Wednesday, December 31, 2008

ग़ज़ल-फ़ैज़

गुलों में रंग भरे,बाद-ऐ-नौ-बहार चले,
चले भी आओ के गुलशन का कारोबार चले

कफस उदास है यारों सबा से कुछ तो कहो,
कहीं तो बहर-ऐ-खुदा आज ज़िक्र-ऐ-यार चले

कभी तो सुबह तेरे कुञ्ज-ऐ-लब से हो आगाज़,
कभी तो शब्,सर-ऐ-काकुल से मुश्क बार चले।

बड़ा है दर्द का रिश्ता ये दिल गरीब सही,
तुम्हारे नाम पे आयेंगे गमगार चले।

जो हम पे गुज़री सो गुज़री मगर शब्-ऐ-हिज्राँ,
हमारे अश्क तेरे आक़बत संवार चले।

हुज़ूर-ऐ-यार हुई दफ्तर-ऐ-जुनूं की तलब
गिरह में ले के गरीबन का तार तार चले ।

मकाम फैज़ कोई राह में जचां ही नही
जो कुए यार से निकले तो सु-ऐ-गार चले।

1 comment:

शुभम आर्य said...

नया साल आए बन के उजाला
खुल जाए आपकी किस्मत का ताला|
चाँद तारे भी आप पर ही रौशनी डाले
हमेशा आप पे रहे मेहरबान उपरवाला ||

नूतन वर्ष मंगलमय हो |