Thursday, January 1, 2009

जागिए

जागिए

ढलते ढलते स्याह रात ये कह गयी,
जागिए! आप के दोस्त ने बम बना भी लिया।
और तह-ऐ-आप उसे एक दिन आज़मा भी लिया।

नीले पानी की सब सीम तन मछलियाँ जल गयीं,
नन्हीं परियां,थिरकती हसीं तितलियाँ जल गयीं,
जल गया नब्ज़-ऐ-गेती में जोश-ऐ-नमू *
(दुनिया की नब्ज़ )
जल गयी बाग़ की हसरत-ऐ-रंग-ओ-बू
और बहारों ने खेमा,चमन से उठा भी लिया।

जागिए आप के दोस्त ने बम बना भी
लिया।

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दफ्फात एक ऐसा भयानक धमाका हुआ

जो फ़रिश्ते ज़मीन पर उतर आए थे, उड़ गए ,

ये सुलगती पिघलती ज़मीन छोड़ कर,

आसमानों से एक बार फिर जुड़ गए,

असर-ऐ-नू के लिए जो सहीफ़ नया लाये थे,

उसको अपने परों में छुपा भी लिया,

अब सलामत किसी की है न दुनिया न दीं

रुई की तरह धनकी पडी है खुदा की ज़मीन,

जिस्म इंसान के तुकडे दरख्तों में अटके हुए ,

चाँद अंधेरे की सूली पे लटके हुए,

टूटे तारों को धरती ने खा भी लिया,

जागिए! आप के दोस्त ने बम बना भी लिया।

कम्युनिस्ट ईकाई के टूटने पर

आवारा सजदे

इक यही सोज़-ऐ-निहाँ कल मेरा सरमाया है ,
दोस्तों,मैं किसे ये सोज़-ऐ-निहाँ नज़र करुँ।

कोई क़ातिल सर मक़्तल नज़र आता ही नहीं
किस को दिल नज़र करुँ और किसे जान नज़र करुँ।

तुम भी महबूब मेरे तुम भी हो दिलदार मेरे,
आशना मुझ से मगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं,

ख़त्म है तुम पे मसीहा नफस चारा गरी
महरूम दर्द-ऐ-जिगर तुम भी नहीं तुम भी नहीं,
अपनी लाश आप उठाना कोई आसान नहीं,
दस्त-ऐ-बाज़ू मेरे नाकारा हुए जाते हैं।
जिनसे हर दौर में चमकी है तुम्हारी दहलीज़,
आज सजदे वही आवारा हुए जाते हैं।

दूर मंजिल थी मगर ऐसी भी कुछ दूर न थी,
ले के फिरती रही रस्ते ही में वहशत मुझ को,
एक ज़ख्म ऐसा न खाया के बहार आ जाती,
दार तक ले के गया शौक़-ऐ-शहादत मुझ को,
राह में डूब गए पाँव तो मालूम हुआ,
जुज़ मेरे और मेरा रहनुमा कोई नहीं
एक के बाद एक खुदा चला आता था,
कह दिया अक़्ल ने तंग आ के खुदा कोई नहीं।

इंशाजी क्यों आशिक हो कर

इंशाजी क्यों आशिक हो कर

इंशाजी क्यों आशिक हो कर,
दर्द के हाथों शोर करो,
दिल को और दिलासा दे लो,
मन को मियां कठोर करो।
आज हमें उस दिल की हकायत ,
दूर तलक ले जानी है,
शाख़ पे गुल है बाग़ में बुलबुल,
जी में मगर वीरानी है।
इश्क़ है रोग कहा था हम ने,
आप ने लेकिन माना भी,
इश्क़ में जी से जाते देखे, इंशा जैसे दानां भी,
हम जिस के लिए हर देस फिरे, जोगी का बदल कर भेस फिरे,
बस दिल का भरम रह जाएगा,
ये दर्द तो अच्छा कहाँ होगा.

Wednesday, December 31, 2008

जब उम्र की नकदी ख़त्म हुई-इब्ने इंशा

जब उम्र की नक़दी ख़तम हुई

अब उम्र की नक़दी ख़त्म हुई
अब हम को उधार की हाजत है
है कोई जो साहूकार बने?
है कोई जो देवन हार बने ?

कुछ साल महीने दिन लोगों!
पर सूद ब्याज के बिन लोगों !
हाँ,अपनी जाँ के खजाने से,
हाँ,उम्र के तोषे खाने से,

क्या कोई भी साहूकार नहीं?
क्या कोई देवन हार नहीं ?

जब नाम उधार का आया है,
क्यों सब ने सर को झुकाया है
कुछ काम हमें निबटाने हैं,
जिन्हें जानने वाले जानें हैं।
कुछ प्यार व्यार के धंधे हैं,
कुछ जग के दूसरे फंदे हैं।

हम मांगते नहीं हज़ार बरस,
दस पाँच बरस,दो चार बरस,
हाँ,सूद ब्याज भी दे लेंगे ,
हाँ,और खराज भी दे लेंगे,
आसान बने दुश्वार बने ,
पर कोई तो देवन हार बने।

तुम कौन?तुम्हारा नाम है क्या?
कुछ हम से तुम को काम है क्या?
क्यों इस मज्मू-अ में आयी हो?
कुछ मांगती हो ? कुछ लाई हो ?
ये कारोबार की बातें हैं,
ये नक़द उधार की बातें हैं,
हम बैठे हैं कशकोल* लिए
(कशकोल-भिखापात्र)
सब उम्र की नक़दी ख़त्म किए,
गर शायर के रिश्ते आयी हो ,
तब समझो जल्द जुदाई हो।

अब गीत गया संगीत गया,
हाँ,शा-अर का मौसम बीत गया ,
अब पतझड़ आयी,पात गिरे,
कुछ सुबह गिरें,कुछ रात गिरें,
ये अपने यार पुराने हैं,
इक उम्र से हमको जानें हैं,
उन सब के पास है माल बहोत,
हाँ ! उम्र के माह-ओ-साल बहोत,
इन सब को हमने बुलाया है,
और झोली को फैलाया है,
तुम जाओ उन से बात करें,
हम तुम से न मुलाक़ात करें।

क्या पाँच बरस ?
क्या उम्र अपनी,के पाँच बरस ?
तुम जाँ की थैली लाई हो ?
क्या पागल हो ? सौदाई हो ?
जब उम्र का आख़िर आता है ,
हर दिन सदियाँ बन जाता है।

जीने की होश ही ज़ाली है,
है कौन जो इस से खाली है,
क्या मौत से पहले मरना है?
तुम को तो बहोत कुछ करना हैं,
फिर तुम हो हमारी कौन भला?
हाँ,तुम से हमारा क्या रिश्ता?
क्या सूद ब्याज लालच है ?
किसी और खराज का लालच है?
तुम सोहनी हो,मनमोहनी हो,
तुम जा कर पूरी उम्र जियो,
ये पाँच बरस,ये चार बरस,
छिन जाएँ तो लगें हज़ार बरस।

सब दोस्त गए सब यार गए,
थे जितने साहूकार गए,
बस एक ये नारी बैठी है,
ये कौन है?क्या है?कैसी है?
हाँ उम्र हमें दरकार भी है?
हाँ,जीने से हमें प्यार भी है।

जब मांगीं जीवन की घड़ियाँ,
" गुस्ताख अँखियाँ कत जलदियां "
हम क़र्ज़ तुमें लौटा देंगे,
कुछ और भी घड़ियाँ लावेंगे,
जो सा अत माह-ओ-साल नहीं,
वोह घड़ियाँ जिन को ज़वाल* नहीं
(ज़वाल- पतन,कम होना)
लो अपने जी में उतार लिया,
लो हम ने तुम से उधार लिया।



हाट- अरुण कमल

हाट- अरुण कमल

इक दिन अब्बा ने बुलाया और कहा,

अब तुम जवान हो गए हो और मै बूढा

देसावर जाओ और कमाओ,खाओ।

माँ ने चलते वक्त बतासे दिए - खा कर पानी पीना ।

बाज़ार में बहोत सन्नाटा है ,

सारा संसार कांच के पार

और मै शीशे से नाक सटाए

इक जगह जूते देखे हिरन की खाल के ,

और कुमार गन्धर्व की भरी हुई बोली ,

अचानक मुझे नज़र आयी अमरावती नमक की डली,

जो झलकी फिर गुम हो गयी,

जिधर मंडी थी दाल की।

मेरे पास न पूंजी थी न कूवत-ऐ-खरीद,

मै बाट भी न था के हाट के आता काम ,

न पाप कमाया न पुण्य और न ही रहा

दिन भर घूमता निढाल जिस्म लिए लौटा धाम।

लेकिन वहां जहाँ घर था मेरा, घर नहीं था ,

महल था लोहे का किवाड़ और दरबान,

यहाँ मेरा घर था मेरे माँ बाप,

मेरा घर ?

दरबान हँसे-" तुम किस जनम की बात कर रहे हो ?"

बगावत-जोश मलीहाबादी

बगावत
हाँ, बगावत आग,बिजली,मौत,आंधी है मेरा नाम,
मेरे गर्दो पेश में अजल* मेरी जलवे में क़त्ल-ऐ-आम।
(*अजल-मौत)

ज़र्द हो जाता है मेरे सामने रु-ऐ-हयात,
काँप उठती है मेरी चीन-ऐ-जबीं से कायनात।

जंग के मैदान में मेरी सैफ की असरी फू
खाक बन जाती है बिजली, बर्फ हो उठती है लू।

ज़िक्र होता है मेरा पुरहौल * पैकारों के साथ,
जेहन में आती हूँ तलवारों की झंकार के साथ।

(पैकार-युद्ध , पुरहौल-भयंकर )

अशरा अशर करवटें मेरे दिल आज़ाद की ,
जिन से गिर जाती हैं डाटें क़सर अस्ताब्दाद की ।

मेरी इक जुम्बिश से होता है जहाँ ज़र ओ ज़र
मेरी सर ताबी शर्या का झुका देती है सर।

इक चिंगारी मेरी,जन्नत को करती है तबाह
माँगता रहता है मेरी आग से , दोज़ख पनाह ।

अल-हजर! मेरी मेरी कड़क का ज़ोर हंगाम-ऐ-मसाफ,
साफ़ पड़ जाता है ऐवान-ऐ-हुकुमत में शकाफ।

अशरा अशर बज्म-ऐ-हस्ती में मेरी गुल्बारियाँ,
टुकड़े टुकड़े दस्त-ओ-बाजू ,रेज़ा रेज़ा अस्त्खुन्वा ।

अलामान ओ अल हदज़!मेरी कड़क मेरा जलाल ,
खून-ऐ-सफा की गरज,तूफ़ान,बर्बादी,क़ताल ।

बर्छियां,भाले,कमानें,तीर,तलवारें,कटार,बर्कें,परचम,आलम,घोड़े,प्यादे,शहसवार ।

आँधियों से मेरी अड़ जाता है,दुनिया का निजाम।

मौत है खुराक मेरी,मौत पर जीती हूँ मै,सैर हो कर गोश्त खाती हूँ,

लहू पीती हूँ मै।

प्यास से बाहर निकल पड़ती है जब मेरी ज़बान,बहने लगती हैं सर-ऐ-मैदान

लहू की नदियाँ।

जंग की सूरत से गो हंगामा मै करती हूँ शुरू,

अमन की सुबहें मेरे खंजर से होती हैं तुलू अ ,

मेरा मोल्द मुफलिसी का दिल है उस्रत का दिमाग़।

गोद में नादारियों की परवरिश पाती हूँ मै,बेजारी के बाजुओं पर

जुल्फ बिखराती हूँ मै।

भूख हर चंद क्या क्या सर गरां होती हूँ मै,भूख ही का दूध पी पी कर जवान होती हूँ मै।

गर्म नाले मूँह अंधेरे से जगाते हैं मुझे,अश्क़-ऐ-ग़म हर सुबह आइना दिखाते हैं मुझे।

मुझको बचपन के ज़माने ही से हर सुबहो मसा,पेट की मारी हुई मख्लूक देती है अन्ज़ा।

जिस को हासिल जिंदगी का कुछ मज़ा होता नहीं,कुछ भी जिस के पास माँज़ी के सिवा होता नहीं।

जिस की चश्म तरीं यूँ खाते हैं अरमान पेंच-ओ-ताब,धर पर तलवार की जिसे श-आल-आफताब,








ग़ज़ल-फ़ैज़

गुलों में रंग भरे,बाद-ऐ-नौ-बहार चले,
चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले

कफस उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो,
कहीं तो बहर-ऐ-खुदा आज ज़िक्र-ऐ-यार चले

कभी तो सुबह तेरे कुञ्ज-ऐ-लब से हो आगाज़,
कभी तो शब्,सर-ऐ-काकुल से मुश्क बार चले।

बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल गरीब सही,
तुम्हारे नाम पे आयेंगे गमगार चले।

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब्-ऐ-हिज्राँ,
हमारे अश्क तेरे आक़बत संवार चले।

हुज़ूर-ऐ-यार हुई दफ्तर-ऐ-जुनूं की तलब
गिरह में ले के गरीबन का तार तार चले ।

मकाम फैज़ कोई राह में जचां ही नही
जो कुए यार से निकले तो सु-ऐ-गार चले।

Friday, December 26, 2008

हौसला-कैफी

हौसला

तू खुर्शीद है,बादलों में न छुप,
तू महताब है जगमगाना न छोड़,

तू शोखी है शोखी राअयत न कर,
तू बिजली है बिजली ,जलाना न छोड़,

अभी इश्क़ ने हार मानी नहीं,
अभी इश्क़ को आज़माना न छोड़.

Wednesday, December 24, 2008

शुरू करते हैं- अलिफ़ से

ا - अ-अलीफ

آ -आ-अलीफ-उल्-मद्द

ب -बे

پ -पे

ت -ते

ٹ -टे


ج - जीम

چ - च

ح - ह

خ -ख़

د - दाल

ڈ - ड- डाल

ذ -ज़-जाल

ر -र

ز - ज़

ژ - ड़

س -सीन -स

ش -शीन - श

ص-स्वाद - स

ض -द्वाद- द

ط - तोय- त

ظ - ज़ोय-ज

ع -ऐन- अ(इ,उ,ऐ)

غ -गैन-ग़

ف -फ

ق - काफ - क़

ک -काफ - क

گ - गाफ़- ग

ل - लाम- ल

م -मीम-म

ن -नून-न

ؤ -वाव-उ,व्

ۃ -ह- अः

ء- हमज़ा-,

ں - नून-ऐ-गुन्नः-अं

ئ -या-अ-महरूफ-इ,ई,य

वसीयत

वसीयत (कैफ़ी आज़मी )
(अपने बेटे बाबा के नाम)

मेरे बेटे मेरी आँखें मेरे बाद उन को दे देना
जिन्होंने रेत में सर गाड़ रखे हैं
और ऐसे मुतमईन हैं जैसे उन को
न कोई देखता है और न कोई देख सकता है ।
मगर ये वक़्त की जासूस नज़रें
जो पीछा करती हैं सबका ज़मीरों के अंधेरे तक
अँधेरा नूर पर रहता है ग़ालिब बस सवेरे तक,
सवेरा होने वाला है।

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मेरे बेटे मेरे बाद मेरी आँखें उन को दे देना,
कुछ अंधे सूरमा जो तीर अंधेरे में चलाते हैं,
सदा दुश्मन का सीना ताकते ख़ुद ज़ख्म खाते हैं,
लगा कर जो वतन को दांव पर कुर्सी बचाते हैं,
भुना कर खोटे सिक्के,धरम के जो पुन्न कमाते हैं।
जता दो उन को ऐसे ठग,कभी पकड़े भी जाते हैं।

मेरे बेटे उन्हें थोड़ी सी खुद्दारी भी दे देना
जो हाकिम क़र्ज़ ले के उसको अपनी जीत कहते हैं,
जहाँ रखते हैं सोना रहन,ख़ुद भी रहन रहते हैं,
और उसको भी वो अपनी जीत कहते हैं।
शरीक-ऐ-जुर्म हैं ये सुन के भी जो खामोश रहते हैं,
क़सूर अपना ये क्या कम है ,के हम सब उन को सहते हैं।
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मेरे बेटे मेरे बाद उन को मेरा दिल भी दे देना,
के जो शर रखते हैं सीने में अपने दिल नहीं रखते,
है इनकी आस्तीं में वो भी जो क़ातिल नहीं रखते,
जो चलते हैं उन्हीं रास्तों पे जो मंजिल नहीं रखते,
ये मजनूं अपनी नज़रों में कोई ,
महमूल नहीं रखते,
ये अपने पास कुछ भी फख्र के क़ाबिल नहीं रखते,
तरस खा कर जिन्हें जनता ने कुर्सी पर बिठाया है,
वो ख़ुद से तो न उठेंगे उन्हें तुम्हीं उठा देना
घटाई है जिन्होंने कीमत अपने सिक्के की
ये ज़िम्मा है तुम्हारा उन की कीमत तुम घटा देना,
जो वो फैलाएँ दामन ये वसीयत याद कर लेना,
उन को हर चीज़ दे देना पर, उन्हें वोट न देना।


कुत्ते - फ़ैज़


ये गलियों के आवारह बेकार कुत्ते
के बख्शा गया जिनको ज़ौक़-ऐ-गदाई
ज़माने की फटकार सरमाया उन का
जहाँ भर की दुत्कार उन की कमाई ।

न आराम शब् को न राहत सबेरे,
गलाज़त में घर नालियों में बसेरे
जो बिगडें तो एक दूसरे से लड़ा दो
ज़रा एक रोटी का टुकड़ा दिखा दो
ये हर एक की ठोकरें खाने वाले
ये फ़ाकों से उकता के मर जाने वाले
ये मज़लूम मख्लूक़ गर सर उठाएँ
तो इंसान सब सरकशी भूल जाए
ये चाहें तो दुनिया को अपना बनालें
ये आक़ाओं की हड्डियाँ तक चबा लें
कोई इन को अहसास-ऐ-ज़िल्लत दिखा दे
कोई इन की सोई हुई दुम हिला दे.





नज़्म-फ़ैज़

कुछ वोह भी हैं जो लड़ भीड़ कर
ये परदे नोच गिराते हैं
हस्ती के उठाईगीरों की
हर चाल उलझाए जाते हैं।

Tuesday, December 23, 2008

मेरे हमदम मेरे दोस्त

गर मुझे इसका यकीं हो मेरे हमदम मेरे दोस्त

गर मुझे इस बात का यकीं हो के तेरे दिल की थकन

तेरी आंखों की उदासी,तेरे सीने की जलन

मेरी दिलजोई मेरे प्यार से मिट जायेगी,

गर मेरा हर्फ़-ऐ-तसल्ली वोह दावा हो जिस से

जी उठे फिर तेरा उजडा हुआ बेनूर दिमाग

तेरी पेशानी से धुल जायें ये तजलील के दाग़

तेरी बीमार जवानी को शफा हो जाए

गर मुझे इस का यकीं हो मेरे हमदम मेरे दोस्त

रोज़-ओ-शब् शाम-ओ-सहर मै तुझे बहलाता रहूँ

मै तुझे गीत सुनाता रहूँ हलके-शीरीं

आबशारों के बहारों के चमन जारों के गीत

आमद-ऐ-सुबह के माहताब के सय्यारों के गीत

तुझ से मै हुस्न-ओ-मोहब्बत की हकायात karoon,

कैसे मग्रूर हसीनाओं के बर्फाब से जिस्म

गर्म हाथों की हरारत में पिघल जाते हैं।

कैसे इक चेहरे के ठहरे हुए मानूस नकूस

देखते देखते यकलख्त बदल जाते हैं

किस तरह आरज़-ऐ-महबूब का शफ्फाफ बलूर

यक् ब् यक् बादः इह्मर से दमक जाता है

कैसे गल्चियें के लिए झुकती है ख़ुद शाख-ऐ-गुलाब

किस तरह रात का ऐवान महक जाता है

यूंही गाता रहूँ गाता रहूँ तेरी खातिर

गीत बुनता रहूँ बैठा रहूँ तेरी खातिर

पर मेरे गीत तेरे दुःख का मुद्दवा ही नहीं

नग्माऐ-जर्राह नहीं मोन्स-ओ-ग़मख्वार सही

गीत नश्तर तो नहीं मरहम-ऐ-आज़ार सही

तेरे आज़ार का चारा नहीं नश्तर के सिवा

और ये सफ्फाक मसीहा मेरे क़ब्जे में नहीं

इस जहाँ के किसी जी रूह के क़ब्जे में नहीं

हाँ मगर तेरे सिवा तेरे सिवा तेरे सिवा ।

Sunday, December 21, 2008

Lesson-2 --

कुछ और काम करेंगे हम " आ" पर :" आ" जिसे अलीफ-उल्-मद्द कहा जाता है, अब हम उसे दूसरे और अक्षरो के साथ इस्तेमाल करेंगे:
م+آ=(म+अ=मा)

ن+آ=(न+आ=ना )

ناما (नामा)


(बाबरनामा)

ب+آ+ب+ر+ن+آ+م+آ=بابرناما


ये तो हम सब जानते है की उर्दू पढ़ी जाती है दायें से बाएं और दूसरी लिपियों (देवनागरी वगैरह) से बिल्कुल उल्टा।
अगली मुलाक़ात में आप यहाँ उर्दू के सारे अक्षर पाएंगे और तब हम आ के साथ दूसरे और भी वोवेल्स का उपयोग सीखेंगे।

आज बाज़ार में पा ब जूलां चलूँ

चश्म-ऐ-नम जाँ शोरीदा काफ़ी नहीं,
तोहमत-ऐ-इश्क पोशीदा काफ़ी नहीं,
आज बाज़ार में पा ब जूलां चलूँ।

दस्त-ऐ-अफशां चलूँ मस्त-ओ-रक्सां चलूँ,
खाक-ऐ-बर्सर चलूँ खून बदामाँ चलूँ,
राह तकता है सब शहर-ऐ-जानां चलूँ।

हाकिम-ऐ-शहर भी मजमुआ-ऐ-आम भी
तेरा इल्जाम भी,संग-ऐ-दुष्नामभी,
सुबह-ऐ-नाशाद भी रोज़-ऐ-नाकाम भी
उन् का दम साज़ अपने सिवा कौन है
शहर-ऐ-जनान में अब बा-सफ़ाकौन है
दस्त-ऐ-क़ातिल के शायाँ रहा कौन है
रख्त-ऐ-दिल बाँध लो दिल फुगारो,चलूँ
फिर हमीं क़त्ल हो आयें यारां, चलूँ ।

शब्द अनुवाद: पा ब जूलां-कैदी
शोरीदा: चिंतित,व्याकुल,खिन्न
पोशीदा: ओढा हुआ या गुप्त
दस्त-ऐ-अफशां:त्यागी,विरक्त
दुशनाम: अपशब्द
नाशाद:नाखुश,खिन्न

Saturday, December 20, 2008

Lesson-1

शुरू करते हैं -
ک-" क" ये उर्दू लिपि का अक्षर "काफ " के नाम से जाना जाता है। इस का उपयोग हमेशा किसी मातृ के साथ ही होता है ,ये तो आप जानते ही हैं।मिसाल के तौर पर यदि इसमें "आ" की मात्र जोड़ देन तो ये बन जाएगा "का":
کا=ک+ا
अगर आप जानते हैं की " ब " कैसे लिखा जाता है :
ب
तो आप ये भी जानते हैं के " बा " कैसे लिखा जाता है :
با
तो अब बच क्या है? बस यही के दो शब्दों को मिला कर इक नया शब्द बना लिया जाए :
کا+با=کابا
है न आसान,दिक्कत बस यही है की इस शब्द का मतलब नही है, क़ाबा लिखा जाता है जब " क़" के उपयोग से :
قابا
गलती सुधार ली, और बन गया सही शब्द
.

Friday, December 19, 2008

सोमनाथ-ताज के नाम

कैफ़ी की ये नज़्म- बम्बई में ताज पर हुए हमले के बाद और भी relevant(प्रसंगोचित) हो जाती है:

बुत शिकन कोई कहीं से भी न आने पाये
हमने कुछ बुत अभी सीने में सजा रखे हैं
अपनी यादों में बसा रक्खे हैं।
दिल पे ये सोच कर पथराव करो दीवानों,
के जहाँ सनम अपने हमने छुपा रक्खे हैं,
वहीँ ग़ज़नी के खुदा रक्खे हैं।

बुत जो टूटे तो किसी तरह बना लेंगे उन्हें
टुकड़े टुकड़े सही दामन में उठा लेंगे उन्हें
फिर से उजडे हुए सीने में सजा लेंगे उन्हें।
गर ख़ुदा टूटेगा,हम तो न बना पाएंगे,
उसके बिखरे हुए टुकड़े न उठा पाएंगे,
तुम उठा लो तो उठा लो शायद,
तुम बना लो तो बना लो शायद,
तुम बनाओ तो ख़ुदा जाने बनाओ कैसा?
अपने जैसा ही बनाया तो कायामत होगी
प्यार होगा न ज़माने में मोहब्बत होगी
दुश्मनी होगी अदावत होगी
हम से उसकी न इबादत होगी .

वहशत-ऐ-बुत शिकनी देख के हैरान हूँ मै
बुत परस्ती मेरा शेवा है के इंसान हूँ मै
इक न इक बुत तो हर इक दिल मैं छुपा होता है
उस के सौ नामों में इक नाम ख़ुदा होता है ।





दायरा

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे,
फिर वहीँ लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को,
उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ,
रोज़ बसते हैं कई शहर नए
रोज़ धरती मैं समा जाते हैं,
ज़लज़लों में थी ज़रा से गर्मी,
वोह भी अब रोज़ ही आ जाते हैं।

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत,
न कहीं धुप न साया न सराब
कितने अरमान हैं किस सहारा में,
कौन रखता है मजारों का हिसाब,
नब्ज़ बुझती भी,भड़कती भी है,
दिल का मआमूल है घबराना भी,
रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा,
इक आदत है जिये जाना भी ।

क़ौस इक रंग की होती है तलूअ,
एक ही चाल भी पैमाने की,
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद,
शक्ल क्या हो गई मैखाने की।
कोई कहता था समंदर हूँ मै,
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं,
खैरियत अपनी लिखा करता हूँ,
अब तो तकदीर में ख़तरा भी नहीं।
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ,
कभी क़ुरान कभी गीता की तरह,
चाँद रेखाओं में सीमाओं में,
जिंदगी क़ैद है सीता की तरह,
राम कब लौटेंगे मआलूम नहीं
काश रावण ही कोई आ जाता.






दोपहर

ये जीत हार तो इस दौर का मुकद्दर है,
ये दौर जो के पुराना भी नहीं,नया भी नहीं,
ये दौर जो क सज़ा भी नही जज़ा भी नहीं,
ये दौर जिस का बजाहिर कोई खुदा भी नहीं,
तुम्हारी जीत अहम् है न मेरी हार अहम्,
के इब्तदा भी नहीं है ये इन्तहां भी नहीं,
शुरू मुआरक-ऐ-जाम अभी हुआ भी नहीं,
शुरू हो तो ये हंगाम-ऐ-फैसला भी नहीं,
पयाम-ऐ-ज़ेर-ऐ-लब अब तक है सूद-ऐ-अस्राफिल
सुना किसी ने किसी ने अभी सुना भी नहीं,
किया किसी ने किसी ने यकींकिया भी नहीं,
उठा ज़मीं से कोई,कोई उठा भी नहीं,
ये कारवां है तो अंजाम-ऐ-कारवां मालूम
के अजनबी भी नहीं है कोई आशना भी नहीं,
किसी से खुश भी नहीं है कोई ख़फा भी नहीं,
किसी का हाल कोई मुड के पूछता भी नहीं।

Thursday, December 18, 2008

My Choice-इब्न-ऐ--मरियम

ये कविता,शायर ने बम्बई के माहीम इलाके के इक येशु की मूर्ती देखते हुए लिखी थी : इब्न-ऐ-मरियम (मरियम का बेटा) -------

तुम ख़ुदा हो, ख़ुदा के बेटे हो, या फ़क़त अमन के पयम्बर हो,
या किसी का हासी-ऐ-तख़य्युल हो,जो भी हो, मुझको अच्छे लगते हो,
मुझको सच्चे लगते हो।
इस सितारे में जिस में सदियों के,झूठ और कज्ब का घेरा है,
इस सितारे में जिस को हर रुख से रेंगती सरहदों ने घेरा है,
इस सितारे में जिस की आबादी,अम्न बोती है,ज़ंग काटती है,
रात पीती है नूर मुखड़ों का,सुबह सीनों का खून चाटती है,
तुम न होते जो जाने क्या होता,
तुम न होते तो इस सितारे में,
देवता,राक्षस,गुलाम,इमाम,
पार्सां,रिंद,रहजन,रहेबर,
ब्राह्मण,शैख़,पादरी,भिक्षु,
सभी होते मगर हमारे लिए,
कौन चढ़ता खुशी से सूली पर।

झोंपडियों में घिरा ये वीराना,
मछलियाँ दिन में सूखती हैं जहाँ,
बिल्लियाँ और बैठी रहती हैं,
और खारिश ज़दा से कुछ कुत्ते,
लेते रहते हैं बे मियाज़ाना
दम मरोड़े के कोई सर कुचले,काटना क्या वोह भोंकते भी नहीं।

और जब वोह दहकता अंगारा, छन् से सागर में डूब जाता है,
तीरगी ओढ़ लेती है दुनिया,कश्तियाँ कुछ किनारे आती हैं,
भंग,गांजा,चरस,शराब,अफ्लूँ, जो भी लायें जहाँ से भी लायें,
दौड़ते हैं इधर से कुछ साए, और सब कुछ उतार लाते हैं,

गाड़ी जाती है अदल की मिज़ान,जिस का हिस्सा उसी को मिलता है,
यहाँ खतरा नहीं खयानत का,तुम यहाँ क्यों खड़े हो मुद्दत से,
ये तुम्हारी थकी थकी भेडें
रात जिन को ज़मीं के सीने पर,
सुबह होते उंडेल देती है,
मंडियों,दफ्तरों,मिलों की तरफ़,
हांक देती,धकेल देती है
रास्ते में ये रुक नहीं सकती,
तोड़ के घुटने झुक नही सकती,
इन से तुम क्या तौक़ रखते हो,
भेडिया इन के साथ चलता है।

तकते रहते हो इस सड़क की तरफ़,
दफन जिस में कईं कहानियाँ हैं,
दफ़न जिस में कईं जवानियाँ हैं,
जिस पे इक साथ भागती फिरती हैं,
खाली जेबें भी और तिजोरियां भी
जाने किस का इंतज़ार है तुम्हे।

मुझ को देखो मै वही तो हूँ,
जिस को कोडों की छावों में दुनिया
बेचती भी खरीदती भी थी।
मुझ को देखो के मै वही तो हूँ,
जिस को खेतों से ऐसे बाँधा था,
जैसे मै इन का इक हिस्सा था,
खेत बिकते तो मै भी बिकता था।

मुझ को देखो के मै वही तो हूँ,
कुछ मशीनें बने जब मैंने,
उन् मशीनों के मालिकों ने मुझे,
बे-झिझक उन् में ऐसे झोंक दिया,
जैसे मै कुछ नहीं हूँ इंधन हूँ,
मुझ को देखो के मै थका हारा
फिर रहा हूँ युगों से आवारा
तुम यहाँ से हटो तो आज की रात,
सो रहूँ मै इसी चबूतरे पर
तुम यहाँ से हटो ख़ुदा के लिए

जाओ वोह विअतनाम के जंगल,
उस के मस्लूब शहर,ज़ख्मी गाँव,
जिन को इंजील पढने वालों ने,
रौंद डाला है फूँक डाला है
जाने कब से पुकारते हैं तुम्हें ।

जाओ इक बार फिर हमारे लिए
तुम को चढ़ना पडेगा सूली पर.








Monday, December 8, 2008

कौन चलाये मिल का पहिया

This is the most wonderful :

कौन चलाये मिल का पहिया

कौन चलाये मिल का पहिया,मेहनत वाला हैय्या हैय्या,

कौन कमाए टका रुपैया,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

कौन बिछाए ये हरया वल,कौन उगाए गेहूं चावल,

गन्ना,सरसों,तोरी,घिया,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

कौन बुने ये लट्ठा खद्दर,तहमद,कुरता,चोली,चद्दर,

कौन सभी को करे मुहैय्या, मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

अब तक जो मजलूम रहा है, दुःख जिस का मक़्सूम रहा है,

आया उस का दौर है भैय्या, मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

अपनी खेती आप ही मालिक,अपनी मिल है आप ही चालक ,

अपनी कश्ती आप खेवय्या,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

ख़त्म हुई बेगार गुलामी,आई है सरकार अवामी,

मरती है खर्कार की मैय्या,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

जागे हैं हारी बेगारी, मजदूरों की आयी बारी,

बदलेगा अब सेठ रुइय्या ,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

हम भी इन का हाथ बताएं, हम भी एन के आड़े आयें,

इंशाजी हाँ करो तिहैय्या ,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

हम भी इन्हीं की मेहनत खाएं, आज से इनकी महिमा गाएं,

इंशाजी हाँ,करो तिहैय्या,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।

ग़ालिब

गई वोह बात के हो गुफ्तगू तो क्यों कर हो
कहे से कुछ न हुआ " फिर कहो " -तो क्यों कर हो?
हमारे ज़हन में इस फिक्र का है नाम विसाल
के गर "न हो "तो कहाँ जाएँ " हो " - तो क्यों कर हो ?
अदब है और यही कशमकश तो क्या कीजिए ?
हया है और यही गो मगो- तो क्यों कर हो ?
तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का
बुतों की हवा गर ऐसी ही खु -तो क्यों कर हो?
उलझते हो तुम अगर देखे हो आइना
जो तुम से शहर में हों एक दो- तो क्यूँ कर हो?
जिसे नसीब हो रोज़ स्याह मेरा सा,
वोह शख्स दिन न कहे रात को- तो क्यों कर हो?
हमें फिर उन से उम्मीद और उन्हें हमारी क़द्र?
हमारी बात बात ही पूछें न वोह -तो क्यों कर हो ?
ग़लत न था ' हमें ख़त पर ' गुमानतसल्ली का
न माने ' दीद, दीदार जो ' -तो क्यों कर हो?
बताओ उस मशर को देख कर के मुझ को करार ,
ये नेश हो रग-ऐ-जान में फरो- तो क्यूँ कर हो?

मुझे जुनून नहीं ग़ालिब वले बकूल-ऐ-हज़रत
फिराक-ऐ-यार में तस्कीं हो तो- क्यूँ कर हो?

Saturday, November 29, 2008

गीत- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

चलो फिर से मुस्कुराएँ,चलो फिर से दिल जलाएँ
जो गुज़र गई हैं रातें,उन्हें फिर जगा के लायें,
जो बिसर गई हैं बातें,उन्हें याद में बुलाएँ
चलो फिर से दिल लगाएं चलो फिर से मुस्कुराएँ।

किसी शै नशीं पे झलकी, वोह धनक किसी क़बा की,
किसी रग में कसमसाई, वो कसक किसी अदा की,
कोई हर्फ़-ऐ-बे-मुरव्वत,किसी कुंज-ऐ-लब से छूटा
वोह छनक के शीशा-ऐ-दिल,ते बाम फिर से टूटा ,
ये मिलन की , ना मिलन की ,ये लगन की और जलन की,
जो सहीं हैं वारदातें ,जो गुज़र गई हैं रातें,
जो बिसर गयी हैं बातें।
कोई इन की धुन बनाएं, कोई इन का गीत गाएं,
चलो फिर से मुस्कुराएं,चलो फिर से दिल जलाएँ।

शायर लोग-दो नज्में-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हर इक दौर में हम, हर ज़माने में हम
दीन-ओ-दुनिया की दौलत लुटाते रहे
फिक्र-ओ-फाके का तोषा संभाले हुए
जो भी रास्ता चुना उस पे चलते रहे
माल वाले हिक़ारत से तकते रहे
त-आन करते रहे हाथ मलते रहे
हम ने उन पर किया हर्फ़-ऐ-हक़ संग ज़न
जिनकी सोहबत से दुनिया लरज़ती रही
जिन पे आंसू बहाने को कोई न था
अपनी आँख उनके ग़म में बरसती रही
सब से ओझल हुए हुक्म-ऐ-हाकिम पे हम
क़ैद खाने सहे ताजियाने सहे
लोग सुनते रहे साज़-ऐ-दिल की सदा
अपने नग्में सलाखों से छनते रहे
खुन्च्का दहर का खुन्च्का आइना
दुःख भरी खलक का दुःख भरा दिल हैं हम

Thursday, November 27, 2008

दावत-कैफ़ी आज़मी


This was the nazm,I always use to recite,whenever in company of friends,Kaifi Aazami has
opened the doors to self search and this inquisitiveness leads to paths of realization.
कोई देता हैं डर-ऐ-दिल पे मुसलसल आवाज़
और फिर अपनी ही आवाज़ से घबराता है
अपने बदले हुए अंदाज़ का एहसास नहीं
मेरे बहके हुए अंदाज़ से घबराता है।
साज़ उठाया है के मौसम का तकाज़ा था यही
काँपता हाथ मगर साज़ से घबराता है,
राज़ को है किसी हमराज़ की मुद्दत से तलाश,
और दिल सोहबत-ऐ-हमराज़ से घबराता है।
शौक़ ये है के उडे वो तो ज़मीन साथ उडे
हौसला यह है के परवाज़ से घबराता है।
तेरी तकदीर मैं आसाइश-ऐ-अंजाम नहीं
ऐ के तू शोरिश-ऐ-आगाज़ से घबराता है।

कभी आगे कभी पीछे कोई रफ़्तार है ये
हम को रफ़्तार का आहंग बदलना होगा
ज़हन के वास्ते सांचे तो न ढलेगी हयात
ज़हन को आप ही हर सांचे में ढलना होगा
ये भी जलना कोई जलना है के शोला न धुवां
अब जला देंगे ज़माने को जो जलना होगा
रास्ते घूम के सब जाते हैं मजिल की तरफ़
हम किसी रुख से चलें ,साथ ही चलना होगा।

नजराना- कैफी आज़मी

तुम परेशां न हो बाब ऐ करम वां न करो
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊँगा
इस कूचे मैं जहाँ चाँद उगा करते हैं,शब् ऐ तारीक़ गुज़रूँगा,चला जाऊँगा
रास्ता भूल गया या यही मंजिल है मेरी
कोई लाया हैं के ख़ुद आया हूँ मालूम नहीं
कहते हैं हुस्न की नज़रें भी हसीं होती हैं
मै भी कुछ लाया हूँ क्या लाया हूँ मालूम नहीं
यूँ तो जो कुछ था मेरे पास मै सब बेच आया
कहीं इनाम मिला कहीं क़ीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आँखों मैं छुपा रखा है
देखो लो और न देखो तो शिकायत भी नहीं

इक तो इतनी हसीं दूसरे ये आराइश
जो नज़र पड़ती है चेहरे पे ठहर जाती है
मुस्कुरा देती हो रस्मन भी अगर महफ़िल में
इक धनक टूट के सीनों में बिखर जाती है ।
गर्म बोसों से तराशा हुआ नाज़ुक पैकर
जिस की एक आंच से हर रूह पिघल जाती है
मैंने सोचा है तो सब सोचते होंगे शायद,
प्यास इस तरह भी क्या सांचे मैं ढल जाती है ?
क्या कमी है जो करोगी मेरा नजराना कबूल
चाहने वाले बहोत चाह के अफसाने बहोत
इक ही रात सही गर्मी-ऐ-हंगामा-ऐ-इश्क
इक ही रात मैं जल मरते हैं परवाने बहोत।

फिर भी इक रात मैं सौ तरह के मोड़ आते हैं
काश तुमको कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो घेरे रहे दुनिया तुमको
और इस तरह के जिस तरह कोई पास न हो ।

आज की रात जो मेरी ही तरह तनहा है
मै किसी तरह गुज़रूँगा चला जाऊंगा,
तुम परेशां न हो बाब-ऐ-करम वां न करो
कुछ देर और पुकारूँगा चला जाऊंगा ।

पांव से लहू को धो डालो- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

हम क्या करते, किस राह चलते
हर राह मैं कांटे बिखरे थे ।
उन रिश्तों के जो छूट गए
उन सदियों के यारानो के,
जो इक इक कर के टूट गए
जिस राह चले जिस समत गए
यूँ पाँव लहू लुहान हुए
सब देखने वाले कहते थे
यह कैसी रीत रचाई है,
यह मेहंदी क्यों लगाई है
वोह कहते थे क्यों काहाज़-ऐ- वफ़ा
का नाहक चर्चा करते हों !
पाँव से लहू को धो डालो
यह राहें जब अट जायेंगी
सौ रास्ते इन से फूटेंगे
तुम दिल को सम्हालो जिस में अभी
सौ तरह के नश्तर टूटेंगे .