This is for all those who love urdu,would like to Read and write Urdu.
Thursday, May 21, 2009
Wednesday, May 20, 2009
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं- ग़ज़ल-फ़ैज़
जैसे बिछडे हुए काबे में सनम आते हैं।
एक एक करके हुए जाते है तारे रोशन,
मेरी मंज़िलकी तरफ़ तेरे क़दम आते हैं।
रक़्स-ऐ-मय तेज़ करो साज़ की लय तेज़ करो ,
सू-ऐ-मैखाना सफीरान-ऐ-हरम आते हैं।
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने काम दिमाग़
वो तो जब आते हैं माइल ब करम आते हैं।
और कुछ देर न गुज़रे शब्-ऐ-फुरकत से कहो ,
दिल भी कम दुखता है,वो याद भी कम आते हैं।
सफीरान-दूत,नामावर,संदेश वाहक .
हरम - काबा,ख़ुदा का घर
सू-ऐ-मैखाना-मैखाने की तरफ,मैखाने की ओर।
माइल ब करम-कृपालू,कृपादृष्टि दिखाने की दृष्टी।
This is how i start
The concept here is that if you know hindi grammer,you would know urdu as well.Once you start getting hang of the scrpit and the way its read and written,everything else depend upon how viciously one would persuade the study.Let me come back to how i started.
I baught a book "Daag ki Shaayari" which was a collection of poems by Daagh Dehlvi,It had
the poems in urdu on one side and same in devnagri scrpit on other with explaination for difficult words.I tried comparing and kept an alpabet guide with me,I started writing the words with the help of the guide and found joining the alphabets to form a word was a difficult part.The alphabets changed their appearence once they became part of the words.
The letter ن which is "N" or "न " changed its appearance once an آ was connected to it and became نا
Lets see how "i" or "इ" changes its apperaence:
غ+آ+ل+ی+ب =غالیب
Did you notice how "इ " changed its appearence to two small dots and a curve connecting "ल " and "ब".
By the way the word you just learnt is "ग़ालिब "-Takhallus used by undisputed King of Urdu poetry Mirza Asadullah Khan.
Saturday, May 16, 2009
रंग-ऐ-पैराहन-फ़ैज़
मौसम-ऐ-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम।
दोस्तों,उस चश्म-ओ-लब की कहो जिसके बगैर,
गुलिस्तान की बात रंगीं है न मैखाने का नाम।
फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शम्में जलीं,
फिर तसव्वुर ने किया उस बज़्म में जाने का नाम।
नज़राना-कैफ़ी आज़मी
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊंगा
इस कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं ,शब्-ऐ-तारीक़ गुजारूँगा, चला जाऊँगा।
रास्ता भूल गया या यही मंजिल है मेरी,
कोई लाया है के ख़ुद आया हूँ मालूम नहीं
कहते हैं हुस्न की नज़रें भी हसीं होती हैं
मै भी कुछ लाया हूँ, क्या लाया हूँ मालूम नहीं ।
यूँ तो जो कुछ भी था मेरे पास मै सब बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं कीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रखा है
देख लो , और न देखो तो शिकायत भी नहीं।
एक तो इतनी हसीं दूसरे ये आराइश ,
जो नज़र पड़ती है चेहरे पे ठहर जाती है,
मुस्कुरा देती हो अगर रस्मन भी कभी महफिल में
एक धनक टूट के सीने में बिखर जाती है।
गर्म बोसों से तराशा हुआ नाज़ुक पैकर,
जिसकी इक आंच से हर रूह पिघल जाती है,
मैंने सोचा है तो सब सोचते होंगे शायद,
प्यास इस तरह भी क्या सांचे में ढल जाती है।
क्या कमी है जो करोगी मेरा नजराना कबूल,
चाहने वाले बहोत चाह के अफ़साने बहोत,
एक ही रात सही गर्मी-ऐ-हंगाम-ऐ-इश्क़,
एक ही रात में जल मरते हैं परवाने बहोत।
फिर भी एक रात में सौ तरह के मोड़ आते हैं,
काश तुमको कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो घेरे रहे दुनिया तुम को,
और इस तरह की जिस तरह कोई पास न हो।
आज की रात जो मेरी ही तरह तनहा है
मै किसी तरह गुजारूँगा, चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ऐ-करम-वाँ न करो
और कुछ देर पुकारूँगा,चला जाऊंगा।
Friday, May 15, 2009
रहिये अब ऐसी जगह-ग़ालिब
हम सुखन कोई न हो और हम ज़बां कोई न हो।
बे दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए,
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो बीमार दार,
और अगर मर जाएँ तो नोचख्वां कोई न हो।
Thursday, May 14, 2009
गई वो बात के - ग़ालिब
कहे से कुछ न हुआ , फिर हो ,तो क्यों कर हो ?
हमारे ज़हन में इस फ़िक्र का है नाम विसाल ,
के गरन हो तो कहाँ जाएँ, हो तो क्यों कर हो?
अदब है और यही कशमकश तो क्या कीजे,
हया है और यही गोमगो तो क्यों कर हो?
तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का,
बुतों की हो अगर ऐसी ही खु तो क्यों कर हो?
उलझते हो तुम अगर देखते हो आइना,
जो तुम से शहर में हों एक,दो,तो क्यों कर हो?
जिसे नसीब हो रोज़-ऐ-स्याह मेरा सा
वो शख्स दिन न कहे रात को,तो क्यों कर हो?
हमें फिर उन से उम्मीद, और उन्हें हमारी क़द्र!
हमारी बात ही पूछें न वो तो क्यों कर हो?
गल्त न था हमें ख़त पर गुमाँ तसल्ली का,
न माने दीद-ओ-दीदार जो, तो क्यों कर हो?
मुझे जुनूँ नहीं ग़ालिब! वले बकौल-ऐ-हुज़ूर,
फिराक-ऐ-यार में तस्कीँ हो,तो क्यों कर हो?
मेहरबां हो के-ग़ालिब
मै गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूं ।
दअफ़ में ताना-ग़यारक्या शिकवा क्या है?
बात कुछ सर तो नहीं है के उठा भी न सकूं
ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर ! वरना
क्या क़सम है तेरे मिलने की के खा भी न सकूं ।
Wednesday, May 13, 2009
इंशाजी क्या बात बनेगी
इंशाजी क्या बात बनेगी,हम लोगों से दूर हुए,
हम किस दिल का रोग बने,किस सीने का नासूर हुए,
बस्ती बस्ती आग लगी थी,जलने पर मजबूर हुए,
रिन्दों में कुछ बात चली थी,शीशे चकनाचूर हुए।
लेकिन तुम क्यों बैठे बैठे आह भरे रंजूर हुए,
अब तो एक ज़माना गुज़रा,तुम से कोई क़सूर हुए।
ऐ लोगों क्यों भूली बातें याद करो,क्या याद दिलाव
काफ़िले वाले दूर गए,बुझने दो गर बुझता है अलाव.
एक मौज से रुक सकता है तूफानी दरिया का बहाव?
समय समय का राग अलग है समय समय का अपना भाव.
आस की उजड़ी फुलवारी में यादों के गुंचे न खिलाओ,
पिछले पहर के अंधियारे में काफुरी शम्में न जलाओ।
इंशाजी वही सुबह की लाली,इंशाजी वही शब् का समां,
तुम्ही ख़याल की जगर मगर में भटक रहे हों जहाँ तहां.
वही चमन वही गुल बूटे हैं,वही बहारें वही खज़ां,
इक कदम की बात है यूँ तो रूपहले खाबों का जहाँ.
लेकिन दूर उफ़क़ पर देखो लहराता घनघोर धुंवां,
बादल बादल उमड़ रहा है सहज सहज पेचां पेचां।
मंजिल दूर देखे तो राही राह में बैठा रहे सताए
हम भी तीस बरस के मांदे,यूंही रूप नगर हो आए
रूप नगर की राजकुमारी,सपनों में आए बहलाए,
क़दम क़दम पर मदमाती मुस्कान बिखेरे,हाथ न आए।
चंद्रमा महाराज की ज्योति ,तारे हैं आपस में छुपाए,
हम भी घूम रहे हैं ले कर कासा अंग भभूत रमाए,
जंगल जंगल घूम रहे हैं रमते जोगी सीस नवाए।
तुम परियों के राज दुलारे तुम ऊंचे तारों के कोई,
हम लोगों के पास यही उजड़ा अम्बर उजड़ी धरती.
तुम तो उड़न खटोले ले कर पहुँचो तारों की नगरी,
हम लोगों की रूह कमर तक धरती के दलदल में फँसी.
तुम फूलों की सेजें धुन्धो और नदिया संगीत भरी
हम पतझड़ की उजड़ी बेलें ज़र्द ,ज़र्द,उलझी,उलझी।
हम वो लोग हैं गिनते थे जिन को तुम प्यारों में,
हाल हमारा सुनते थे तो लोटते थे अंगारों में।
आज भी कितने नाग छुपे हैं,दुशमन के बमबारों में,
आते हैं नैपाम उगाते वहशी सब्ज़ जारों में ।
आह सी भर के रह जाते हो बैठ के दुनिया दारों में,
हाल हमारा छपता है जब ख़बरों में अखबारों में।
औरों की तो बातें छोडो, और तो जाने क्या क्या थे,
रुस्तम से कुछ और दिलावर,भीम से बढ़ कर योध्हा थे।
लेकिन हम भी तुंद बच्रती मौजों का इक धारा थे,
अन्याय के सूखे जंगल को झुलसाती इक ज्वाला थे।
ना हम इतने चुप चुप थे तब,ना हम इतने तनहा थे,
अपनी ज़ात में राजा थे हम,अपनी ज़ात में सेना थे।
तूफानों का रेला थे हम,बलवानों की सेना थे.
Tuesday, May 12, 2009
ग़ालिब
खाक ऐसी जिंदगी पे के पत्थर नहीं हूँ मै ।
क्यों गर्दिश-ऐ-मुद्दाम से घबरा न जाए दिल ?
इंसान हूँ,प्याला-ओ-सागर नहीं हूँ मै।
या रब! ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए?
लोह-ऐ-जहाँ पे हर्फ़-ऐ-मुकद्दर नहीं हूँ मै।
हद चाहिए सज़ा में अकूबत के वास्ते,
आख़िर गुनाहगार हूँ,काफिर नहीं हूँ मै।
किस वास्ते अज़ीज़ नहीं जानते मुझे,
लाल-ओ-ज़म्रद-ओ-ज़ेर-ओ-गौहर नहीं हूँ मै।
रखते हो तुम क़दम मेरी आंखों से क्यों दरेग़,
रुतबे में महरो माह से कमतर नहीं हूँ मै
करते हो मुझको मना क़दमबोस किस लिए?
क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मै?
ग़ालिब ! वज़ीफ़ख्वार हूँ ,दूँ शाह को दुआ,
वोह दिन गए के कहते थे " नौकर नहीं हूँ मै"
दाइम -हमेशा,निरंतर।
गर्दिश-ऐ-मुद्दाम-निरंतर बदकिस्मती।
हर्फ़-अक्षर,लिखा हुआ।
अकूबत-दर्द।
काफिर-नास्तिक,न मानने वाला।
ज़म्रद-पन्ना।
ज़ेर-सोना।
गौहर-मोती।
दरेग़-दूर जाना,पल्ला झाड़ना।
क़दमबोस-पैर चूमना।
Monday, May 11, 2009
हम पर तुम्हारी चाह का- फ़ैज़
करते हैं जिस पे तआना कोई जुर्म तो नहीं,शौक-ऐ-फिज़ूल उल्फ़त-ऐ-नाकाम ही तो है।
दिल मुद्दईके हर्फ़-ऐ-मलामत से शाद है, ऐ जानेजां ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है।
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-तकदीर तो नहीं,दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-अय्याम ही तो है।
आख़िर तू एक रोज़ करेगी नज़र-ऐ-वफ़ा,वोह यार खुश-ख़सालसर-ऐ-बाम ही तो है।
भीगी है रात फैज़ ग़ज़ल इब्तदा करो,वक़्त-ऐ-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है।
- दुष्नाम-गाली
- इकराम-ईनाम
- उल्फ़त-प्यार
- मुद्दई-दुश्मन
- अय्याम-कुछ वक़्त ,कुछ दिन।
- हंगाम-वक़्त
Wednesday, May 6, 2009
जौहर
मै शोला था------मगर यूँ राख के तूदे ने सर कुचला,
के इक सिले से पेंच ओ ख़म में ढल जाना पड़ा मुझको।
मै बिजली था------मगर वोह बर्फ आ गयी बदलियाँ छाईं ,
के दब के उन चट्टानों में पिघल जन पड़ा मुझको।
मै तूफ़ान था------मगर क्या कहें उस तशन समंदर को,
के सर टकरा के साहिल ही से रुक जाना पड़ा मुझको।
मै आंधी था-मगर वोह खाव्ब आलूदा फिजा पायी,
के ख़ुद अपनी ही ठोकर खा के झुक जाना पड़ा मुझको।
मगर अब इस का रोना क्या है, क्या था देखिये क्या हूँ!
मै इक ठिठुरा हुआ शआला हूँ,इक सिकुडी हुई बिजली,
अशर नश्व ओ नुमा पर डाल ही देता है गहवारा ,
मै इक सिमटा हुआ तूफ़ान हूँ,एक सहमी हुई आंधी।
मगर म्आबूद बेदारी ! कहिए,फितरत बदलती है,
धुवें को गर्म होने दे,भड़कना अब भी आता है,
मेरी जानिब से इत्मीनान रख आतिश-ऐ-नूर-ऐ-रहबर,
ज़रा बादल तो बिखराएं,कड़कना अब भी आता है।
थपेडे हाँ यूँहीं पैहम,थपेडे मौज-ऐ-आज़ादी,
बहा दूँगा मताअ कश्ती-ऐ-महकूमी बहा दूँगा,
झकोले हाँ यही झकोले सर सर-ऐ-हस्ती,
हिला दूँगा तदाद-ऐ- ज़िस्त की चूली हिला दूँगा।
- अशर-दुष्ट
- गहवारा-पलना,झूला।
- नश्व ओ नुमा-पालनपोषण
- म्आबूद-खुदा,परमेश्वर।
- बेदारी-जागृति,कृपा।
- पैहम-निरंतर
- मताअ-सम्पत्ती।
- महकूमी-गुलामी।
- तदाद-दुश्मनी।
- चूली-डरपोकपन,नामर्दगी।
- ज़िस्त-अस्तित्व,जिंदगी.
Tuesday, May 5, 2009
नाक़िस भारती
निकाले हुए फिर बुलाए गए,दगाबाज़ सर पर बिठाए गए,
बहुत दिन से था दिल में ये पेंच ओ ताब,
मिले खिद्र का कोई बढ़िया जवाब ,
जो इतना ही भारी ज़मींदार हो,जो ऐसा ही महबूब सरकार हो,
पडी नून पर जब लीग की नज़र,गले से लगा ही लिया दौड़ कर।
"चमकदार कीडा जो भाया उसे,तो टोपी में झट पट छिपाया उसे "
Malik Sir Feroz Khan Noon was high commissioner of india to the united kingdom during 1936-1941 and seventh prime minister of Pakistan,The post here discribes the opportunistic move by Muslim League when it picked Noon from government service and appointed him in higher ranks of the party.In 1947,Noon was sent as Quaid-i-Azam Muhammad Ali Jinnah's special envoy to some countries of the Muslim world. This one-man delegation was the first official mission sent abroad by the Pakistani government.
Wednesday, April 29, 2009
तुम अपनी करनी कर गुज़रो
अब क्यों उस दिन का जिक्र करो,जब दिल टुकड़े हो जाएगा,और सारे ग़म मिट जाएँगे,
जो कुछ पाया खो जाएगा,जो मिल न सका वो पाएंगे।
ये दिन तो वही पहला दिन है,जो पहला दिन था चाहत का,हम जिस की तमन्ना करते रहे ,और जिस से हर दम डरते रहे
ये दिन तो कितनी बार आया,सौ बार बसे और उजड़ गए ,सौ बार लुटे और भर पाया।
अब क्यों उस दिन की फ़िक्र करो,जब दिल टुकड़े हो जाएगा और सारे ग़म मिट जायेंगे ,
तुम खौफ ओ खतरे से डर गुजरो,जो होना है सो होना है ,
गर हँसना है तो हँसना है,गर रोना है तो रोना है।
तुम अपनी करनी कर गुज़रो,जो होगा देखा जाएगा.
Tuesday, April 28, 2009
दाग्स्तानी खातून और शायर बेटा
उस ने जब बोलना न सीखा था,
उस की हर बात मै समझती थी
अब वो शायर बना है नाम-ऐ-खुदा
लेकिन् अफ़सोस कोई बात उस की
मेरे पल्ले ज़रा नही पड़ती।
भाई
स्तालिनग्राद की जंग में काम आया था।
मेरी माँअब भी लिए फिरती है पहलू में ये ग़म
जब से अब तक है वही तन पे रू-ऐ-मातम।
और इस दुःख से मेरी आँख काम गोशा तर है,
अब मेरी उम्र मेरे भाई से कुछ बढ़ कर है।
Sunday, January 25, 2009
सोच
छोड़ो मेरी राम कहानी,मै जैसा भी हूँ ,अच्छा हूँ।
मेरा दिल ग़मगीं है तो क्या,ग़मगीं ये दुनिया है सारी,
ये दुःख तेरा है न मेरा,हम सब की जागीर है प्यारी।
तू गर मेरी भी हो जाए,दुनिया के ग़म यूंही रहेंगे,
पाप के फंदे,ज़ुल्म के बंधन ,अपने कहे से कट न सकेंगे।
ग़म हर हालत में महलक है,अपना हो या और किसी का,
रोना,धोना,जी को जलाना,यूँ भी हमारा,यूँ भी हमारा।
क्यों न जहाँ का ग़म अपना लें,बाद में सब तदबीरें सोचें,
बाद में सुख के सपने देखें,सपनों की तआबीरें सोचें,
बेफिक्र धन दौलत वाले,ये आख़िर क्यों खुश रहते हैं?
उनका सुख आपस में बाटें,ये भी आख़िर हम जैसे हैं।
हम ने माना जंग कड़ी है,सर फूटेंगे खून बहेगा,
खून में ग़म भी बह जाएँगे,हम न रहें ग़म भी न रहेगा।
Saturday, January 24, 2009
इंशाजी- हाँ तुन्हें भी देखा
इंशाजी,हाँ,तुम्हें भी देखा,दर्शन छोटे नाम बहुत ,
चौक में खोटा माल सजा कर ले लेते हो दाम बहोत,
यूँ तो हमारे दर्द में घायल,सुबह बहोत हो शाम बहोत,
इक दिन साथ हमारा दोगे इस में हमें कलाम बहोत।
बातें जिन की गर्म बहोत हैं,काम उन्हीं के खाम बहोत,
कॉफी के हर घूँट पे, दो हांकने में आराम बहोत।
दुनिया की औकात कही,कुछ अपनी भी औकात कहो,
कब तक चाक-ऐ-दहन को सी कर गूंगी बहरी बात कहो,
दाग़-ऐ-जिगर को ला लाए रंगीं,अश्कों को बरसात कहो,
सूरज को सूरज न पुकारो,दिन को अंधी रात कहो.
हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना
हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना
वोह आज की महफ़िल में, हम को भी न पहचाना,
क्या सोच लिया दिल में, क्यों हो गया बेगाना,
हाँ, ऐ दिल-ऐ-दीवाना।
वो आप भी आते थे,हम को भी बुलाते थे,
किस चाह से मिलते थे,क्या प्यार बताते थे,
कल तक जो हक़ीक़त थी,क्यों वोह आज है अफसाना,
हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना।
बस ख़त्म हुआ किस्सा, अब ज़िक्र न हो उसका,
वो शख्स-ओ-फा-ओ-शमन,अब अपना हुआ दुश्मन,
अब उस से नहीं मिलन,
घर उस के नहीं जाना,हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना।
हाँ,कल से न जाएँगे,पर आज तो हो आएं,
उस को नहीं पा सकते,अपने ही को खो आएं,
तू बाज़ न आएगा,मुश्किल तुझ को समझाना,
वो भी तेरा कहना था,ये भी तेरा फरमाना,
चल,ऐ दिल-ऐ-दीवाना.
साँप
साँप
ये साँप जो आज फन फैलाए,मेरे रास्ते में खड़ा है,
पड़ा था कदम मेरा चाँद पर जिस दिन,
इसी दिन इसे मार डाला था मैंने,
उखाड़ दिए थे सब दांत कुचला था सर भी ,
मरोड़ी थी दुम,तोड़ दी थी कमर भी।
मगर चाँद से झुक के देखा जो मैंने,
तो दुम इस की हिलने लगी थी,
ये कुछ रेंगने भी लगा था।
ये कुछ रेंगता कुछ घिसटता हुआ,
पुराने शिवाले की जानिब बढ़ा,
जहाँ दूध इस को पिलाया गया,पढ़े पंडितों ने कईं मन्त्र ऐसे,
ये कमबख्त फिर से जिलाया गया।
शिवाले से निकला ये फुंकारता,
रग़-ऐ-अर्ज़ पर डंक सा मारता,
बढ़ा मै के इक बार फिर सर कुचल दूँ,
इसे भारी क़दमों से अपने मसल दूँ,
करीब एक वीरान मस्जिद थी,ये मस्जिद में जा छुपा।
जहाँ इस को पट्रोल से गुस्ल दे कर,
हसीं एक तावीज़ गर्दन में डाला गया,
हुआ सदियों में जितना इंसान बुलंद,
ये कुछ उस से भी ऊंचा उछाला गया,
उछल के ये गिरजा की दहलीज़ पे जा गिरा,
जहाँ इस को सोने की केंचुली पहनाई गई,
सलीब एक चाँदी की, सीने पर इस के सजाई गई,
दिया जिस ने दुनिया को पैगाम-ऐ-अमन
उसी के हयात-आफरीन नाम पर इसे जंग बाज़ी सिखाई गई,
बमों का गुलुबन्द गर्दन में डाला और इस धज से मैदान में इस को निकला,
पड़ा इस का धरती पर साया तो धरती की रफ़्तार रुकने लगी,
अँधेरा अँधेरा ज़मीन से फ़लक़ तक अँधेरा,
जबीं चाँद तारों की झुकने लगी।
हुई जब से साइंस ज़र की मती-अ
जो था अलम का ऐतबार वो उठ गया,
और इस साँप को जिंदगी मिल गयी,
इसे हम ने ज़ह्हाक के भारी काँधे पे देखा था एक दिन,
ये हिन्दू नहीं है मुसलमां नहीं,
ये दोनों का मग्ज़-ओ-खून चाटता है,
बने जब हिन्दू मुसलमान इंसान,
उस दिन ये कमबख्त मर जाएगा.
बहरूपनी
बहरूपनी
एक गर्दन पे सैकड़ों चेहरे,
और उन चेहरों पे हजारों दाग,
और हर दाग बंद दरवाज़ा,
रौशनी इन से आ नहीं सकती,
रोशनी इन से जा नही सकती।
तंग सीना है हौद-मस्जिद का,
दिल वोह दोना,पुजारियों के बाद,
चाटते रहते हैं जिसे कुत्ते,
कुत्ते दोना जो चाट लेते हैं,
देवताओं को काट लेते हैं।
जाने किस कोख ने जना इस को,
जाने किस ज़हन में जवान हुई,
जाने किस देस से चली कमबख्त,
वैसे ये हर ज़बान बोलती है,
ज़ख्म खिड़की की तरह खोलती है.
और कहती है झाँक कर दिल में,
तेरा मज़हब तेरा अज़ीम ख़ुदा,
तेरी तहज़ीब के हसीं सनम,
सब को खतरे ने आन घेरा है,
बाद उन के जहाँ अँधेरा है।
सर्द हो जाता है लहू मेरा,
बंद हो जाती है खुली आंखे,
सभी दुश्मन हैं कोई दोस्त नही,
मुझ को जिंदा निगल रही है ज़मीन।
ऐसा लगता है राक्षस कोई,
एक गागर कमर में लटका कर,
आसमान पे चढेगा आख़िर-ऐ-शब्,
नूर सारा निचोड़ लाएगा
मेरे तारे भी तोड़ लाएगा ।
ये जो धरती का फट गया सीना,
और बाहर निकल पड़े हैं जुलुस ,
मुझ से कहते हैं तुम हमारे हों,
मै अगर इन का हूँ तो मै क्या हूँ,
मै किसी का नहीं हूँ अपना हूँ।
मुझ को तन्हाई ने दिया है जनम,
मेरा सब कुछ अकेलेपन से है,
कौन पूछेगा मुझ को मेले में?
साथ जिस दिन कदम बढाऊंगा,
चाल मै अपनी भूल जाऊंगा।
ये, और ऐसे ही चंद और सवाल,
ढूँढने पर भी आज तक मुझ को,
जिन के माँ बाप का मिला न सुराग़,
ज़हन में ये उंडेल देती है,
मुझ को मुट्ठी में भींच लेती है,
चाहता हूँ की क़त्ल कर दूँ इसे,
वार लेकिन जब इस पर करता हूँ,
मेरे सीने पे ज़ख्म उभरते हैं,
जाने क्या मेरा इसका रिश्ता है।
आँधियों में अज़ान दी मैंने,
शंख फूँका अँधेरी रातों में,
घर के बाहर सलीब लटकाई,
एक एक घर से इस को ठुकराया,
शहर से दूर जाके फ़ेंक आया।
और ऐलान कर दिया के उट्ठो,
बर्फ सी जम गयी है सीने में,
गर्म बोसों से इस को पिघला दो,
कर लो जो भी गुनाह वो कम है,
आज की रात जश्न-ऐ-आदम है,
ये मेरी आस्तीन से निकली,
रख दिया दौड़ के चराग़ पर हाथ,
मल दिया फिर अँधेरा चेहरे पर,
होंठ से दिल की बात लौट गयी,
दर तक आ के बारात लौट गयी।
इस ने मुझ को अलग बुला के कहा,
आज की जिंदगी का नाम है खौफ़।
खौफ़ ही वोह ज़मीं है जिस में ,
फ़र्क़ी उगती है,फ़र्क़ी पलती है,
धारें, सागर से कट चलती हैं।
खौफ़ जब तक दिलों में बाकी है,
सिर्फ़ चेहरा बदलते रहता है,
सिर्फ़ लहज़ा बदलते रहता है,
कोई मुझ को मिटा नही सकता,
जश्न-ऐ-आदम मना नहीं सकता.
आज की रात बहोत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो,मै भी उठूँ,तुम भी उठो,तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।
ये ज़मीन तब भी निगल लेने पे आमादा थी,
पाँव जब टूटती शाखों से उतारे हम ने,
उन मकानों को ख़बर है न मकीनों को ख़बर,
उन दिनों की जो गुफाओं में गुजारे हम ने।
हाथ ढलते गए सांचें में तो थकते कैसे?
नक़्स के बाद नए नक़्स निखरे हम ने,
की ये दीवार बुलंद और बुलंद और बुलंद,
बाम-ओ-दर और ज़रा और संवारे हम ने ,
आंधियां तोड़ लिया करतीं थीं शमाओं की लवें,
जड़ दिए इस लिए बिजली के सितारे हम ने,
बन गया क़स्र तो पहरे पे कोई बैठ गया,
सो रहे ख़ाक पे हम शोरिश-ऐ-तामील लिए,
अपनी नस नस में लिए मेहनत-ऐ-पैहम की थकन,
बंद आंखों में उस क़स्र की तस्वीर लिए,
दिन ढलता है इस तरह सिरों पर अब तक,
रात आंखों में खटकती है सियाह तीर लिए।
आज की रात बहोत गर्म हवा चलती है,
आज की रात न फुटपाथ पे नींद आएगी,
सब उठो,मै भी उठूँ,तुम भी उठो,तुम भी उठो,
कोई खिड़की इसी दीवार में खुल जायेगी।
ख़ुद में मिला ले-इब्ने इंशा
ख़ुद में मिला ले या हम से आ मिल,
ऐ नूर-कामिल ऐ नूर-कामिल,
रोज़ अज़ल भी रिश्ता यही था
तू हम में निहाँ हम तुझ में शामिल।
हम सा रिज़ा जो ,तुम सा जफ़ा जो,
देखा न मआमूल पाया न आमिल,
दिल की ज़बान है,उस को तो समझो,
हम तुम से बोलें तेलगू न तामिल,
ऐ बेवफ़ा मिल,ऐ बेवफ़ा मिल.
Monday, January 19, 2009
मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग
(धन्यवाद डॉ अमर ज्योति का -जिन्होंने इस अनुवाद में मेरी मदद की)
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग
मैंने समझा के तू है तो दरख्शां है हयात,
तेरा ग़म है तो ग़म-ऐ-दहर का झगड़ा क्या है?
तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात,
तेरी आंखों के सिवा दुनिया में रखा क्या है?
तू जो मिल जाए तो तक़दीर निगूं हो जाए ,
यूँ न था मैंने फ़क़त चाह था के यूँ हो जाए,
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा ,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा,
अनगिनत सदियों के तारीक़ बहिमाना तासम ,
रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमखाब में बुनवाए हुए,
जा बजा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म,
खाक में लिपटे हुए खून में नहलाए हुए,
लौट जाती है उधर को भी नज़र क्या कीजे,
अब भी दिलकश है तेरा हुस्न मगर क्या कीजे,
और भी दुःख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा,
राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा,
मुझ से पहली सी मुहब्बत मेरे महबूब न मांग।
Friday, January 16, 2009
लाल झंडा
"लाल झंडा फ़ेंक दो " ऐ देश भक्तों क्या कहा,
ये तो है सर्मायादारों की लीडरों की सदा
ये सदा उनकी है जिनकी नफ़ाखोरी का जुनूँ
चूसता है सयाने मज़दूर से दिन रात खूँ
ये सदा उनकी है जो बर्तानिया के हैं गुलाम,
ये सदा उनकी है जो सिंघानिया के हैं गुलाम,
ये सदा उनकी है टाटा ने उभारा है जिन्हें ,
ये सदा उनकी है बिरला ने संवारा है जिन्हें,
दुश्मनी ने कर दिया है तुम को कितना बेखबर
किसका नग्मा गा रहे हो कांग्रेस के साज़ पर
" लाल झंडा फ़ेंक दो " हिटलर पुकारा था यही
"लाल झंडा फ़ेंक दो " टोजो का नारा था यही,
"लाल झंडा फ़ेंक दो" था मुसोलिनी का ये हुक्म
क्या उन्हीं के रास्तों पर चल रहे हो आज तुम?
ऐ के तुम करने उठे हो आज हम से दोस्ती,
लाल झंडा किस का झंडा है ये सोचा है कभी ?
ये वोह झंडा है लरज़ जाते हैं जिन से ताजदार
ये वोह झंडा है उठे हैं ले के जिस को कामगार,
ये वोह झंडा है किया है जिस ने हम को सुर्ख़रू
इस में है "पापा"मियां के गर्म सीने का लहू,
इस की लहरों में है "मारुती" की अंगडाई का रंग
इस की रंगत में कभी है "बाघमारे " की उमंग
इस की सुर्खि में है मजदूरों किसानों का लहू
इस में है कय्युर के कटील जवानों का लहू ।
तुम ने काहे को सुनी होगी कभी ये दास्ताँ
नाम मारुती था किस का कौन थे पापा मियाँ
बाघमारे को मगर पहचानते होगे ज़रूर
अपने ही मारे हुए को जानते होंगे ज़रूर
कांग्रेस की ही वज़ारत जब यहाँ थी हुक्मराँ
सीना मज़दूर पर बरसती दनादन गोलियाँ
कौम की पहली हुकूमत और ये ज़ुल्म-ओ-जफ़ा
अपना साथी बाघमारे जान से मारा गया।
किस क़दर अफ़सोस है ऐ भोले भाले दोस्तों,
तुन हमीं से कह रहे हो "लाल झंडा फ़ेंक दो "?
ये वो झंडा है जो जानों से भी प्यारा है हमें
इस ने हर पस्ती हर दलदल से उबारा है हमें,
इस ने गुर तन्ज़ीम-ओ-कौत का सिखाया है हमें
एकता का रास्ता इसने दिखाया है हमें
इस के दामन में जगह पता नहीं फतना फसाद
आज को सब को सिखाता है ये झंडा ऐतहाद
मुल्क में फैला रहे हैं आज कल जो इन्तशार
कर रहा है कौन इन बहके हुओं को होशियार
जब वतन में हर तरफ़ था दौर दौरअह यास का
किस ने दर जेलों के खडकाए के लीडर हो रहा
झूठ का जब हुक्मरानों ने बिछा रखा था दाम,
लग रहा था कांग्रेस पर फाशेद का एतहाम
मुल्क भर से कौन उठा कांग्रेस के नाम पर
बन के बिजली कौन टूटा साम्राजी दाम पर
जब दबा रखा था जालिम नफ़ाखोरों ने अनाज,
बिक रही थी रास्तों में माँओं ओउर बहनों की लाज,
कौन उठा बंगाल को उस दम बचाने के लिए?
भ्होख के जालिम शिकंजे से छुडाने के लिए,
आ गया था सर पे जब जापान दन्नाता हुआ,
कौन उठा था हिफाज़त की क़सम खाता हुआ?
लड़ रहा था कौन उस दिन मुल्क-ओ-मिल्लत के लिए,
किस ने जद्दोजहद की कौमी हकुमत के लिए?
मुश्किलों में काम जो आता है वो हमदम है ये
जो हमारे सर पे लहराता है वो परचम है ये,
यूँ तो झंडे और भी हैं मुल्क में छोटे बड़े,
कौन लड़ता है मगर मेहनतकशों के वास्ते
तुम इलेक्शन के लिए हम पर हुए हों मेहरबां
ये इलेक्शन ख़त्म हो फिर तुम कहाँ और हम कहाँ
कौन फिर सर्मायादारों से बचायेगा हमें
कौन बोनस कौन महंगाई दिलाएगा हमें
कोई कौत हम से ये झंडा हम से छुडा सकती नहीं
कोई बिजली इस फरेरे को जला सकती नहीं,
ये वो झंडा है जो अमरीका में लहराता है आज,
ये वो झंडा है जो लन्दन में भी बल खाता है आज,
ये वो झंडा है जो है paris के दिल पर हुक्मरान
ले रहा है सीना-ऐ-बर्लिन पे भी अंगडाइयां
ये वो झंडा है जो कुल योरप पे है छाया हुआ,
चीन के रंगीन अफ़क़ पर भी है लहराया हुआ,
ये वो है अपना ग़रीबों ने बनाया है जिसे
ये वो है जावा ने काँधे पर उठाया है जिसे,
ले के ये झंडा यूंही आगे बढे जायेंगे हम,
चढ़ के फांसी पर भी इस झंडे को लहराएंगे हम
nazb कर देंगे इसे इक रोज़ हर दीवार में
कारखानों में मिलों में खेत में बाज़ार में
याद- फ़ैज़
दस्त-ऐ-तन्हाई में ऐ जान-ऐ-जहाँ लरजाँ हैं
तेरी आवाज़ के साए तेरे होंठों के सराब
दस्त-ऐ-तन्हाई में दूरी के ख़स-ओ-ख़ाक तले,
खिल रहें हैं तेरे पहलू के सुमन और गुलाब
उठ रही है कहीं कुर्बत से तेरी साँस की आंच,
अपनी खुशबू में सुलगती हुई मद्धम मद्धम
दूर उफक पार चमकती हुई कतरा कतरा,
गिर रही है तेरी दिलदार नज़र की शबनम।
इस क़दर प्यार से ऐ जान-ऐ-जहाँ रखा है दिल के रुखसार पे उस वक्त तेरी याद ने हाथ,
यूँ गुमान होता है गर च अभी सुबहे फ़राक़,ढल गया हिज्र का दिन आ भी गई वस्ल की रात.
Tuesday, January 13, 2009
ग़ज़ल-कैफ़ी
कोई जंगल की तरफ़ शहर से आया होगा।
पेड़ के काटने वालों को ये मालूम तो था,
जिस्म जल जायेंगे जब सर पे न साया होगा।
बानी-ऐ-जश्न-ऐ-बहारां ने ये सोचा भी नहीं,
किस ने काँटों को लहू अपना पिलाया होगा।
बिजली के तार पे बैठा हुआ हँसता पंछी,
सोचता है के वोह जंगल तो पराया होगा।
अपने जंगल से जो घबरा के उड़े थे प्यासे,
हर सराब उन को समन्दर नज़र आया होगा।
नज़्म
अब तह्दुनकी हो ये जीत या हार,
मेरा माँज़ी है अभी तक मेरे काँधे पर सवार।
आज भी दौड़ के गल्ले में जो मिल जाता हूँ,
जाग उठता है सीने में जंगल कोई,
सींग माथे पे उभर आते हैं।
पड़ता रहता है मेरे माँज़ी का साया मुझ पर,
दौर-ऐ-खूँखारी से गुज़रा हूँ,छुपाऊँ क्यों कर,
दांत सब खून में डूबे नज़र आते हैं।
जिन से मेरा न कोई बैर न प्यार,
उन पे करता हूँ मै वार, उन का करता हूँ शिकार,
और भरता हूँ जहन्नुम अपना।
पेट ही पेट मेरा,जिस्म है दिल है न दिमाग़,
कितने अवतार बढे ले के हथेली पे चिराग़,
देखते ही रह गए, धो पाये न माँज़ी के ये दाग।
मल लिया माते पे तहज़ीब का गाज़ा लेकिन,
बरबरियत का है जो दाग़ वो छूटा ही नहीं,
गाँव आबाद किए,शहर बसाए हम ने ,
रिश्ता जंगल से जो अपना है वो टूटा ही नहीं।
जब किसी मोड़ पे पर खोल कर उड़ता है गुबार,
और नज़र आता है उस में कोई मासूम शिकार,
जाने हो जाता है सर पे जुनूँ एक सवार,
किसी झाड़ी से उलझ कर जो कभी टूटी थी,
वही दुम फिर से निकल आती है ,
वही लहराती है।
अपनी टांगों में दबाए जिसे फिरता हूँ ज़कज़
इतना गिर जाता हूँ,सदीयों में हुआ जितना बुलंद.
ग़ज़ल
मेरा छप्पर उठा गया कोई,
लग गया एक मशीन में मै भी,
शहर में ले के आ गया कोई।
मै खड़ा था के पीठ पर मेरी,
इश्तहार एक लगा गया कोई।
ये सदी धुप को तरसती है,
जैसे सूरज को खा गया कोई।
ऐसी महंगाई है की चेहरा भी,
बेच के अपना खा गया कोई।
अब वोह अरमान हैं न वोह सपने,
सब कबूतर उड़ा गया कोई।
वो गए जब से ऐसा लगता है,
छोटा मोटा ख़ुदा गया कोई।
मेरा बचपन भी साथ ले आया,
गाँव से जब भी आ गया कोई.
ग़ज़ल
नई ज़मीन नया आसमान नहीं मिलता।
नयी ज़मीन नया आसमान भी मिल जाए,
नए बशर का कहीं कुछ निशाँ नहीं मिलता।
वोह तेग़ मिल गयी जिस से हुआ है क़त्ल मेरा,
किसी के हाथ का उस पर निशाँ नहीं मिलता।
वोह मेरे गाँव हैं, वोह मेरे गाँव के चूल्हे,
जिनमें शोले तो शोले,धुवां नहीं मिलता।
जो इक खुदा नहीं मिलता तो इतना मातम क्यों,
यहाँ तो कोई मेरा हमज़बाँ नहीं मिलता।
खड़ा हूँ कब से मै चेहरों के एक जंगल में,
तुम्हारे चेहरे का कुछ भी यहाँ नहीं मिलता।
खिलौने
हलकी भारी प्लास्टर की कीलें,मोम के चक जो रुकें न चलें।
राख के खेत धूल के खलिहान,भाप के पैराहन,धुएँ के मकान,
नहर जादू की ,पल दुआओं के ,झुनझुने चंद योजनाओं के।
सूत के चेले,मोंज के उस्ताद,तीशे दफ्ती के ,कांच के फरहाद,
आलिम आटे के और रुए के इमाम,और पन्नी के शायरान कराम।
ऊन के तीर,रुई की शमशीर,सदर मिटटी का और रबर के वजीर।
अपने सारे खिलौने साथ लिए,
दस्त-ऐ-खाली में कायनात लिए,
दस्तानों में बाँध के रस्सी,
हम खुदा जाने कब से चलते हैं,
न तो गिरते हैं न संभलते हैं।