हर जी हयात का है, सबब जो हयात का,
निकले है जी उसी के लिए,कायनात का।
बिखरे हैं ज़ुल्फ़ उस रुख-ऐ-आलमफरोज़ पर,
वरना बनाव होवे न दिन और रात का।
उसके फ़रोग-ए-हुस्न से झलके है सब में नूर,
शम्म-ए-हरम हो या के दिया सोमनाथ का।
क्या मीर तुझ को नामासियाही की फ़िक्र है ?
ख़त्म-ए-रसूल सा शख्स है ज़ामिन निजात का।
This is for all those who love urdu,would like to Read and write Urdu.
Friday, August 21, 2009
ज़ुल्मतकदे में मेरे शब्-ए-गम - ग़ालिब
ज़ुल्मतकदे में मेरे,शब्-ए-गम का जोश है,
इक शम्मा है दलील-ए-सहर, सो खामोश है।
न मुज़्दा-ए-विसाल न नज़ारा-ए-जमाल,
मुद्दत हुई की आस्तीं-ए-चश्म-ओ-गोश है।
मैंने किया है हुस्न-ए-खुद्दार को बे हिजाब ,
ऐ शौक़ याँ इजाज़त-ए-तस्लीम-ए-होश है।
गौहर को इक़्द-ए-गर्दन -ए-खुबाँमें देखना,
क्या औज पर सितारा-ए-गौहरफ़रोश है।
दीदार ,वादा , हौला, साक़ी निगाह-ए-मस्त,
बज़्म-ए-ख़याल मैक़दा-ए-बेखरोश है।
दाग़-ए-फिराक़-ए-सोहबत-ए-शब् की जली हुई,
इस शम्मा रह गई है सो वो भी खामोश है।
आते हैं गैब से ये मज़ामीं ख्याल में,
गालिब, सरीर-ए-खामाँ नवा-ए-सरोश है.
इक शम्मा है दलील-ए-सहर, सो खामोश है।
न मुज़्दा-ए-विसाल न नज़ारा-ए-जमाल,
मुद्दत हुई की आस्तीं-ए-चश्म-ओ-गोश है।
मैंने किया है हुस्न-ए-खुद्दार को बे हिजाब ,
ऐ शौक़ याँ इजाज़त-ए-तस्लीम-ए-होश है।
गौहर को इक़्द-ए-गर्दन -ए-खुबाँमें देखना,
क्या औज पर सितारा-ए-गौहरफ़रोश है।
दीदार ,वादा , हौला, साक़ी निगाह-ए-मस्त,
बज़्म-ए-ख़याल मैक़दा-ए-बेखरोश है।
दाग़-ए-फिराक़-ए-सोहबत-ए-शब् की जली हुई,
इस शम्मा रह गई है सो वो भी खामोश है।
आते हैं गैब से ये मज़ामीं ख्याल में,
गालिब, सरीर-ए-खामाँ नवा-ए-सरोश है.
Thursday, August 20, 2009
Tuesday, August 18, 2009
सारे सुख़न हमारे- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हम ने सब शेर में सँवारे थे,
हम से जितने सुख़न तुम्हारे थे।
रंग-ओ-खुशबू के हुस्न-ओ-खूबी के,
तुम से जितने इस्तिआरे थे।
तेरे क़ौल-ओ-क़रार से पहले ,
अपने कुछ और भी सहारे थे।
जब वोह लअल ओ गुहर हिसाब किए,
जो तेरे गम ने दिल पे वारे थे।
मेरे दामन आ गिरे सारे,
जितने तश्त-ऐ-फलक में तारे थे।
उम्र जावेद की दुआ करते,
फ़ैज़ इतने वो कब हमारे थे।
हम से जितने सुख़न तुम्हारे थे।
रंग-ओ-खुशबू के हुस्न-ओ-खूबी के,
तुम से जितने इस्तिआरे थे।
तेरे क़ौल-ओ-क़रार से पहले ,
अपने कुछ और भी सहारे थे।
जब वोह लअल ओ गुहर हिसाब किए,
जो तेरे गम ने दिल पे वारे थे।
मेरे दामन आ गिरे सारे,
जितने तश्त-ऐ-फलक में तारे थे।
उम्र जावेद की दुआ करते,
फ़ैज़ इतने वो कब हमारे थे।
बासठ्वीं सालगिरह पर - "तुम ही कहो "- फ़ैज़
जब दुःख की नदिया में हम ने,जीवन की नाव डाली थी,
था कितना कस बल बाहों में, लोहों में कितनी लाली थी।
यूँ लगता था, दो हाथ लगे और नाव पूरम पार चली,
ऐसा न हुआ , हर धारे में कुछ अनदेखी मझधारें थीं,
कुछ मांझी थे अनजान बहुत,
कुछ बे परखीं पतवारें थीं,
अब जो भी चाहो छान करो,
अब जितना चाहो दोष धरो,
नदिया तो वही है नाव वही,
अब तुम ही कहो क्या करना है,
अब कैसे पार उतरना है।
जब अपनी छाती में हम ने,
उस देस के घाव देखे थे,
था वेदों पर विश्वास बहुत,
और याद बहुत से नुस्खे थे ,
यूँ लगता था बस कुछ दिन में ,
सारी बिपदा कट जायेगी,
और सब घाव भर जाएंगे,
ऐसा न हुआ की रोग अपने ,
कुछ इतने ढेर पुराने थे,
वेद उनकी टोह को पा न सके,
और टोटके सब बेकार गए,
अब जो भी चाहो छान करो,
अब जितना चाहो दोष धरो ,
छाती तो वही है,
घाव वही,
अब तुम ही कहो क्या करना है,
ये घाव कैसे भरना है।
था कितना कस बल बाहों में, लोहों में कितनी लाली थी।
यूँ लगता था, दो हाथ लगे और नाव पूरम पार चली,
ऐसा न हुआ , हर धारे में कुछ अनदेखी मझधारें थीं,
कुछ मांझी थे अनजान बहुत,
कुछ बे परखीं पतवारें थीं,
अब जो भी चाहो छान करो,
अब जितना चाहो दोष धरो,
नदिया तो वही है नाव वही,
अब तुम ही कहो क्या करना है,
अब कैसे पार उतरना है।
जब अपनी छाती में हम ने,
उस देस के घाव देखे थे,
था वेदों पर विश्वास बहुत,
और याद बहुत से नुस्खे थे ,
यूँ लगता था बस कुछ दिन में ,
सारी बिपदा कट जायेगी,
और सब घाव भर जाएंगे,
ऐसा न हुआ की रोग अपने ,
कुछ इतने ढेर पुराने थे,
वेद उनकी टोह को पा न सके,
और टोटके सब बेकार गए,
अब जो भी चाहो छान करो,
अब जितना चाहो दोष धरो ,
छाती तो वही है,
घाव वही,
अब तुम ही कहो क्या करना है,
ये घाव कैसे भरना है।
Monday, August 17, 2009
अहद
अहद भिन्न भिन्न अर्थों में उपयोग किया जाता है , अहद का अर्थ है:
१ प्रतिज्ञा या वचन ।
२ काल या युग ( अहद-ए-संग= प्रस्तर युग)
३ राज्य या सत्ता ।
ع+ح+د=عحد
English: "Ahad" is used for many different means :
1) It is used as a noun and means decesion" or affirmation
2) Its also used as a noun meaning age or period. For example "Ahad-e-sang" means stones age.
१ प्रतिज्ञा या वचन ।
२ काल या युग ( अहद-ए-संग= प्रस्तर युग)
३ राज्य या सत्ता ।
ع+ح+د=عحد
English: "Ahad" is used for many different means :
1) It is used as a noun and means decesion" or affirmation
2) Its also used as a noun meaning age or period. For example "Ahad-e-sang" means stones age.
दीद
दीद याने नज़र या दृष्टि :
د+ي+د=ڈيد
English : "Deed" means eyes. It also means the capacity to view or "Vision". The word forms a base for another word "Deedaar"( हिंदी - दीदार ) which means sight or view.
The word leads to another famously used phrase called " Deedaar-e-Yaar (हिंदी- दीदार -ए -यार ) which means glimpse or sight of one's lover.
د+ي+د=ڈيد
English : "Deed" means eyes. It also means the capacity to view or "Vision". The word forms a base for another word "Deedaar"( हिंदी - दीदार ) which means sight or view.
The word leads to another famously used phrase called " Deedaar-e-Yaar (हिंदी- दीदार -ए -यार ) which means glimpse or sight of one's lover.
कब तक दिल की खैर मनाएं-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
कब तक दिल की खैर मनाएं, कब तक रह दिखलावेंगे
कब तक चमन की मोहलत दोगे,कब तक याद न आओगे
बीता दीद उम्मीद का मौसम, खाक उड़ती है आंखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल, कब बरखा बरसाओगे
अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो
अपने बस की बात ही क्या है,हम से क्या मन्वाओगे
किस ने वस्ल का सूरज देखा , किस पर हिज्र की रात ढली
गेसुओं वाले कौन थे क्या थे, उन को क्या जतलाओगे
फ़ैज़ दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी,
तुम उस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर , कितने दिन इतराओगे ?
कब तक चमन की मोहलत दोगे,कब तक याद न आओगे
बीता दीद उम्मीद का मौसम, खाक उड़ती है आंखों में
कब भेजोगे दर्द का बादल, कब बरखा बरसाओगे
अहद-ए-वफ़ा या तर्क-ए-मोहब्बत जो चाहो सो आप करो
अपने बस की बात ही क्या है,हम से क्या मन्वाओगे
किस ने वस्ल का सूरज देखा , किस पर हिज्र की रात ढली
गेसुओं वाले कौन थे क्या थे, उन को क्या जतलाओगे
फ़ैज़ दिलों के भाग में है घर भरना भी लुट जाना भी,
तुम उस हुस्न के लुत्फ़-ओ-करम पर , कितने दिन इतराओगे ?
कहीं से लौट कर हम --- कैफ़ी आज़मी
कहीं से लौट के हम लड़खडाए हैं क्या क्या
सितारे ज़ेर-ए-क़दम रात आए हैं क्या क्या ।
नसीब-ए-हस्ती से अफ़सोस हम उभर न सके,
फ़राज़-ए-दार से पैग़ाम आए हैं क्या क्या।
जब उस ने हार के खंजर ज़मीं पे फ़ेंक दिया,
तमाम ज़ख्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या।
छटा जहाँ से उस आवाज़ का घना बादल,
वहीं से धूप ने तलवे जलाये हैं क्या क्या।
उठा के सर मुझे इतना तो देख लेने दे,
के क़त्ल गाह में दीवाने आए हैं क्या क्या।
कहीं अंधेरे से मानूस हो न जाए अदब ,
चराग तेज़ हवा ने बुझ्हाए हैं क्या क्या।
सितारे ज़ेर-ए-क़दम रात आए हैं क्या क्या ।
नसीब-ए-हस्ती से अफ़सोस हम उभर न सके,
फ़राज़-ए-दार से पैग़ाम आए हैं क्या क्या।
जब उस ने हार के खंजर ज़मीं पे फ़ेंक दिया,
तमाम ज़ख्म-ए-जिगर मुस्कुराए हैं क्या क्या।
छटा जहाँ से उस आवाज़ का घना बादल,
वहीं से धूप ने तलवे जलाये हैं क्या क्या।
उठा के सर मुझे इतना तो देख लेने दे,
के क़त्ल गाह में दीवाने आए हैं क्या क्या।
कहीं अंधेरे से मानूस हो न जाए अदब ,
चराग तेज़ हवा ने बुझ्हाए हैं क्या क्या।
Sunday, August 16, 2009
अदू को देख कर-दाग़ देहलवी
दाग़ देहलवी
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