Monday, May 11, 2009

हम पर तुम्हारी चाह का- फ़ैज़

हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ामही तो है दुश्नाम तो नही है ये इकराम ही तो है।
करते हैं जिस पे तआना कोई जुर्म तो नहीं,शौक-ऐ-फिज़ूल उल्फ़त-ऐ-नाकाम ही तो है।
दिल मुद्दईके हर्फ़-ऐ-मलामत से शाद है, ऐ जानेजां ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है।
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-तकदीर तो नहीं,दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-अय्याम ही तो है।
आख़िर तू एक रोज़ करेगी नज़र-ऐ-वफ़ा,वोह यार खुश-ख़सालसर-ऐ-बाम ही तो है।
भीगी है रात फैज़ ग़ज़ल इब्तदा करो,वक़्त-ऐ-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है।

  • दुष्नाम-गाली
  • इकराम-ईनाम
  • उल्फ़त-प्यार
  • मुद्दई-दुश्मन
  • अय्याम-कुछ वक़्त ,कुछ दिन।
  • हंगाम-वक़्त

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