Thursday, December 18, 2008

My Choice-इब्न-ऐ--मरियम

ये कविता,शायर ने बम्बई के माहीम इलाके के इक येशु की मूर्ती देखते हुए लिखी थी : इब्न-ऐ-मरियम (मरियम का बेटा) -------

तुम ख़ुदा हो, ख़ुदा के बेटे हो, या फ़क़त अमन के पयम्बर हो,
या किसी का हासी-ऐ-तख़य्युल हो,जो भी हो, मुझको अच्छे लगते हो,
मुझको सच्चे लगते हो।
इस सितारे में जिस में सदियों के,झूठ और कज्ब का घेरा है,
इस सितारे में जिस को हर रुख से रेंगती सरहदों ने घेरा है,
इस सितारे में जिस की आबादी,अम्न बोती है,ज़ंग काटती है,
रात पीती है नूर मुखड़ों का,सुबह सीनों का खून चाटती है,
तुम न होते जो जाने क्या होता,
तुम न होते तो इस सितारे में,
देवता,राक्षस,गुलाम,इमाम,
पार्सां,रिंद,रहजन,रहेबर,
ब्राह्मण,शैख़,पादरी,भिक्षु,
सभी होते मगर हमारे लिए,
कौन चढ़ता खुशी से सूली पर।

झोंपडियों में घिरा ये वीराना,
मछलियाँ दिन में सूखती हैं जहाँ,
बिल्लियाँ और बैठी रहती हैं,
और खारिश ज़दा से कुछ कुत्ते,
लेते रहते हैं बे मियाज़ाना
दम मरोड़े के कोई सर कुचले,काटना क्या वोह भोंकते भी नहीं।

और जब वोह दहकता अंगारा, छन् से सागर में डूब जाता है,
तीरगी ओढ़ लेती है दुनिया,कश्तियाँ कुछ किनारे आती हैं,
भंग,गांजा,चरस,शराब,अफ्लूँ, जो भी लायें जहाँ से भी लायें,
दौड़ते हैं इधर से कुछ साए, और सब कुछ उतार लाते हैं,

गाड़ी जाती है अदल की मिज़ान,जिस का हिस्सा उसी को मिलता है,
यहाँ खतरा नहीं खयानत का,तुम यहाँ क्यों खड़े हो मुद्दत से,
ये तुम्हारी थकी थकी भेडें
रात जिन को ज़मीं के सीने पर,
सुबह होते उंडेल देती है,
मंडियों,दफ्तरों,मिलों की तरफ़,
हांक देती,धकेल देती है
रास्ते में ये रुक नहीं सकती,
तोड़ के घुटने झुक नही सकती,
इन से तुम क्या तौक़ रखते हो,
भेडिया इन के साथ चलता है।

तकते रहते हो इस सड़क की तरफ़,
दफन जिस में कईं कहानियाँ हैं,
दफ़न जिस में कईं जवानियाँ हैं,
जिस पे इक साथ भागती फिरती हैं,
खाली जेबें भी और तिजोरियां भी
जाने किस का इंतज़ार है तुम्हे।

मुझ को देखो मै वही तो हूँ,
जिस को कोडों की छावों में दुनिया
बेचती भी खरीदती भी थी।
मुझ को देखो के मै वही तो हूँ,
जिस को खेतों से ऐसे बाँधा था,
जैसे मै इन का इक हिस्सा था,
खेत बिकते तो मै भी बिकता था।

मुझ को देखो के मै वही तो हूँ,
कुछ मशीनें बने जब मैंने,
उन् मशीनों के मालिकों ने मुझे,
बे-झिझक उन् में ऐसे झोंक दिया,
जैसे मै कुछ नहीं हूँ इंधन हूँ,
मुझ को देखो के मै थका हारा
फिर रहा हूँ युगों से आवारा
तुम यहाँ से हटो तो आज की रात,
सो रहूँ मै इसी चबूतरे पर
तुम यहाँ से हटो ख़ुदा के लिए

जाओ वोह विअतनाम के जंगल,
उस के मस्लूब शहर,ज़ख्मी गाँव,
जिन को इंजील पढने वालों ने,
रौंद डाला है फूँक डाला है
जाने कब से पुकारते हैं तुम्हें ।

जाओ इक बार फिर हमारे लिए
तुम को चढ़ना पडेगा सूली पर.








1 comment:

Shashwat Shekhar said...

इब्न-ए-मरियम हुआ करे कोई,
मेरे दुख की दवा करे कोई।