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Saturday, August 15, 2009
ग़ज़ल- इब्ने इंशा
हम हर बुर्ज में घटते घटते सुबह तलक गुमनाम हुए।
उन लोगों की बात करो जो इश्क़ में खुश अंजाम हुए,
नज़्द में क़ैस यहाँ पर इंशा ख़्वार हुए नाकाम हुए ।
किसका चमकता चेहरा लायें,किस सूरज से मांगें धुप,
घोर अँधेरा छा जाता है,खल्वत-ए-दिल में शाम हुए।
एक से एक जुनूँ का मारा इस बस्ती में रहता है,
एक हमीं होशियार थे यारों,एक हमीं बदनाम हुए।
शौक़ की आग नफ़्स की गर्मी घटते घटते सर्द न हो?
चाह की राह दिखा कर तुम तो वक्फ़-ए-दरीच-ओ-तमाम हुए।
उन बहारों बाग़ की बातें कर के जी को दुखाना क्या?
जिन को एक ज़माना गुजरा कुञ्ज-ए-कफ़स में राम हुए।
इंशा साहब पौ फटती है, तारे डूबे,सुबह हुई,
बात तुम्हारी मान के हम तो शब् भर बे आराम रहे।
Wednesday, May 13, 2009
इंशाजी क्या बात बनेगी
इंशाजी क्या बात बनेगी,हम लोगों से दूर हुए,
हम किस दिल का रोग बने,किस सीने का नासूर हुए,
बस्ती बस्ती आग लगी थी,जलने पर मजबूर हुए,
रिन्दों में कुछ बात चली थी,शीशे चकनाचूर हुए।
लेकिन तुम क्यों बैठे बैठे आह भरे रंजूर हुए,
अब तो एक ज़माना गुज़रा,तुम से कोई क़सूर हुए।
ऐ लोगों क्यों भूली बातें याद करो,क्या याद दिलाव
काफ़िले वाले दूर गए,बुझने दो गर बुझता है अलाव.
एक मौज से रुक सकता है तूफानी दरिया का बहाव?
समय समय का राग अलग है समय समय का अपना भाव.
आस की उजड़ी फुलवारी में यादों के गुंचे न खिलाओ,
पिछले पहर के अंधियारे में काफुरी शम्में न जलाओ।
इंशाजी वही सुबह की लाली,इंशाजी वही शब् का समां,
तुम्ही ख़याल की जगर मगर में भटक रहे हों जहाँ तहां.
वही चमन वही गुल बूटे हैं,वही बहारें वही खज़ां,
इक कदम की बात है यूँ तो रूपहले खाबों का जहाँ.
लेकिन दूर उफ़क़ पर देखो लहराता घनघोर धुंवां,
बादल बादल उमड़ रहा है सहज सहज पेचां पेचां।
मंजिल दूर देखे तो राही राह में बैठा रहे सताए
हम भी तीस बरस के मांदे,यूंही रूप नगर हो आए
रूप नगर की राजकुमारी,सपनों में आए बहलाए,
क़दम क़दम पर मदमाती मुस्कान बिखेरे,हाथ न आए।
चंद्रमा महाराज की ज्योति ,तारे हैं आपस में छुपाए,
हम भी घूम रहे हैं ले कर कासा अंग भभूत रमाए,
जंगल जंगल घूम रहे हैं रमते जोगी सीस नवाए।
तुम परियों के राज दुलारे तुम ऊंचे तारों के कोई,
हम लोगों के पास यही उजड़ा अम्बर उजड़ी धरती.
तुम तो उड़न खटोले ले कर पहुँचो तारों की नगरी,
हम लोगों की रूह कमर तक धरती के दलदल में फँसी.
तुम फूलों की सेजें धुन्धो और नदिया संगीत भरी
हम पतझड़ की उजड़ी बेलें ज़र्द ,ज़र्द,उलझी,उलझी।
हम वो लोग हैं गिनते थे जिन को तुम प्यारों में,
हाल हमारा सुनते थे तो लोटते थे अंगारों में।
आज भी कितने नाग छुपे हैं,दुशमन के बमबारों में,
आते हैं नैपाम उगाते वहशी सब्ज़ जारों में ।
आह सी भर के रह जाते हो बैठ के दुनिया दारों में,
हाल हमारा छपता है जब ख़बरों में अखबारों में।
औरों की तो बातें छोडो, और तो जाने क्या क्या थे,
रुस्तम से कुछ और दिलावर,भीम से बढ़ कर योध्हा थे।
लेकिन हम भी तुंद बच्रती मौजों का इक धारा थे,
अन्याय के सूखे जंगल को झुलसाती इक ज्वाला थे।
ना हम इतने चुप चुप थे तब,ना हम इतने तनहा थे,
अपनी ज़ात में राजा थे हम,अपनी ज़ात में सेना थे।
तूफानों का रेला थे हम,बलवानों की सेना थे.
Saturday, January 24, 2009
इंशाजी- हाँ तुन्हें भी देखा
इंशाजी,हाँ,तुम्हें भी देखा,दर्शन छोटे नाम बहुत ,
चौक में खोटा माल सजा कर ले लेते हो दाम बहोत,
यूँ तो हमारे दर्द में घायल,सुबह बहोत हो शाम बहोत,
इक दिन साथ हमारा दोगे इस में हमें कलाम बहोत।
बातें जिन की गर्म बहोत हैं,काम उन्हीं के खाम बहोत,
कॉफी के हर घूँट पे, दो हांकने में आराम बहोत।
दुनिया की औकात कही,कुछ अपनी भी औकात कहो,
कब तक चाक-ऐ-दहन को सी कर गूंगी बहरी बात कहो,
दाग़-ऐ-जिगर को ला लाए रंगीं,अश्कों को बरसात कहो,
सूरज को सूरज न पुकारो,दिन को अंधी रात कहो.
हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना
हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना
वोह आज की महफ़िल में, हम को भी न पहचाना,
क्या सोच लिया दिल में, क्यों हो गया बेगाना,
हाँ, ऐ दिल-ऐ-दीवाना।
वो आप भी आते थे,हम को भी बुलाते थे,
किस चाह से मिलते थे,क्या प्यार बताते थे,
कल तक जो हक़ीक़त थी,क्यों वोह आज है अफसाना,
हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना।
बस ख़त्म हुआ किस्सा, अब ज़िक्र न हो उसका,
वो शख्स-ओ-फा-ओ-शमन,अब अपना हुआ दुश्मन,
अब उस से नहीं मिलन,
घर उस के नहीं जाना,हाँ,ऐ दिल-ऐ-दीवाना।
हाँ,कल से न जाएँगे,पर आज तो हो आएं,
उस को नहीं पा सकते,अपने ही को खो आएं,
तू बाज़ न आएगा,मुश्किल तुझ को समझाना,
वो भी तेरा कहना था,ये भी तेरा फरमाना,
चल,ऐ दिल-ऐ-दीवाना.
ख़ुद में मिला ले-इब्ने इंशा
ख़ुद में मिला ले या हम से आ मिल,
ऐ नूर-कामिल ऐ नूर-कामिल,
रोज़ अज़ल भी रिश्ता यही था
तू हम में निहाँ हम तुझ में शामिल।
हम सा रिज़ा जो ,तुम सा जफ़ा जो,
देखा न मआमूल पाया न आमिल,
दिल की ज़बान है,उस को तो समझो,
हम तुम से बोलें तेलगू न तामिल,
ऐ बेवफ़ा मिल,ऐ बेवफ़ा मिल.
Thursday, January 1, 2009
इंशाजी क्यों आशिक हो कर
इंशाजी क्यों आशिक हो कर,
दर्द के हाथों शोर करो,
दिल को और दिलासा दे लो,
मन को मियां कठोर करो।
आज हमें उस दिल की हकायत ,
दूर तलक ले जानी है,
शाख़ पे गुल है बाग़ में बुलबुल,
जी में मगर वीरानी है।
इश्क़ है रोग कहा था हम ने,
आप ने लेकिन माना भी,
इश्क़ में जी से जाते देखे, इंशा जैसे दानां भी,
हम जिस के लिए हर देस फिरे, जोगी का बदल कर भेस फिरे,
बस दिल का भरम रह जाएगा,
ये दर्द तो अच्छा कहाँ होगा.
Wednesday, December 31, 2008
जब उम्र की नकदी ख़त्म हुई-इब्ने इंशा
अब उम्र की नक़दी ख़त्म हुई
अब हम को उधार की हाजत है
है कोई जो साहूकार बने?
है कोई जो देवन हार बने ?
कुछ साल महीने दिन लोगों!
पर सूद ब्याज के बिन लोगों !
हाँ,अपनी जाँ के खजाने से,
हाँ,उम्र के तोषे खाने से,
क्या कोई भी साहूकार नहीं?
क्या कोई देवन हार नहीं ?
जब नाम उधार का आया है,
क्यों सब ने सर को झुकाया है
कुछ काम हमें निबटाने हैं,
जिन्हें जानने वाले जानें हैं।
कुछ प्यार व्यार के धंधे हैं,
कुछ जग के दूसरे फंदे हैं।
हम मांगते नहीं हज़ार बरस,
दस पाँच बरस,दो चार बरस,
हाँ,सूद ब्याज भी दे लेंगे ,
हाँ,और खराज भी दे लेंगे,
आसान बने दुश्वार बने ,
पर कोई तो देवन हार बने।
तुम कौन?तुम्हारा नाम है क्या?
कुछ हम से तुम को काम है क्या?
क्यों इस मज्मू-अ में आयी हो?
कुछ मांगती हो ? कुछ लाई हो ?
ये कारोबार की बातें हैं,
ये नक़द उधार की बातें हैं,
हम बैठे हैं कशकोल* लिए
(कशकोल-भिखापात्र)
सब उम्र की नक़दी ख़त्म किए,
गर शायर के रिश्ते आयी हो ,
तब समझो जल्द जुदाई हो।
अब गीत गया संगीत गया,
हाँ,शा-अर का मौसम बीत गया ,
अब पतझड़ आयी,पात गिरे,
कुछ सुबह गिरें,कुछ रात गिरें,
ये अपने यार पुराने हैं,
इक उम्र से हमको जानें हैं,
उन सब के पास है माल बहोत,
हाँ ! उम्र के माह-ओ-साल बहोत,
इन सब को हमने बुलाया है,
और झोली को फैलाया है,
तुम जाओ उन से बात करें,
हम तुम से न मुलाक़ात करें।
क्या पाँच बरस ?
क्या उम्र अपनी,के पाँच बरस ?
तुम जाँ की थैली लाई हो ?
क्या पागल हो ? सौदाई हो ?
जब उम्र का आख़िर आता है ,
हर दिन सदियाँ बन जाता है।
जीने की होश ही ज़ाली है,
है कौन जो इस से खाली है,
क्या मौत से पहले मरना है?
तुम को तो बहोत कुछ करना हैं,
फिर तुम हो हमारी कौन भला?
हाँ,तुम से हमारा क्या रिश्ता?
क्या सूद ब्याज लालच है ?
किसी और खराज का लालच है?
तुम सोहनी हो,मनमोहनी हो,
तुम जा कर पूरी उम्र जियो,
ये पाँच बरस,ये चार बरस,
छिन जाएँ तो लगें हज़ार बरस।
सब दोस्त गए सब यार गए,
थे जितने साहूकार गए,
बस एक ये नारी बैठी है,
ये कौन है?क्या है?कैसी है?
हाँ उम्र हमें दरकार भी है?
हाँ,जीने से हमें प्यार भी है।
जब मांगीं जीवन की घड़ियाँ,
" गुस्ताख अँखियाँ कत जलदियां "
हम क़र्ज़ तुमें लौटा देंगे,
कुछ और भी घड़ियाँ लावेंगे,
जो सा अत माह-ओ-साल नहीं,
वोह घड़ियाँ जिन को ज़वाल* नहीं
(ज़वाल- पतन,कम होना)
लो अपने जी में उतार लिया,
लो हम ने तुम से उधार लिया।
Monday, December 8, 2008
कौन चलाये मिल का पहिया
This is the most wonderful :
कौन चलाये मिल का पहिया
कौन चलाये मिल का पहिया,मेहनत वाला हैय्या हैय्या,
कौन कमाए टका रुपैया,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
कौन बिछाए ये हरया वल,कौन उगाए गेहूं चावल,
गन्ना,सरसों,तोरी,घिया,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
कौन बुने ये लट्ठा खद्दर,तहमद,कुरता,चोली,चद्दर,
कौन सभी को करे मुहैय्या, मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
अब तक जो मजलूम रहा है, दुःख जिस का मक़्सूम रहा है,
आया उस का दौर है भैय्या, मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
अपनी खेती आप ही मालिक,अपनी मिल है आप ही चालक ,
अपनी कश्ती आप खेवय्या,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
ख़त्म हुई बेगार गुलामी,आई है सरकार अवामी,
मरती है खर्कार की मैय्या,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
जागे हैं हारी बेगारी, मजदूरों की आयी बारी,
बदलेगा अब सेठ रुइय्या ,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
हम भी इन का हाथ बताएं, हम भी एन के आड़े आयें,
इंशाजी हाँ करो तिहैय्या ,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।
हम भी इन्हीं की मेहनत खाएं, आज से इनकी महिमा गाएं,
इंशाजी हाँ,करो तिहैय्या,मेहनत वाला हैय्या हैय्या।