday, July 20, 2009

ज़ौक़

दुनिया के अलम जौक उठा जायेंगे,
हम क्या कहें क्या आए थे, क्या जायेंगे,
जब आए थे तो रोते हुए आप आए थे,
अब जाएँगे औरों को रुला जाएँगे।

मुकद्दर

मुकद्दर का मतलब है गन्दा ,घिनौना , जो साफ़न रहता हो । ये शब्द मुक़द्दर से अलग है जिसका मतलब होता है भाग्य।

ये लिखा जाता है,कुछ इस तरह:


م+ک+دّ+ر=مکدّر

ज़ौक़

आदमी हो गर मुकद्दर क्या कसूर इदराक का,
खाक़ का पुतला है ये,कुछ तो असर हो खाक़ का।

मुकद्दर का मतलब है गन्दा ,घिनौना , जो साफ़ न रहता हो । ये शब्द मुक़द्दर से अलग है जिसका मतलब होता है भाग्य।

इदराक-ज्ञान,प्रतिभा,समझ.

ज़ौक़

जो कहोगे तुम, तो कहेंगे हम,हाँ यूँ ही सही,
आप की यूँही खुशी है,मेहरबान यूँ ही सही।
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हम हैं गुलाम उन के जो हैं वफ़ा के बन्दे,
इस को यकीन मानो गर हो खुदा के बन्दे।
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Wednesday, July 15, 2009

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढ्ता फिरता है ख़याल - फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल,
मध् भरा हर्फ़ कोई , ज़हर भरा हर्फ़ कोई।
दिलनशीं हर्फ़ कोई , क़हर भरा हर्फ़ कोई,
हर्फ़-ए-उल्फत कोई दिलदार नज़र हो जैसे,
जिससे मिलती है नज़र बोसा-ए-लब की सूरत,
इतना रोशन के सर-ए-मौज-ए-ज़रहो जैसे।
सोहबत-ए-यार में आगाज़-ए-तरफ़ की सूरत,
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-गज़ब हो जैसे
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।
ता अबद शहर-ए-सितम जिससे तबाह हो जाएँ ,
इतना तारीक़के शमशान की शब् हो जैसे,
लब पे लाऊँ तो मेरे होंठ स्याह हो जाएँ।
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।


Tuesday, July 14, 2009

शाम-ए-फ़राक - फैज़

शाम-ए-फराक़ 'अब न पूछ' आई और आके ढल गई ,
दिल था के फ़िर बहल गया जाँ थी के फिर सम्हल गई।
बज्म-ए-ख़याल में तेरे हुस्न की शम्में जल गई ,
दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई।
जब तुझे याद कर लिया सुबह महक महक उठी,
जब तेरा गम जला लिया , रात मचल मचल गई।
दिल से तो हर मआमूल करके चले थे साफ़ हम,
कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई।
आखिर-ए-शब् के हम सफर 'फैज़' न जाने क्या हुए,
रह गई कसजग सबा, सुबह किधर निकल गई.

शाख़ पर खून-ए-गुल - फ़ैज़

शाख़ पर खून-ए-गुल रवां है वही ,
शोखी-ए-रंग-ए-गुलिस्तान है वही।
सर वही है तो आस्तां है वही,
जाँ वही है तो जानेजाँ है वही।
बर्क़ सौ बार गिर के खाक हुई,
रौनक़-ए-खाक-ए-आशियाँ है वही।
आज की शब् वस्ल की शब् है,
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही।
चाँद तारे इधर नहीं आते,
वरना ज़िन्दाँ में आसमाँ है वही.

Monday, July 13, 2009

तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं - फैज़

तुम ये कहते हो वो जंग हो भी चुकी!

जिस में रखा नहीं है किसी ने क़दम

कोई उतरा न मैदान में दुश्मन न हम

कोई सफ बन न पाई न कोई अलम

मन्त्षर दोस्तों को सदा दे सका

अजनबी दुश्मनों का पता दे सका

तुम ये कहते वो जंग हो भी चुकी।

जिसमें रखा नहीं है हम ने अब तक क़दम ,

तुम ये कहते हो अब कोई चारा नहीं,

जिस्म खस्ता है हाथों में यारा नहीं।



अपने बस का नहीं बार-ए-संग-ए-सितम,

बार-ए-संग-ए-सितम,बार-ए-कह्सार-ए-अनम,





ग़ज़ल-फैज़

कब ठहरेगा दर्द-ऐ-दिल कब रात बसर होगी,
सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी।

कब जान लहू होगी,कब अश्क गोहर होगा,
किस दिन तेरी सुनवाई ऐ दीदः -ऐ-तर होगी।

कब महकेगी फ़स्ल-ऐ-गुल कब बहकेगा मैखाना,
कब सुबह-ऐ-सुखन होगी,कब शाम-ऐ-नज़र होगी।

कब तक अब राह देखें ऐ क़ामत-ऐ-जानाना ,
कब हश्र मुआइन है,तुझको तो ख़बर होगी।

वाइज़ है न ज़ाहिद है, नासेह है न क़ातिल है,
अब शहर में यारों की किस तरह बसर होगी.

फैज़

आ गयी फ़स्ल-ऐ-सुकूँ चाक गरीबाँ वालों,
सिल गए होंठ कोई ज़ख्म सिले या न सिले ,
दोस्तों बज़्म सजाओ के बहार आई है,
खिल गए ज़ख्म कोई फूल खिले या न खिले।

Monday, June 22, 2009

तुम - कैफ़ी आज़मी

शगुफ्तगी का लताफत का शाहकार हो तुम,
फ़क़त बहार नहीं हासिल-ऐ-बहार हो तुम,
जो इक फूल में है कैदवोह गुलिस्तान हो,
जो इक कली में है पिन्हाँ वो लालाज़ार हो तुम।

हलावतों की तमन्ना,मलाहतों की मुराद,
ग़रूर कलियों का कलियों का इन्कसार हो तुम,
जिसे तरंग में फितरत ने गुनगुनाया है,
वो भैरवी हो , वो दीपक हो,वो मल्हार हो तुम ।
तुम्हारे जिस्म में ख्वाबीदा हैं हजारों राग,
निगाह छेड़ती है जिसको वोह सितार हो तुम,
जिसे उठा न सकी जुस्तजू वो मोती हो,
जिसे न गूँथ सकी आरज़ू वो हार हो तुम।
जिसे न बूझ सका इश्क़ वो पहेली हो,
जिसे समझ न सका प्यार वो प्यार हो तुम
खुदा करे किसी दामन में जज़्ब हो न सके
ये मेरे अश्क-ऐ-हसीं जिन से आशकार हो तुम.



अल्लाह रे!शबाब का ज़माना

हर जुम्बिश-ए-चश्म वालहाना,हर मौज-ए-निगाह साहराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
अपनी ही अदा पे आप सदके,अपनी ही नज़र का ख़ुद निशाना,
अल्लाह रे! शबाब का ज़माना
अपने ही से आप महो तमकीं,अपने ही से ख़ुद फरेब खाना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
ये जौक-ए-नज़र ये बदगुमानी,चिलमन के क़रीब छुप के आना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
पलकों में ये बेकरार वादा,चितवन में ये मुतमईन बहाना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
ये बच के बचा के मश्क-ऐ-अम्ज़ा,ये सोच समझ के मुस्कुराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
ये मस्त खरामियाँ दुहाई,इक इक कदम पे लडखडाना ,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
माथे पे ये संदली तबस्सुम,होठों पे ये शकरी तराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
चेहरे की दमक फरोग-ऐ-इमाँ, जुल्फों की गिरफ्त काफिराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना

अहसास में शबनमी लताफ़त,अनफास में सोज़ शायराना,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
मर्कूम जबीं पे खुदी पर, ऐसे में महाल है जगाना
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
हाथों के क़रीब माह-ओ-अंजुम,क़दमों के तले शराब खाना ,
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना
आईने में गाड़ के निगाहें,बे कसद किसी का गुनगुनाना
अल्लाह रे !शबाब का ज़माना

याद- फ़ैज़

दस्त-ऐ-तन्हाई में ऐ जान-ऐ-जहाँ लरज़ाँ हैं ,
तेरी आवाज़ के साए तेरे होठों के सराब,
दस्त-ऐ-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-खाशाद तले
खिल रहे हैं तेरे पहलू के समन और गुलाब।

उठ रही है कहीं क़ुरबत से तेरी साँस की आंच,
अपनी खुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम,
दूर- उफ़क़ पार चमकती हुई कतरा कतरा,
गो रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम।

इस क़दर प्यार से ऐ जान-ऐ-जहाँ रखा है,

दिल के रुखसार पे इस वक़्त तेरी याद ने हाथ,
यूँ गुमाँ होता है,गर च है अभी सुबह-ऐ-फिराक़,
ढल गया हिज्र का दिल आ भी गयी वस्ल की रात।

Wednesday, June 17, 2009

बादः -शराब

ب-ब
ا-अ
د-द
ۃ-अः

ب+ا+د+ۃ=باد‏‎ۃ

‎‎

बद-आमोज़ी-अशिक्षा,कुशिक्षा .

ب-ब
د-द
آ-आ
م-म
و-ओ
ز-ज़
ي-ई

ب+د+آ+م+و+ز+ي=بدآموزي

शोख़-चंचल

ش-श
و-ओ
خ-ख़

ش+و+خ=شوخ

बर्क़-बिजली

ب-ब
ر-र
ق-क़

ب+ر+ق=برق

अज़ीज़-प्यारा(ई)

ع-अ
ز-ज़
ی-इ
ز-ज़

ع+ز+ی+ز=عزيز

क्यों कर उस बुत से रखूँ-ग़ालिब

क्यों कर उस बुत से रखूँ जान अज़ीज़ ,
क्या नहीं है मुझे इमान अज़ीज़,
दिल से निकला,पे न निकला दिल से,
है तेरे तीर का पैकान अज़ीज़,

ताब लाए' ही बनेगी ग़ालिब,
वक़्त सख्त है और जान अज़ीज़।

पैकान: नोक(तीर या तलवार की)
ताब: शक्ती,सामर्थ्य,धैर्य,इज्ज़त।
अज़ीज़-प्यार।

गोया एक ही बादशाह के-ग़ालिब

गोया एक ही बादशाह के सब खानजाद हैं ,
दरबारदार लोग बहम आशना नहीं,
कानों पे हाथ धरते हैं करते हुए सलाम,
इससे है ये मुराद के हम आशना नहीं।

Tuesday, June 16, 2009

हर एक बात पे-ग़ालिब

हर एक बात पे कहते हो तुम के " तू क्या है"?
तुम्ही कहो के ये अंदाज़-ऐ-गुफ्तगू क्या है?

न शअल में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा,
कोई बताओ के वोह शोख़-ऐ-तुंदखूँ क्या है?

ये रश्क है के वोह होता है हमसुखन तुम से,
वगरना खौफ़-ऐ-बद आमोज़ी-ऐ-अदू क्या है।

चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाज़त-ऐ-रफू क्या है।

जला है जिस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा!
कुरेदते हो जो अब राख जूस्तजू क्या है?

रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?

वोह चीज़,जिस के लिए हमको हो बहशत अज़ीज़,
सिवाए बादः-ऐ-गुलफ़ाम-ऐ-मुश्क बू ,क्या है?

पियूं शराब,अगर खुम भी देख लूँ दो चार,
शीशा-ओ-करह-ओ-कोजः-ओ-सबू क्या है?

रही न ताक़त-ऐ-गुफ्तार,और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है!

हुआ है "शाह का मुसाहिब",फिरे है इतराता,
वगरना शहर में ग़ालिब तेरी आबरू क्या है?

बर्क़-बिजली
शोख़-चंचल,चपल।
बद आमोज़ी-अशिक्षा,कुशिक्षा।
बादः-शराब।
गुलफ़ाम-गुलाबी,खूबसूरत फूल।
मुश्कबू-कस्तूरी की महक।
कदह-जाम,प्याला।
सबू-घडा(शराब का )।
खुम-गागर,पीपा(शराब जिसमें रखी जाती है)


Monday, June 15, 2009

ग़ालिब

उग रहा है दर-ओ-दीवार से सब्ज़ाह ग़ालिब!
हम बयाबाँमें है और घर में बहार आई है.