सुरूर का अर्थ है हर्ष,आनंद, कैफियत,नशा।
س+ر+و+ر=سرور
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Sunday, August 16, 2009
अदू को देख कर-दाग़ देहलवी
दाग़ देहलवी
Saturday, August 15, 2009
हिलाल
हिलाल का अर्थ है छोटा चाँद या दूज का चाँद , चाँद जो अपनी पहली या दूसरी दशा में हो :
ھ+ل+ا+ل=ھلال
ये शब्द " हलाल" से अलग है, आप इको पढ़ते वक्त हलाल से confuse कर सकते हैं, क्योंकि इसमें भी ह के बाद इ की मातृ नहीं लगाई जाती.लेकिन इस शब्द में ह भी दूसरा प्रयोग में लाया जाता है।
(ح) की जगह (ھ) का उपयोग किया जाता है.
ھ+ل+ا+ل=ھلال
ये शब्द " हलाल" से अलग है, आप इको पढ़ते वक्त हलाल से confuse कर सकते हैं, क्योंकि इसमें भी ह के बाद इ की मातृ नहीं लगाई जाती.लेकिन इस शब्द में ह भी दूसरा प्रयोग में लाया जाता है।
(ح) की जगह (ھ) का उपयोग किया जाता है.
ग़ज़ल- इब्ने इंशा
लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़कर माह-ए-तमाम हुए,
हम हर बुर्ज में घटते घटते सुबह तलक गुमनाम हुए।
उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में खुश अंजाम हुए,
नज़्द में क़ैस यहाँ पर इंशा ख़्वार हुए नाकाम हुए ।
किसका चमकता चेहरा लायें,किस सूरज से मांगें धुप,
घोर अँधेरा छा जाता है,खल्वत-ए-दिल में शाम हुए।
एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,
एक हमीं होशियार थे यारों,एक हमीं बदनाम हुए।
शौक़ की आग नफ़्स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो?
चाह की राह दिखा कर तुम तो वक्फ़-ए-दरीच-ओ-तमाम हुए।
उन बहारों बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या?
जिन को एक ज़माना गुजरा कुञ्ज-ए-कफ़स में राम हुए।
इंशा साहब पौ फटती है, तारे डूबे,सुबह हुई,
बात तुम्हारी मान के हम तो शब् भर बे आराम रहे।
हम हर बुर्ज में घटते घटते सुबह तलक गुमनाम हुए।
उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में खुश अंजाम हुए,
नज़्द में क़ैस यहाँ पर इंशा ख़्वार हुए नाकाम हुए ।
किसका चमकता चेहरा लायें,किस सूरज से मांगें धुप,
घोर अँधेरा छा जाता है,खल्वत-ए-दिल में शाम हुए।
एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,
एक हमीं होशियार थे यारों,एक हमीं बदनाम हुए।
शौक़ की आग नफ़्स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो?
चाह की राह दिखा कर तुम तो वक्फ़-ए-दरीच-ओ-तमाम हुए।
उन बहारों बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या?
जिन को एक ज़माना गुजरा कुञ्ज-ए-कफ़स में राम हुए।
इंशा साहब पौ फटती है, तारे डूबे,सुबह हुई,
बात तुम्हारी मान के हम तो शब् भर बे आराम रहे।
दर्द जी रात ढल चली है-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
बात बस से निकल चली है,
दिल की हालत सम्हाल चली है।
अब जूनून हद से बढ़ चला है,
अब तबीयत सम्हल चली है।
अश्क खूनाब हो चले हैं,
गम की रंगत बदल चली है।
लाख पैगाम हो गए हैं,
जब सबा इक पल चली है।
जाओ, अब सो रहो सितारों,
दर्द की रात ढल चली है।
दिल की हालत सम्हाल चली है।
अब जूनून हद से बढ़ चला है,
अब तबीयत सम्हल चली है।
अश्क खूनाब हो चले हैं,
गम की रंगत बदल चली है।
लाख पैगाम हो गए हैं,
जब सबा इक पल चली है।
जाओ, अब सो रहो सितारों,
दर्द की रात ढल चली है।
Friday, August 14, 2009
क्या हिंद का ज़िन्दाँ- जोश मलीहाबादी
क्या हिंद का ज़िन्दाँ काँप रहा है,
गूँज रहीं हैं तक्बीरें,
उकताए हैं शायद कुछ कैदी,
और तोड़ रहे हैं,जंजीरें ।
दीवारों के नीचे आ आ कर
क्यों जमा हुए हैं ज़िन्दानी,
सीनों में तलातुम बिजली का,
आंखों में चमकती शमशीरें।
क्या उनको ख़बर थी होठों पर,
जो मोहर लगाया करते थे,
इक रोज़ इसी खामोशी से ,
तप्केंगी दहकती तक़रीरें।
सम्हलो के ज़िन्दाँ गूँज उठा,
झपटो के वो कैदी छूट गए,
उठ्ठो के वो बैठी दीवारें,
दौडो के वो टूटी जंजीरें।
गूँज रहीं हैं तक्बीरें,
उकताए हैं शायद कुछ कैदी,
और तोड़ रहे हैं,जंजीरें ।
दीवारों के नीचे आ आ कर
क्यों जमा हुए हैं ज़िन्दानी,
सीनों में तलातुम बिजली का,
आंखों में चमकती शमशीरें।
क्या उनको ख़बर थी होठों पर,
जो मोहर लगाया करते थे,
इक रोज़ इसी खामोशी से ,
तप्केंगी दहकती तक़रीरें।
सम्हलो के ज़िन्दाँ गूँज उठा,
झपटो के वो कैदी छूट गए,
उठ्ठो के वो बैठी दीवारें,
दौडो के वो टूटी जंजीरें।
ख़स या ख़स-ओ-खाशाक
ख़स याने घास,(सूखी घास), ख़स-ओ-खाशाक याने घास-फूस,कचरा :
क़+ह+स+ओ+खा+श+अ+क=ख़स-ओ-खाशाक
خ+س+و+خ+ا+ش+ا+ک=خشوخاشاک
क़+ह+स+ओ+खा+श+अ+क=ख़स-ओ-खाशाक
خ+س+و+خ+ا+ش+ا+ک=خشوخاشاک
रवाँ
रवाँ का अर्थ है बहने वाला,प्रवाही , प्राणवायु :
र+व+आँ= रवाँ
ر+و+ا+ں=رواں
अजीम शायर जोश मलीहाबादी ने कहा था(और ये अश्शार शायद भारत के विभाजन के वक्त के हैं)
"ए वतन , मेरे वतन रूह-ऐ-रवाँ-अहरार "
यानी ए वतन तू जो स्वतंत्र और उदारवादी लोगों का प्राण,प्राणवायु है।
( संपूर्ण ग़ज़ल के लिए लिंक पर क्लिक करें)
र+व+आँ= रवाँ
ر+و+ا+ں=رواں
अजीम शायर जोश मलीहाबादी ने कहा था(और ये अश्शार शायद भारत के विभाजन के वक्त के हैं)
"ए वतन , मेरे वतन रूह-ऐ-रवाँ-अहरार "
यानी ए वतन तू जो स्वतंत्र और उदारवादी लोगों का प्राण,प्राणवायु है।
( संपूर्ण ग़ज़ल के लिए लिंक पर क्लिक करें)
अहरार
अहरार बहोत अच्छा शब्द लगता है मुझे,इस के मानीं हैं, सभ्य और सज्जन लोग, उदारवादी,स्वतंत्र ।
अ+ह+र+आ+र=अहरार
ا+ح+ر+ا+ر=احرار
अ+ह+र+आ+र=अहरार
ا+ح+ر+ا+ر=احرار
ए वतन मेरे वतन - जोश मलीहाबादी
ऐ वतन,मेरे वतन,रूह-ऐ-रवाँ-अहरार ,
ऐ के ज़र्रों में तेरे बू-ए-चमन , रंग-ए-बहार,
रेज़ अल्मास के तेरे ख़स-ओ-खाशाक में हैं,
हड्डियां अपने बुजुर्गों की तेरी खाक़ में हैं,
तुझसे मुंह मोड़ की मुंह अपना दिखेंगे कहाँ,
घर जो छोडेंगे तो फिर छाँव निछाएंगे कहाँ,
बज़्म-ए-यार में आराम ये पाएंगे कहाँ,
तुझसे हम रूठ के जाएंगे तो जाएंगे कहाँ।
ऐ वतन मेरे वतन,ऐ वतन मेरे वतन।
ऐ के ज़र्रों में तेरे बू-ए-चमन , रंग-ए-बहार,
रेज़ अल्मास के तेरे ख़स-ओ-खाशाक में हैं,
हड्डियां अपने बुजुर्गों की तेरी खाक़ में हैं,
तुझसे मुंह मोड़ की मुंह अपना दिखेंगे कहाँ,
घर जो छोडेंगे तो फिर छाँव निछाएंगे कहाँ,
बज़्म-ए-यार में आराम ये पाएंगे कहाँ,
तुझसे हम रूठ के जाएंगे तो जाएंगे कहाँ।
ऐ वतन मेरे वतन,ऐ वतन मेरे वतन।
रिंद या रिन्दां
रिंद एक वचन है और रिन्दां उसका बहु वचन, अर्थ है शराबी,रसिक या वह जो धार्मिक बन्धनों से मुक्त हो।
ر+ن+د=رند
ر+ن+د+ا+ن=رندان
ر+ن+د=رند
ر+ن+د+ا+ن=رندان
विपरीत या विलोम: पारसा
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