Sunday, August 16, 2009

सुरूर

सुरूर का अर्थ है हर्ष,आनंद, कैफियत,नशा।

س+ر+و+ر=سرور

अदू

अदू का अर्थ है शत्रु, दुश्मन।

ع+د+و=عدو

अदू को देख कर-दाग़ देहलवी

अदू को देख कर आंखों में अपनी खूँ उतरा,
वो समझे बादा-ए-गुल-रंग का सुरूर आया।

क़सम भी वो कभी क़ुरान की नहीं खाते ,
ये रश्क है उन्हें क्यूं इसमें ज़िक्र-ए-हूर आया।

बाईस

बाईस का अर्थ है कारण, वजह :

ب+ا+‏ع+ث=باعث

जबीं

जबीं का मतलब है माथा या कपाल :

ج+ب+ي+ں=جبيں

दाग़ देहलवी

पड़ा है बल जबीं पर , क्या सबब क्या वजह क्या बाईस?
हुआ क्यूं तेज़ खंजर ,क्या सबब? क्या वजह? क्या बाईस?

कहा अगर हमने हरजाई तो तुमने क्यों बुरा माना?
फिर करते हो दिन भर, क्या सबब?क्या वजह ? क्या बाईस?

इशारों में हुईं थीं मुझसे उनसे कुछ बातें,
यही चर्चा है घर घर , क्या सबब ? क्या वजह ? क्या बाईस?

Saturday, August 15, 2009

वक़्फ़

वक़्फ़ का अर्थ है भगवान् की संपत्ति या देवस्थान की सम्पत्ती, जो संगठन मंदिरों,मस्जिदों की देखभाल करते हैं,उनकी सम्पत्ती ।

و+ق+ف=وقف

नफ़्स

नफ़्स का अर्थ है प्राण, आत्मा,जीवन,अस्तित्व।

ن+ف+س=نفس

खल्वत

खल्वत का अर्थ है निर्जन स्थान या प्रेमियों के मिलने का स्थान,सुनसान जगह।

خ+ل+و+ت=خلوت

ख़्वार

ख़्वार का अर्थ है अपमानित,तिरस्कृत , जिसकी दुर्दशा हो गई हो।

خ+و+ا+ر=خوار

क़ैस

क़ैस - ये मजनूँ का नाम है, इसे प्यार में पागल शख्स के लिए भी उपयोग में लाया जाता है।

ق+ي+س=قيس

नज़्द

नज़्द का मतलब है करीब,नज़दीक।

ن+ز+د=نزد

माह

माह का अर्थ है चाँद, चंद्रमा।
म=م
अ=ا
ह=ۃ
माह= ماۃ

माहे तमाम का अर्थ है पूर्ण चंद्र.

ماۃتمام

हलाल

हलाल का अर्थ है शास्त्रों द्वारा माना हुआ,शास्त्रपारित ।

ح+ل+ا+ل=حلال

हिलाल

हिलाल का अर्थ है छोटा चाँद या दूज का चाँद , चाँद जो अपनी पहली या दूसरी दशा में हो :

‏ھ+ل+ا+ل=ھلال

ये शब्द " हलाल" से अलग है, आप इको पढ़ते वक्त हलाल से confuse कर सकते हैं, क्योंकि इसमें भी ह के बाद इ की मातृ नहीं लगाई जाती.लेकिन इस शब्द में ह भी दूसरा प्रयोग में लाया जाता है।
(ح) की जगह (ھ) का उपयोग किया जाता है.

ग़ज़ल- इब्ने इंशा

लोग हिलाल-ए-शाम से बढ़कर माह-ए-तमाम हुए,
हम हर बुर्ज में घटते घटते सुबह तलक गुमनाम हुए।

उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में खुश अंजाम हुए,
नज़्द में क़ैस यहाँ पर इंशा ख़्वार हुए नाकाम हुए ।

किसका चमकता चेहरा लायें,किस सूरज से मांगें धुप,
घोर अँधेरा छा जाता है,खल्वत-ए-दिल में शाम हुए।

एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,
एक हमीं होशियार थे यारों,एक हमीं बदनाम हुए।

शौक़ की आग नफ़्स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो?
चाह की राह दिखा कर तुम तो वक्फ़-ए-दरीच-ओ-तमाम हुए।

उन बहारों बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या?
जिन को एक ज़माना गुजरा कुञ्ज-ए-कफ़स में राम हुए।

इंशा साहब पौ फटती है, तारे डूबे,सुबह हुई,
बात तुम्हारी मान के हम तो शब् भर बे आराम रहे।


दर्द जी रात ढल चली है-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़

बात बस से निकल चली है,
दिल की हालत सम्हाल चली है।

अब जूनून हद से बढ़ चला है,
अब तबीयत सम्हल चली है।

अश्क खूनाब हो चले हैं,
गम की रंगत बदल चली है।

लाख पैगाम हो गए हैं,
जब सबा इक पल चली है।

जाओ, अब सो रहो सितारों,
दर्द की रात ढल चली है।

Friday, August 14, 2009

तलातुम

तलातुम का अर्थ है जोश , आवेग , इसे ज्वार भाते या समंदरी तूफ़ान के लिए भी प्रयोग में लाया जाता है:

ت+ل+ا+ط+م=تلاطم

इसमें दो अलग अलग "त " का उपयोग है :
त(ت) और तोय(ط)

तक़रीर

तक़रीर का अर्थ है वर्णन,वक्तव्य,भाषण :

ت+ق+ر+ي+ر=تقرير

तकबीर

तकबीर का अर्थ है भगवान् का जयजयकार करना,अल्लाह-ओ-अक्बर (अल्लाह / ईश्वर सर्वश्रेष्ठ है ) का नारा लगाना।

त+क+ब+इ+र=तकबीर

ت+ک+ب+ي+ر=تکبير

ज़िन्दाँ

ज़िन्दाँ यानी जेल,कारागार

ज़+इ+न+द+आँ=ज़िन्दाँ

ز+ي+ن+د+ا+ں=زينداں

क्या हिंद का ज़िन्दाँ- जोश मलीहाबादी

क्या हिंद का ज़िन्दाँ काँप रहा है,
गूँज रहीं हैं तक्बीरें,
उकताए हैं शायद कुछ कैदी,
और तोड़ रहे हैं,जंजीरें ।

दीवारों के नीचे आ आ कर
क्यों जमा हुए हैं ज़िन्दानी,
सीनों में तलातुम बिजली का,
आंखों में चमकती शमशीरें।

क्या उनको ख़बर थी होठों पर,
जो मोहर लगाया करते थे,
इक रोज़ इसी खामोशी से ,
तप्केंगी दहकती तक़रीरें।

सम्हलो के ज़िन्दाँ गूँज उठा,
झपटो के वो कैदी छूट गए,
उठ्ठो के वो बैठी दीवारें,
दौडो के वो टूटी जंजीरें।

ख़स या ख़स-ओ-खाशाक

ख़स याने घास,(सूखी घास), ख़स-ओ-खाशाक याने घास-फूस,कचरा :

क़+ह+स+ओ+खा+श+अ+क=ख़स-ओ-खाशाक

خ+س+و+خ+ا+ش+ا+ک=خشوخاشاک

अल्मास

अल्मास यानी हीरा :

अ+ल+म+आ+स= अल्मास

ا+ل+م+ا+س=الماس

रेज़ः

रेज़ः का अर्थ है कण,छोटे टुकड़े,

र+ऐ+ज़+ह=रेज़ः

ر+ي+ز+ۂ=ریزۂ

रवाँ

रवाँ का अर्थ है बहने वाला,प्रवाही , प्राणवायु :
र+व+आँ= रवाँ

ر+و+ا+ں=رواں

अजीम शायर जोश मलीहाबादी ने कहा था(और ये अश्शार शायद भारत के विभाजन के वक्त के हैं)
"ए वतन , मेरे वतन रूह-ऐ-रवाँ-अहरार "
यानी ए वतन तू जो स्वतंत्र और उदारवादी लोगों का प्राण,प्राणवायु है।
( संपूर्ण ग़ज़ल के लिए लिंक पर क्लिक करें)

रूह

रूह यानी आत्मा,प्राण :
र+उ+ह =रूह
ر+و+ح=روح

अहरार

अहरार बहोत अच्छा शब्द लगता है मुझे,इस के मानीं हैं, सभ्य और सज्जन लोग, उदारवादी,स्वतंत्र ।

अ+ह+र+आ+र=अहरार
ا+ح+ر+ا+ر=احرار

बज़्म

बज़्म याने महफिल ,सभा :

बज़्म= ب+ز+م=بزم

ए वतन मेरे वतन - जोश मलीहाबादी

ऐ वतन,मेरे वतन,रूह-ऐ-रवाँ-अहरार ,
ऐ के ज़र्रों में तेरे बू-ए-चमन , रंग-ए-बहार,
रेज़ अल्मास के तेरे ख़स-ओ-खाशाक में हैं,
हड्डियां अपने बुजुर्गों की तेरी खाक़ में हैं,
तुझसे मुंह मोड़ की मुंह अपना दिखेंगे कहाँ,
घर जो छोडेंगे तो फिर छाँव निछाएंगे कहाँ,
बज़्म-ए-यार में आराम ये पाएंगे कहाँ,
तुझसे हम रूठ के जाएंगे तो जाएंगे कहाँ।
ऐ वतन मेरे वतन,ऐ वतन मेरे वतन।

मीर तक़ी मीर- दुनिया में हुस्न-ओ-खूबी

दुनिया में हुस्न-ओ-खूबी एक अजीब शै है,
रिन्दांपारसा याँ जिस पर रखें नज़र सब।

पारसा

पारसा का अर्थ है सय्यमी धार्मिक या सदाचारी :

پ+ا+ر+س+ا=پارسا

विपरीत या विलोम: रिंद

रिंद या रिन्दां

रिंद एक वचन है और रिन्दां उसका बहु वचन, अर्थ है शराबी,रसिक या वह जो धार्मिक बन्धनों से मुक्त हो।

ر+ن+د=رند
ر+ن+د+ا+ن=رندان

विपरीत या विलोम: पारसा