इकराम का अर्थ है इनाम,सम्मान,प्रतिष्ठा । ا+ک+ر+ا+م=اکرام याद रखिये, urdu में अ,इ,उ, ऐ के लिए (ا) का ही इस्तेमाल होता है.कभी कभी इ को स्पष्ट करने के लिए (ا) के नीचे हलन्तलगा दिया जाता है और उ के लिए (ا) के ऊपर (و) लगा दिया जाता है।
च और प के बीच भी आप confuse होंगे क्योंकि दोनों ही अक्षरों के नीचे तीन बिन्दु होते हैं:
च = چ چـ प=پ پـ
तीन बिन्दुओं की बात निकली है तो श भी मत भूलियेगा , लेकिंग श को लिखते हैं स की तरह और तीन बिन्दु होते हैं , नीचे के बजाय , अक्षर के ऊपर ।
श=ش अब आप लिखते हैं ,
चपल= چپل चप्पल=چپّل पचवाक (इसका अर्थ होता है अनुवाद) : پچواک एक और बात चप्पल शब्द में प के ऊपर आपने (ّ) देखा,दरसल urdu में अक्षर को दोबारा लिखने के बजाय उसके ऊपर यह(ّ) orthographical mark लगा दिया जाता है,इसे कहा जाता है तशदीद । किसी भी अक्षर के ऊपर तशदीद लगा देने पर उस अक्षर का उच्चारण दो बार हो जाता है।
जब मैंने "ज़ियाँ" का अर्थ बताया , तो एक सज्जन ने annonimus पोस्ट लिखा और पूछा के "लिया" का क्या अर्थ है? उर्दू में, "लिया " तो कोई शब्द नहीं है , हाँ मगर लि'आन है , जिसका अर्थ है १एक दूसरे का धिक्कार करना २ पति द्वारा पत्नी पर व्यभिचार का आरोप लगाकर तलाक़ ले लेना। ل+ع+ا+ن=لعان
फ़क़ीह का अर्थ है धर्मशास्त्र्ग्यमुस्लिम धर्म का पारंगत । ف+ق+ي+ہ=فقيہ फ़ैज़ ने कहा है : फ़क़ीह-ऐ-शहर से मय का जवाज़ क्या पूछें, के चांदनी को भी हज़रतहराम कहते हैं "
वहीं है दिल, कराइन तमाम कहते हैं वो एक ख़लिश के जिसे तेरा नाम कहते हैं तुम आ रही हो के बजती हैं मेरी जंजीरें न जाने क्या मेरे दीवार-ओ-बाम कहते हैं यही किनार-ए-फ़लक का सियाह्तरीनगोशा यही है मतला-ए-माह-ए-तमाम , कहते हैं पियो के मुफ्त लगा दी गई है खून-ए-दिल की कसीर गिरां है के अब के मय लाल फ़ाम कहते हैं फ़कीह शहर से मय का जवाज़ क्या पूछें के चांदनी को भी हज़रत हराम कहते हैं नवा-ए-मुर्ग़ को कहते हैं अब ज़ियाँ-ए-चमन खिले न फूल उसे इंतिज़ाम कहते हैं कहो तो हम भी चलें फ़ैज़ अब नहीं सर-ए-दार फर्क-ए-मर्तबा ख़ास-ओ-आम कहते हैं
मतल'अ कहते हैं ग़ज़ल के पहले शेर को, इसके दोनों भाग एक जैसे होते हैं। इसे कभी क्षितिज या उद्गम ( शुरू होने की जगह) के बतौर भी लिखा जाता है। م+ط+ل+ع=مطلع मतला में त (ت) के स्थान पर तोय (ط) का उपयोग होता है। फ़ैज़ कहते हैं - " यही किनार-ए-फ़लक का सियाहतरीं गोशा, यही है मतला -ए-माह-ए-तमाम कहते हैं "
क़रीन का अर्थ है रिवाज़, तरीका, शिष्ठाचार । ق+ر+ي+ن+ہ=قرينہ गुलज़ार साहब ने विशाल भरद्वाज की फ़िल्म कमीने में लिखा है : " जीने के सब क़रीने,थे हमेशा से कमीने "