Tuesday, August 11, 2009

फ़ैज़

हिम्मत-ए-इल्तजा नहीं बाक़ी,
सब्त का हौसला नहीं बाक़ी।

इक तेरी दीद छीन गई मुझ से,
वरना दुनिया में क्या नहीं बाक़ी।

अपनी मश्क़-ए-सितम से हाथ न खेंच,
मै नहीं या वफ़ा नहीं बाक़ी।

तेरी चश्म-ए-आलम नवाज़ की खैर,
दिल में कोई गिला नहीं बाक़ी।

हो चुका ख़त्म अहद-ए-हिज्र-ओ-विसाल,
जिंदगी में मज़ा नहीं बाक़ी।

1 comment:

Harish Karamchandani said...

ek sadabahar purasar kavita