लुत्फ़ -ए-मय तुझसे क्या कहूं ज़ाहिद,
हाए कमबख्त तूने पी ही नहीं!!
उड़ गई यूँ वफ़ा ज़माने से,
कभी गोया किसी में थी ही नहीं।
'दाग' क्यों तुमको बेवफ़ा कहता ,
वह शिकायत का आदमी ही नहीं।
This is for all those who love urdu,would like to Read and write Urdu.
Thursday, August 13, 2009
Wednesday, August 12, 2009
दाग़ देहलवी
यूँ चलिए राह-ए-शौक़ में ऐसे हवा चले,
हम बैठ बैठकर जो चले भी तो क्या चले।
बैठे उदास उठे परेशाँ ख़फ़ा चले,
पूछे तो कोई आपसे,क्या आए थे क्या चले ?
बैठा है ऐतकाफ़ में ए दाग़-ए-रोज़ादार
ऐ काश! मैकदे को ये मर्द-ए-खुदा चले।
हम बैठ बैठकर जो चले भी तो क्या चले।
बैठे उदास उठे परेशाँ ख़फ़ा चले,
पूछे तो कोई आपसे,क्या आए थे क्या चले ?
बैठा है ऐतकाफ़ में ए दाग़-ए-रोज़ादार
ऐ काश! मैकदे को ये मर्द-ए-खुदा चले।
सुख़न
सुख़न यानी काव्य,कविता,बोल,वचन:
सु=س
ख़=خ
न=ن
सुख़न=سخن
सु=س
ख़=خ
न=ن
सुख़न=سخن
ग़ालिब ने कहा है - " हैं और भी दुनिया में सुखनवर बहौत अच्छे , कहते हैं के ग़ालिब का अंदाज़-ए-बयाँ और।
नामावर (नामाबर)
नामावर या नामाबर का अर्थ है संदेश पहुंचाने वाल या पात्र पहुंचाने वाला यानी (पोस्टमन) :
ना=نا
मा= ما
व= و
र= ر
नामावर=ناماور
ना=نا
मा= ما
व= و
र= ر
नामावर=ناماور
सुराग़
सुराग़ शब्द हिन्दी कोर्ट कचहरी ki सामान्य बोल चाल में और फिल्में देखते वक्त तो हर बार सुनाई देता है ,
इसका अर्थ है चिन्ह,निशान,सबूत या खोज:
सु=س+و
रा=ر+ا
ग़=غ
सुराग़ =سوراغ
इसका अर्थ है चिन्ह,निशान,सबूत या खोज:
सु=س+و
रा=ر+ا
ग़=غ
सुराग़ =سوراغ
Tuesday, August 11, 2009
दिल-ए-मन मुसाफिर-ए-मन - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
मेरे दिल,मेरे मुसाफिर,
हुआ फिरसे हुक्म सादिर ,
के वतन बदर हों हम तुम
दें गली गली सदाएं,
करें रुख नगर नगर का,
के सुराग़ कोई पाएं,
किसी यार-ए-नामाबर का।
हर एक अजनबी से पूछें,
जो पता था अपने घर का,
सर-ए-कूए नाशेनायाँ ,
हमें दिन से रात करना।
कभी इस से बात करना,
कभी उस से बात करना,
तुम्हें क्या कहूं की क्या है,
शब् ए ग़म बुरी बला है।
हमें ये भी था गनीमत,
जो कोई शुमार होता,
हमें क्या बुरा था मरना,
अगर एक बार होता।
हुआ फिरसे हुक्म सादिर ,
के वतन बदर हों हम तुम
दें गली गली सदाएं,
करें रुख नगर नगर का,
के सुराग़ कोई पाएं,
किसी यार-ए-नामाबर का।
हर एक अजनबी से पूछें,
जो पता था अपने घर का,
सर-ए-कूए नाशेनायाँ ,
हमें दिन से रात करना।
कभी इस से बात करना,
कभी उस से बात करना,
तुम्हें क्या कहूं की क्या है,
शब् ए ग़म बुरी बला है।
हमें ये भी था गनीमत,
जो कोई शुमार होता,
हमें क्या बुरा था मरना,
अगर एक बार होता।
ग़ज़ल - कैफ़ी आज़मी
पत्थर के खुदा वहां भी पाए,
हम चाँद से आज लौट आए।
दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं,
क्या हो गए मेहरबान साए।
जंगल की हवाएं आ रही हैं,
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए।
लैला ने नया जन्म लिया है,
है क़ैस कोई जो दिल लगाए?
है आज ज़मीन का गुस्ल-ए-सेहत,
जिस दिल में हो जितना खून लाये।
सेहरा सेहरा लहू के खेमे,
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आए।
हम चाँद से आज लौट आए।
दीवारें तो हर तरफ़ खड़ी हैं,
क्या हो गए मेहरबान साए।
जंगल की हवाएं आ रही हैं,
काग़ज़ का ये शहर उड़ न जाए।
लैला ने नया जन्म लिया है,
है क़ैस कोई जो दिल लगाए?
है आज ज़मीन का गुस्ल-ए-सेहत,
जिस दिल में हो जितना खून लाये।
सेहरा सेहरा लहू के खेमे,
फिर प्यासे लब-ए-फ़ुरात आए।
आदत - कैफ़ी आज़मी
मुद्दतों में इक अंधे कुंवे में असीर,
सर पटकता रहा गुनगुनाता रहा,
रौशनी चाहिए,चांदनी चाहिए, जिंदगी चाहिए,
रौशनी प्यार की,चांदनी यार की,जिंदगी डर की।
अपनी आवाज़ सुनता रहा रात दिन ,
धीरे धीरे यक़ीन दिल को आता रहा।
सूने संसार में,
बेवफा यार में,
दामन-ए-दार में,
रौशनी भी नहीं,चांदनी भी नहीं,जिंदगी भी नहीं।
जिंदगी एक रात,
वाहम कायनात,
आदमी बेशबात,
लोग कोताह कद,
शहर शहर हसद ,
गाँव उन से भी बद ,
उन अंधेरों ने जब पी डाला मुझे,
फिर अचानक कुंवे ने उछाला मुझे,
अपने सीने से बाहर निकला मुझे,
सैकडों मसर थे सामने,
सैकडों उस के बाज़ार थे,
एक बूढी जुलेखा नहीं,
जाने कितने खरीद दार थे,
बढ़ता जाता था युसूफ का मोल,
लोग बिकने को तयार थे।
खुल गए माजबीनों के सर,
रेशमी चादरें हट गयीं,
पलकें झपकीं या नज़रें झुकीं,
मरमरी उंगलियाँ कट गयीं,
हाथ दामन तक आया कोई ,
धज्जियाँ दूर तक बट गयीं।
मैंने डर के लगा दी कुंवे में छलांग,
सर पटकता रहा फिर उसी करब से ,
फिर उसी दर्द से गिडगिडाने लगा,
रौशनी चाहिए,चांदनी चाहिए,जिंदगी चाहिए.
सर पटकता रहा गुनगुनाता रहा,
रौशनी चाहिए,चांदनी चाहिए, जिंदगी चाहिए,
रौशनी प्यार की,चांदनी यार की,जिंदगी डर की।
अपनी आवाज़ सुनता रहा रात दिन ,
धीरे धीरे यक़ीन दिल को आता रहा।
सूने संसार में,
बेवफा यार में,
दामन-ए-दार में,
रौशनी भी नहीं,चांदनी भी नहीं,जिंदगी भी नहीं।
जिंदगी एक रात,
वाहम कायनात,
आदमी बेशबात,
लोग कोताह कद,
शहर शहर हसद ,
गाँव उन से भी बद ,
उन अंधेरों ने जब पी डाला मुझे,
फिर अचानक कुंवे ने उछाला मुझे,
अपने सीने से बाहर निकला मुझे,
सैकडों मसर थे सामने,
सैकडों उस के बाज़ार थे,
एक बूढी जुलेखा नहीं,
जाने कितने खरीद दार थे,
बढ़ता जाता था युसूफ का मोल,
लोग बिकने को तयार थे।
खुल गए माजबीनों के सर,
रेशमी चादरें हट गयीं,
पलकें झपकीं या नज़रें झुकीं,
मरमरी उंगलियाँ कट गयीं,
हाथ दामन तक आया कोई ,
धज्जियाँ दूर तक बट गयीं।
मैंने डर के लगा दी कुंवे में छलांग,
सर पटकता रहा फिर उसी करब से ,
फिर उसी दर्द से गिडगिडाने लगा,
रौशनी चाहिए,चांदनी चाहिए,जिंदगी चाहिए.
Sunday, August 9, 2009
काफ़िर
बहोत उम्दा शब्द है और बहोत प्रचलित भी , इसका अर्थ है नास्तिक, इश्वर या धर्म को न मानने वाला, और इसको कभी कभी अल्लाह को न मानने वाले के लिए भी इस्तेमाल किया जाता है :
का=کا
फ़ि=في
र= ر
काफ़िर =کافير
का=کا
फ़ि=في
र= ر
काफ़िर =کافير
पोशीदा
पोशीदा का मतलब है छुपा हुआ या छुपाया हुआ,जब ग़ालिब कहते हैं के वोह हैं :
वली पोशीदा और काफिर खुला
तो वो कहते हैं के वोह उनकी भक्ति छुपी हुई है और नास्तिकता सबके सामने है।
पोशीदा कैसे लिखते हैं? ऐसे:
पो=پو
शी=شي
दा=داۂ
पोशीदा =پوشيراۂ
वली पोशीदा और काफिर खुला
तो वो कहते हैं के वोह उनकी भक्ति छुपी हुई है और नास्तिकता सबके सामने है।
पोशीदा कैसे लिखते हैं? ऐसे:
पो=پو
शी=شي
दा=داۂ
पोशीदा =پوشيراۂ
दाग़
दाग़ जैसे शब्द मुझ जैसे नए आदमी को उर्दू लिपि सीखने में हमेशा ही पोत्साहित करते थे-क्यों ?
क्योंकि ये बहोत सरल शब्द है , आपको सिर्फ़ ध्यान रखना है के दाग़ में ग़ आता है ग नहीं:
दा=دا
ग़=غ
दाग़ = داغ
क्योंकि ये बहोत सरल शब्द है , आपको सिर्फ़ ध्यान रखना है के दाग़ में ग़ आता है ग नहीं:
दा=دا
ग़=غ
दाग़ = داغ
कफ़स
कफ़स का शाब्दिक अर्थ है पिंजरा लेकिन इसे इस्तेमाल किया जाता है "इस नश्वर शरीर " या देह के मायने में,और इसे लिखना तो बहोत ही आसन है:
क़=ق
फ़=ف
स=س
कफ़स=قفس
क़=ق
फ़=ف
स=س
कफ़स=قفس
ग़ालिब-ग़ज़ल
कुञ्ज में बैठा रहूँ,यूँ पर खुला,काश के होता क़फ़स का दर खुला,
'हम पुकारें और खुले' यूँ कौन जाए? यार का दरवाज़ा पावें गर,खुला।
हम को है इस राज़दारी पर घमंड, दोस्त का है राज़ दुश्मन पर खुला।
वाकई दिल पर भला लगता था दाग़,ज़ख्म लेकिन दाग़ से बेहतर,खुला।
सोज़-ए-दिल का क्या कहें बाराँ-ए-अश्क, आग भड़की मुहँ अगर दम भर खुला ।
नामे के साथ आ गया पैगाम-ए-मर्ग ,रह गया ख़त मेरी छाती पर खुला।
देखियो ग़ालिब से गर उलझा कोई ,
है वली पोशीदः और काफ़िंर, खुला .
'हम पुकारें और खुले' यूँ कौन जाए? यार का दरवाज़ा पावें गर,खुला।
हम को है इस राज़दारी पर घमंड, दोस्त का है राज़ दुश्मन पर खुला।
वाकई दिल पर भला लगता था दाग़,ज़ख्म लेकिन दाग़ से बेहतर,खुला।
सोज़-ए-दिल का क्या कहें बाराँ-ए-अश्क, आग भड़की मुहँ अगर दम भर खुला ।
नामे के साथ आ गया पैगाम-ए-मर्ग ,रह गया ख़त मेरी छाती पर खुला।
देखियो ग़ालिब से गर उलझा कोई ,
है वली पोशीदः और काफ़िंर, खुला .
बेनियाज़ी
बेनियाज़ी का मतलब है indifference या बेपरवाह,स्वछन्द :
बे =ب+ے=بے
नियाज़ी= ن+ي+ا+ز=نيازي
बेनियाज़ी=بےنيازي
बे =ب+ے=بے
नियाज़ी= ن+ي+ا+ز=نيازي
बेनियाज़ी=بےنيازي
Wednesday, July 29, 2009
soliloquy
खल्वत की रातें,फ़ोन की बातें,महबूब की मेरे बात "कुछ और",
महफिल में जो आप मिलें , बनते हैं जनाब "कुछ और"
आपकी चाहत,आपकी आराइश,आपके लुत्फ़-ओ-ख्वाब "कुछ और"
बाज़रगाँ फिर हाथ मलें और आप कहें - " कुछ और , कुछ और "।
आज कहा इस दिल ने मेरे "बहुत हुआ " करें काज "कुछ और "
मैंने कहा या तू चुप रह या कर ले तू बात "कुछ और "
महफिल में जो आप मिलें , बनते हैं जनाब "कुछ और"
आपकी चाहत,आपकी आराइश,आपके लुत्फ़-ओ-ख्वाब "कुछ और"
बाज़रगाँ फिर हाथ मलें और आप कहें - " कुछ और , कुछ और "।
आज कहा इस दिल ने मेरे "बहुत हुआ " करें काज "कुछ और "
मैंने कहा या तू चुप रह या कर ले तू बात "कुछ और "
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