Friday, December 19, 2008

दायरा

रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे,
फिर वहीँ लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को,
उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ,
रोज़ बसते हैं कई शहर नए
रोज़ धरती मैं समा जाते हैं,
ज़लज़लों में थी ज़रा से गर्मी,
वोह भी अब रोज़ ही आ जाते हैं।

जिस्म से रूह तलक रेत ही रेत,
न कहीं धुप न साया न सराब
कितने अरमान हैं किस सहारा में,
कौन रखता है मजारों का हिसाब,
नब्ज़ बुझती भी,भड़कती भी है,
दिल का मआमूल है घबराना भी,
रात अंधेरे ने अंधेरे से कहा,
इक आदत है जिये जाना भी ।

क़ौस इक रंग की होती है तलूअ,
एक ही चाल भी पैमाने की,
गोशे गोशे में खड़ी है मस्जिद,
शक्ल क्या हो गई मैखाने की।
कोई कहता था समंदर हूँ मै,
और मेरी जेब में क़तरा भी नहीं,
खैरियत अपनी लिखा करता हूँ,
अब तो तकदीर में ख़तरा भी नहीं।
अपने हाथों को पढ़ा करता हूँ,
कभी क़ुरान कभी गीता की तरह,
चाँद रेखाओं में सीमाओं में,
जिंदगी क़ैद है सीता की तरह,
राम कब लौटेंगे मआलूम नहीं
काश रावण ही कोई आ जाता.






1 comment:

परमजीत बाली said...

बहुत उम्दा रचना लिखी है।जिन्दगी को बहुत सही आँका है।
रोज़ बढ़ता हूँ जहाँ से आगे,
फिर वहीँ लौट के आ जाता हूँ
बारहा तोड़ चुका हूँ जिन को,
उन्हीं दीवारों से टकराता हूँ,

बहुत बढिया!!