Tuesday, August 11, 2009

ग़ज़ल - कैफ़ी आज़मी

पत्थर के खुदा वहां भी पाए,
हम चाँद से आज लौट आए।
दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं,
क्या हो गए मेहरबान साए।
जंगल की हवाएं आ रही हैं,
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए।
लैला ने नया जन्म लिया है,
है क़ैस कोई जो दिल लगाए?
है आज ज़मीन का गुस्ल-ए-सेहत,
जिस दिल में हो जितना खून लाये।
सेहरा सेहरा लहू के खेमे,
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आए।

आदत - कैफ़ी आज़मी

मुद्दतों में इक अंधे कुंवे में असीर,
सर पटकता रहा गुनगुनाता रहा,
रौशनी चाहिए,चांदनी चाहिए, जिंदगी चाहिए,
रौशनी प्यार की,चांदनी यार की,जिंदगी डर की।

अपनी आवाज़ सुनता रहा रात दिन ,
धीरे धीरे यक़ीन दिल को आता रहा।
सूने संसार में,
बेवफा यार में,
दामन-ए-दार में,
रौशनी भी नहीं,चांदनी भी नहीं,जिंदगी भी नहीं।

जिंदगी एक रात,
वाहम कायनात,
आदमी बेशबात,
लोग कोताह कद,
शहर शहर हसद ,
गाँव उन से भी बद ,
उन अंधेरों ने जब पी डाला मुझे,
फिर अचानक कुंवे ने उछाला मुझे,
अपने सीने से बाहर निकला मुझे,
सैकडों मसर थे सामने,
सैकडों उस के बाज़ार थे,
एक बूढी जुलेखा नहीं,
जाने कितने खरीद दार थे,
बढ़ता जाता था युसूफ का मोल,
लोग बिकने को तयार थे।
खुल गए माजबीनों के सर,
रेशमी चादरें हट गयीं,
पलकें झपकीं या नज़रें झुकीं,
मरमरी उंगलियाँ कट गयीं,
हाथ दामन तक आया कोई ,
धज्जियाँ दूर तक बट गयीं।

मैंने डर के लगा दी कुंवे में छलांग,
सर पटकता रहा फिर उसी करब से ,
फिर उसी दर्द से गिडगिडाने लगा,
रौशनी चाहिए,चांदनी चाहिए,जिंदगी चाहिए.


सब्त

सब्त का मतलब है धृढ ता (being firm) :
स=ض
ब=ب
त=ت

सब्त=ضبت

फ़ैज़

हिम्मत-ए-इल्तजा नहीं बाक़ी,
सब्त का हौसला नहीं बाक़ी।

इक तेरी दीद छीन गई मुझ से,
वरना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी।

अपनी मश्क़-ए-सितम से हाथ न खेंच,
मै नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी।

तेरी चश्म-ए-आलम नवाज़ की खैर,
दिल में कोई गिला नहीं बाक़ी।

हो चुका ख़त्म अहद-ए-हिज्र-ओ-विसाल,
जिंदगी में मज़ा नहीं बाक़ी।

Sunday, August 9, 2009

काफ़िर

बहोत उम्दा शब्द है और बहोत प्रचलित भी , इसका अर्थ है नास्तिक, इश्वर या धर्म को न मानने वाला, और इसको कभी कभी अल्लाह को न मानने वाले के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है :
का=کا
फ़ि=في
र= ر
काफ़िर =کافير

पोशीदा

पोशीदा का मतलब है छुपा हुआ या छुपाया हुआ,जब ग़ालिब कहते हैं के वोह हैं :
वली पोशीदा और काफिर खुला
तो वो कहते हैं के वोह उनकी भक्ति छुपी हुई है और नास्तिकता सबके सामने है।
पोशीदा कैसे लिखते हैं? ऐसे:
पो=پو
शी=شي
दा=داۂ
पोशीदा =پوشيراۂ

वली

वली का अर्थ है भक्त ,महात्मा , मित्र,साधू,योगी।
वली = ولی

मर्ग

मर्ग-मौत :

मर्ग=مرگ

बारां

बारां का अर्थ है वर्षा , बारिश -
बा=با
रां=راں
बारां=باراں

दाग़

दाग़ जैसे शब्द मुझ जैसे नए आदमी को उर्दू लिपि सीखने में हमेशा ही पोत्साहित करते थे-क्यों ?
क्योंकि ये बहोत सरल शब्द है , आपको सिर्फ़ ध्यान रखना है के दाग़ में ग़ आता है ग नहीं:
दा=دا
ग़=غ
दाग़ = داغ

दरवाज़ा

खैर,इस शब्द को सिर्फ़ लिखना कैसे है,ये बताने के लिए :
द=د
र=ر
वा=وا
ज़ा=زا
दरवाज़ा=داروازا

कफ़स

कफ़स का शाब्दिक अर्थ है पिंजरा लेकिन इसे इस्तेमाल किया जाता है "इस नश्वर शरीर " या देह के मायने में,और इसे लिखना तो बहोत ही आसन है:
क़=ق
फ़=ف
स=س
कफ़स=قفس

ग़ालिब-ग़ज़ल

कुञ्ज में बैठा रहूँ,यूँ पर खुला,काश के होता क़फ़स का दर खुला,

'हम पुकारें और खुले' यूँ कौन जाए? यार का दरवाज़ा पावें गर,खुला।

हम को है इस राज़दारी पर घमंड, दोस्त का है राज़ दुश्मन पर खुला।

वाकई दिल पर भला लगता था दाग़,ज़ख्म लेकिन दाग़ से बेहतर,खुला।

सोज़-ए-दिल का क्या कहें बाराँ-ए-अश्क, आग भड़की मुहँ अगर दम भर खुला ।

नामे के साथ आ गया पैगाम-ए-मर्ग ,रह गया ख़त मेरी छाती पर खुला।


देखियो ग़ालिब से गर उलझा कोई ,
है वली पोशीदः और काफ़िंर, खुला .


म'अमूर

म'अमूर का मतलब है कैदी :

म= م
अमूर=عمور
म'अमूर=م+ع+م+و+ر=معمور

नासेह

नासेह हैं धर्मोपदेशक :

ना=نا
से=صے
ह=ح
नासेह=ن+ا+ص+ح=ناصےح

बेनियाज़ी

बेनियाज़ी का मतलब है indifference या बेपरवाह,स्वछन्द :
बे =ب+ے=بے
नियाज़ी= ن+ي+ا+ز=نيازي
बेनियाज़ी=بےنيازي

क़ासिद

क़ासिद का मतलब है संदेश पढने वाला,पत्रले जाने वाला या पोस्टमन।
ग़ालिब का इक बहुत मक़्बूल शेर है:

क़ासिद के आते आते,ख़त इक और लिख रखूँ,
मै जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में।

और ध्यान रखिये ये जो क़ लिखा जाएगा वो क़ है क नहीं:

का =قا
स+इ=صي
द=د
क़ासिद =قاصير


बाज़रगाँ

बाज़रगाँ का मतलब है व्यापारी, आइये देखते हैं इसे कैसे लिखा जाता है:
ब+अ+ज+अ+र+अ+ग+आन=बाज़रगान

ب+ا+ز+ر+گ+ا+‏‌‍ں=بازرگاں

Wednesday, July 29, 2009

soliloquy

खल्वत की रातें,फ़ोन की बातें,महबूब की मेरे बात "कुछ और",
महफिल में जो आप मिलें , बनते हैं जनाब "कुछ और"

आपकी चाहत,आपकी आराइश,आपके लुत्फ़-ओ-ख्वाब "कुछ और"
बाज़रगाँ फिर हाथ मलें और आप कहें - " कुछ और , कुछ और "।

आज कहा इस दिल ने मेरे "बहुत हुआ " करें काज "कुछ और "
मैंने कहा या तू चुप रह या कर ले तू बात "कुछ और "

Monday, July 27, 2009

ग़ालिब

'आइना देख' अपना सा मुंह ले के रह गए,
साहब को दिल न देने पे कितना गुरूर था,
क़ासिद को अपने हाथ से गर्दन न मारिये,
उसकी खता नहीं है ये मेरा क़सूर था।

ग़ालिब

दोस्त' गम्ख्वारी में मेरी सअइ फरमाएंगे क्या?
ज़ख्म के भरने तलक,नाखून न बढ़ जायेंगे क्या?

बेनयाज़ी हद से गुज़री "बन्दापरवर "कब तलक?
हम कहेंगे हाल-ए-दिल और आप फरमाएंगे - क्या?

हज़रात-ए-नासेह गर आवें,दीद-ओ-दिल फर्श-ए-राह,
कोई मुझ को ये तो समझा दो,के समझावेंगे क्या?

आज वां तेग़-ओ-कफ़न बांधे हुए जाता हूँ मै
अज़र मेरे क़त्ल करने में वोह अब लावेंगे क्या?

गर किया नासेह ने हम की कैद 'अच्छा' यूँ सही,
ये जूनून-ए-इश्क़ के अंदाज़ छूट जावेंगे क्या?

खानजाद-ए-ज़ुल्फ़ हैं, ज़ंजीर से भागेंगे क्यों?
हैं गिरफ्तार-ए-वफ़ा ,ज़िन्दाँ से घबराएँगे क्या?


है अब इस म'अमूर में क़हत-ए-ग़म-ए-उल्फत 'असद',
हम ने ये माना "दिल्ली में रहें " - खायेंगे क्या?

Wednesday, July 22, 2009

ज़ौक़

कुछ दर्द-ए-निहाँ दिल का बयान हो नहीं सकता,
गूंगे का सा है ख्वाब,बयाँ हो नहीं सकता।

ज़ौक़

या रब इस ज़माने के लोगों को क्या हुआ,
जिसका बुरा हो उन को ये कहना - भला हुआ।

ज़ौक़

हुए इंसान सब सोज़-ए-मोहब्बत के लिए पैदा,
फ़रिश्ता होते,गर होते,इबादत के लिए पैदा.

ज़ौक़

मस्जिद में उस ने हम को,आँखें दिखा के मारा,
काफिर की देखो शोखी,घर में बुला के मारा.

ज़ौक़


बरसों हो हिज्र,वस्ल हो इक दम नसीब,कम होगा मुझ सा कोई मुहब्बत में कम नसीब

गर मेरी खाक़ को हो तुम्हारे कदम नसीब,खाया करे नसीब की मेरे,कसम ,नसीब।

माही हो या वोह माह, वो इक हो या हज़ार,बेदाग़हो न दस्ते फलक से ड्रम नसीब।

बेहतर हैं लाख लुत्फ़-ओ-करम से ,तेरे सितम,अपने ज़हेनसीब,के हों ये सितम, नसीब।

इमाँ है तेरा शौक़-ए-बक़ा,जिस को ये न हो ,दीदार उसे ख़ुदा का न हो ऐ सनम,नसीब।

जाते हैं कू-ए-यार को इस में जो हो सो हो,ऐ ज़ौक़ आज़माते हैं आज अपने हम,नसीब।

Monday, July 20, 2009

ज़ौक़

दुनिया के अलम जौक उठा जायेंगे,
हम क्या कहें क्या आए थे, क्या जायेंगे,
जब आए थे तो रोते हुए आप आए थे,
अब जाएँगे औरों को रुला जाएँगे।

मुकद्दर

मुकद्दर का मतलब है गन्दा ,घिनौना , जो साफ़न रहता हो । ये शब्द मुक़द्दर से अलग है जिसका मतलब होता है भाग्य।

ये लिखा जाता है,कुछ इस तरह:


م+ک+دّ+ر=مکدّر

ज़ौक़

आदमी हो गर मुकद्दर क्या कसूर इदराक का,
खाक़ का पुतला है ये,कुछ तो असर हो खाक़ का।

मुकद्दर का मतलब है गन्दा ,घिनौना , जो साफ़ न रहता हो । ये शब्द मुक़द्दर से अलग है जिसका मतलब होता है भाग्य।

इदराक-ज्ञान,प्रतिभा,समझ.

ज़ौक़

जो कहोगे तुम, तो कहेंगे हम,हाँ यूँ ही सही,
आप की यूँही खुशी है,मेहरबान यूँ ही सही।
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हम हैं गुलाम उन के जो हैं वफ़ा के बन्दे,
इस को यकीन मानो गर हो खुदा के बन्दे।
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Wednesday, July 15, 2009

आज इक हर्फ़ को फिर ढूँढ्ता फिरता है ख़याल - फ़ैज़

आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल,
मध् भरा हर्फ़ कोई , ज़हर भरा हर्फ़ कोई।
दिलनशीं हर्फ़ कोई , क़हर भरा हर्फ़ कोई,
हर्फ़-ए-उल्फत कोई दिलदार नज़र हो जैसे,
जिससे मिलती है नज़र बोसा-ए-लब की सूरत,
इतना रोशन के सर-ए-मौज-ए-ज़रहो जैसे।
सोहबत-ए-यार में आगाज़-ए-तरफ़ की सूरत,
हर्फ़-ए-नफ़रत कोई शमशीर-ए-गज़ब हो जैसे
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।
ता अबद शहर-ए-सितम जिससे तबाह हो जाएँ ,
इतना तारीक़के शमशान की शब् हो जैसे,
लब पे लाऊँ तो मेरे होंठ स्याह हो जाएँ।
आज इक हर्फ़ को फ़िर ढूंढता फिरता है ख़याल।


Tuesday, July 14, 2009

शाम-ए-फ़राक - फैज़

शाम-ए-फराक़ 'अब न पूछ' आई और आके ढल गई ,
दिल था के फ़िर बहल गया जाँ थी के फिर सम्हल गई।
बज्म-ए-ख़याल में तेरे हुस्न की शम्में जल गई ,
दर्द का चाँद बुझ गया हिज्र की रात ढल गई।
जब तुझे याद कर लिया सुबह महक महक उठी,
जब तेरा गम जला लिया , रात मचल मचल गई।
दिल से तो हर मआमूल करके चले थे साफ़ हम,
कहने में उन के सामने बात बदल बदल गई।
आखिर-ए-शब् के हम सफर 'फैज़' न जाने क्या हुए,
रह गई कसजग सबा, सुबह किधर निकल गई.

शाख़ पर खून-ए-गुल - फ़ैज़

शाख़ पर खून-ए-गुल रवां है वही ,
शोखी-ए-रंग-ए-गुलिस्तान है वही।
सर वही है तो आस्तां है वही,
जाँ वही है तो जानेजाँ है वही।
बर्क़ सौ बार गिर के खाक हुई,
रौनक़-ए-खाक-ए-आशियाँ है वही।
आज की शब् वस्ल की शब् है,
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही।
चाँद तारे इधर नहीं आते,
वरना ज़िन्दाँ में आसमाँ है वही.