Sunday, June 14, 2009

ग़ज़ल- ग़ालिब

कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है,
अपने जी में हमने ठानी और है।

आतिश-ए-दोज़ख में ये गर्मी कहाँ?
सोज़-ए-ग़म हाए नेहानीऔर है।

बारहा देखी हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है।

दे के ख़त मुंह देखता है नामावर,
कुछ तो पैगाम-ऐ-जुबानी और है।

हो चुकीं ग़ालिब बलाएँ सब तमाम,
एक मार्ग-ऐ-ना गहानी और है।

3 comments:

ओम आर्य said...

ek sundar abhiwyakti.......padhawane ke liye shukriya

neeraj1950 said...

दे के ख़त मुंह देखता है नामावर,
कुछ तो पैगाम-ऐ-जुबानी और है।
वल्लाह क्या बात है.......
नीरज

परमजीत बाली said...

बहुत बढिया गज़ल प्रेषित की है।आभार।