ش-श
و-ओ
خ-ख़
ش+و+خ=شوخ
This is for all those who love urdu,would like to Read and write Urdu.
Wednesday, June 17, 2009
गोया एक ही बादशाह के-ग़ालिब
गोया एक ही बादशाह के सब खानजाद हैं ,
दरबारदार लोग बहम आशना नहीं,
कानों पे हाथ धरते हैं करते हुए सलाम,
इससे है ये मुराद के हम आशना नहीं।
दरबारदार लोग बहम आशना नहीं,
कानों पे हाथ धरते हैं करते हुए सलाम,
इससे है ये मुराद के हम आशना नहीं।
Tuesday, June 16, 2009
हर एक बात पे-ग़ालिब
हर एक बात पे कहते हो तुम के " तू क्या है"?
तुम्ही कहो के ये अंदाज़-ऐ-गुफ्तगू क्या है?
न शअल में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा,
कोई बताओ के वोह शोख़-ऐ-तुंदखूँ क्या है?
ये रश्क है के वोह होता है हमसुखन तुम से,
वगरना खौफ़-ऐ-बद आमोज़ी-ऐ-अदू क्या है।
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाज़त-ऐ-रफू क्या है।
जला है जिस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा!
कुरेदते हो जो अब राख जूस्तजू क्या है?
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?
वोह चीज़,जिस के लिए हमको हो बहशत अज़ीज़,
सिवाए बादः-ऐ-गुलफ़ाम-ऐ-मुश्क बू ,क्या है?
पियूं शराब,अगर खुम भी देख लूँ दो चार,
शीशा-ओ-करह-ओ-कोजः-ओ-सबू क्या है?
रही न ताक़त-ऐ-गुफ्तार,और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है!
हुआ है "शाह का मुसाहिब",फिरे है इतराता,
वगरना शहर में ग़ालिब तेरी आबरू क्या है?
बर्क़-बिजली
शोख़-चंचल,चपल।
बद आमोज़ी-अशिक्षा,कुशिक्षा।
बादः-शराब।
गुलफ़ाम-गुलाबी,खूबसूरत फूल।
मुश्कबू-कस्तूरी की महक।
कदह-जाम,प्याला।
सबू-घडा(शराब का )।
खुम-गागर,पीपा(शराब जिसमें रखी जाती है)
तुम्ही कहो के ये अंदाज़-ऐ-गुफ्तगू क्या है?
न शअल में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा,
कोई बताओ के वोह शोख़-ऐ-तुंदखूँ क्या है?
ये रश्क है के वोह होता है हमसुखन तुम से,
वगरना खौफ़-ऐ-बद आमोज़ी-ऐ-अदू क्या है।
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन,
हमारी जेब को अब हाज़त-ऐ-रफू क्या है।
जला है जिस्म जहाँ,दिल भी जल गया होगा!
कुरेदते हो जो अब राख जूस्तजू क्या है?
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं कायल,
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है?
वोह चीज़,जिस के लिए हमको हो बहशत अज़ीज़,
सिवाए बादः-ऐ-गुलफ़ाम-ऐ-मुश्क बू ,क्या है?
पियूं शराब,अगर खुम भी देख लूँ दो चार,
शीशा-ओ-करह-ओ-कोजः-ओ-सबू क्या है?
रही न ताक़त-ऐ-गुफ्तार,और अगर हो भी,
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है!
हुआ है "शाह का मुसाहिब",फिरे है इतराता,
वगरना शहर में ग़ालिब तेरी आबरू क्या है?
बर्क़-बिजली
शोख़-चंचल,चपल।
बद आमोज़ी-अशिक्षा,कुशिक्षा।
बादः-शराब।
गुलफ़ाम-गुलाबी,खूबसूरत फूल।
मुश्कबू-कस्तूरी की महक।
कदह-जाम,प्याला।
सबू-घडा(शराब का )।
खुम-गागर,पीपा(शराब जिसमें रखी जाती है)
Monday, June 15, 2009
Sunday, June 14, 2009
ग़ज़ल - ग़ालिब
कोई उम्मीद बेर नहीं आती,कोई सूरत नज़र नहीं आती।
मौत का एक दिन मुईन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती।
आगे आती थी हाल-ऐ-दिल पे हंसी,अब किसी बात पर नहीं आती।
जानता हूँ सवाब-ऐ-ताअत ओ ज़हद,पर तबीयत इधर नहीं आती।
है कुछ ऐसी ही बात के चुप हूँ,वरना क्या बात करनी नहीं आती?
क्यों न चीखूं के याद करते हैं, मेरी आवाज़ गर नहीं आती।
मौत का एक दिन मुईन है, नींद क्यों रात भर नहीं आती।
आगे आती थी हाल-ऐ-दिल पे हंसी,अब किसी बात पर नहीं आती।
जानता हूँ सवाब-ऐ-ताअत ओ ज़हद,पर तबीयत इधर नहीं आती।
है कुछ ऐसी ही बात के चुप हूँ,वरना क्या बात करनी नहीं आती?
क्यों न चीखूं के याद करते हैं, मेरी आवाज़ गर नहीं आती।
मरते हैं आरज़ू में मरने की, मौत आती है पर नहीं आती।
क़ाबा किस मुंह से जाओगे ग़ालिब ! शर्म तुमको मगर नहीं आती।
ग़ज़ल- ग़ालिब
कोई दिन गर ज़िन्दगानी और है,
अपने जी में हमने ठानी और है।
आतिश-ए-दोज़ख में ये गर्मी कहाँ?
सोज़-ए-ग़म हाए नेहानीऔर है।
बारहा देखी हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है।
दे के ख़त मुंह देखता है नामावर,
कुछ तो पैगाम-ऐ-जुबानी और है।
हो चुकीं ग़ालिब बलाएँ सब तमाम,
एक मार्ग-ऐ-ना गहानी और है।
अपने जी में हमने ठानी और है।
आतिश-ए-दोज़ख में ये गर्मी कहाँ?
सोज़-ए-ग़म हाए नेहानीऔर है।
बारहा देखी हैं उनकी रंजिशें
पर कुछ अब के सरगिरानी और है।
दे के ख़त मुंह देखता है नामावर,
कुछ तो पैगाम-ऐ-जुबानी और है।
हो चुकीं ग़ालिब बलाएँ सब तमाम,
एक मार्ग-ऐ-ना गहानी और है।
Wednesday, June 3, 2009
Nothing to do with Urdu-Its just my favourite
वृक्ष हों भले खड़े,हो घने, हो बड़े,
एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
तू न थकेगा कभी!तू न थमेगा कभी!तू न मुड़ेगा कभी!
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
ये महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत् रक्त से,लथ पथ, लथ पथ, लथ पथ !
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
एक पत्र-छॉंह भी मॉंग मत, मॉंग मत, मॉंग मत!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
तू न थकेगा कभी!तू न थमेगा कभी!तू न मुड़ेगा कभी!
कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ!
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
ये महान दृश्य है, चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत् रक्त से,लथ पथ, लथ पथ, लथ पथ !
अग्नि पथ! अग्नि पथ! अग्नि पथ!
Saturday, May 30, 2009
रात ढलने लगी है- फ़ैज़
रात ढलने लगी है सीनों में,
आग सुलगाओ आबगीनों में,
दिल-ऐ-मुश्ताक़की ख़बर लेना,
फूल खिलते हैं इन महीनों में।
आग सुलगाओ आबगीनों में,
दिल-ऐ-मुश्ताक़की ख़बर लेना,
फूल खिलते हैं इन महीनों में।
ग़म न कर ग़म न कर-फैज़
दर्द थम जाएगा,ग़म न कर,ग़म न कर,
यार लौट आयेंगे,दिल ठहर जाएगा,ग़म न कर ग़म न कर,
ज़ख्म भर जाएगा,ग़म न कर, ग़म न कर।
दिन निकल आएगा,
ग़म न कर,ग़म न कर,
अब्र खिल जाएगा,रात ढल जाएगी,
ग़म न कर,ग़म न कर
ऋत बदल जाएगी,ग़म न कर ग़म न कर.
यार लौट आयेंगे,दिल ठहर जाएगा,ग़म न कर ग़म न कर,
ज़ख्म भर जाएगा,ग़म न कर, ग़म न कर।
दिन निकल आएगा,
ग़म न कर,ग़म न कर,
अब्र खिल जाएगा,रात ढल जाएगी,
ग़म न कर,ग़म न कर
ऋत बदल जाएगी,ग़म न कर ग़म न कर.
Thursday, May 28, 2009
वासोख्तः-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
सच है हमीं को आप के शिकवे बजा न थे,
बेशक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे।
हाँ! जो जफा भी आप ने की कायदे से की,
हाँ हम ही कारबंद-ऐ-उसूल-ऐ-वफ़ा न थे।
आए तो यूँ के जैसे हमेशा थे मेहरबां,
भूले तो यूँ के गोया कभी आशना न थे।
बेशक सितम जनाब के सब दोस्ताना थे।
हाँ! जो जफा भी आप ने की कायदे से की,
हाँ हम ही कारबंद-ऐ-उसूल-ऐ-वफ़ा न थे।
आए तो यूँ के जैसे हमेशा थे मेहरबां,
भूले तो यूँ के गोया कभी आशना न थे।
शाख़ पर - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
शाख़ पर खून-ऐ-गुल रवाँ है वही,
शोखी-ऐ-रंग-गुलिस्तान है वही ।
सर वही है तो आस्तां है वही ,
जाँ वही है तो जान-ऐ-जाँ है वही।
अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई ,
कूचा-ऐ-यार मेहरबां है वही।
बरक़ सौ बार गिर के खाक हुई,
रौनक़-ऐ-खाक-ऐ-आशियाँ है वही।
आज की शब विसाल की शब है,
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही।
चाँद तारे इधर नही आते,
वरना ज़िन्दाँ में आसमान है वही .
शोखी-ऐ-रंग-गुलिस्तान है वही ।
सर वही है तो आस्तां है वही ,
जाँ वही है तो जान-ऐ-जाँ है वही।
अब जहाँ मेहरबाँ नहीं कोई ,
कूचा-ऐ-यार मेहरबां है वही।
बरक़ सौ बार गिर के खाक हुई,
रौनक़-ऐ-खाक-ऐ-आशियाँ है वही।
आज की शब विसाल की शब है,
दिल से हर रोज़ दास्ताँ है वही।
चाँद तारे इधर नही आते,
वरना ज़िन्दाँ में आसमान है वही .
Tuesday, May 26, 2009
Complete works of Faiz Ahmed Faiz
It was the one of those eveings during Ramzaan,Me alongwith with my few other foody friends,
went to bhedi baazaar in Mumbai,we tried street food and the famous "Barah handi" situated
in a thinly street next to Badshah juice shop in Crawford market,however this post is not about the food adventure,I found in Bhedi bazaar the most amazing shop where i found complete works of Faiz,Mirza Ghalib and many others.It was a pleasant surprise,I was a real armature then and i haven't taken big leaps in Urdu studies however the joy to find such books on really affordable prices made me happy.
I wrote this post when i read posts from people who were not able to find these works and if one needs to find the complete works,He can visit Bhedi bazaar in Mumbai,These books are available at Usmania book store at Muhammad Ali Road.
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नौह-फैज़ अहमद फ़ैज़
मुझे शिकवा है मेरे भाई के तुम जाते हुए,
ले गए साथ मेरी उम्र-ऐ-गुज़िश्ता की किताब ,
उसमें तो मेरी बहोत कीमती तस्वीरें थीं,
उसमें बचपन था मेरा और मेरा अहद-ऐ-शबाब,
उस के बदले मुझे तुम दे गए जाते जाते,
अपने गम का ये दमकता हुआ खूँ रंग गुलाब,
क्या करून भाई ! ये ऐज़ाज़ में क्यों न कर पहनूं,
मुझ से ले लो मेरी सब चाक कमीज़ों का हिसाब,
आखरी बार है! लो मान लो इक ये भी सवाल,
आज तक तुम से मई लौटा नहीं मायूस जवाब,
आ के ले जाओ तुम अपना ये दमकता हुआ फूल,
मुझको लौटा दो मेरी उम्र-ऐ-गुज़िश्ता की किताब।
ले गए साथ मेरी उम्र-ऐ-गुज़िश्ता की किताब ,
उसमें तो मेरी बहोत कीमती तस्वीरें थीं,
उसमें बचपन था मेरा और मेरा अहद-ऐ-शबाब,
उस के बदले मुझे तुम दे गए जाते जाते,
अपने गम का ये दमकता हुआ खूँ रंग गुलाब,
क्या करून भाई ! ये ऐज़ाज़ में क्यों न कर पहनूं,
मुझ से ले लो मेरी सब चाक कमीज़ों का हिसाब,
आखरी बार है! लो मान लो इक ये भी सवाल,
आज तक तुम से मई लौटा नहीं मायूस जवाब,
आ के ले जाओ तुम अपना ये दमकता हुआ फूल,
मुझको लौटा दो मेरी उम्र-ऐ-गुज़िश्ता की किताब।
हमारे दम से है-फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
हमारे दम से है कू-ऐ-जुनूँ में अब भी खजल,
अबा-ऐ-शेख़ क़बा-ऐ-अमीर-ओ-ताज-ऐ-शही।
हमीं से सुन्नत-ऐ-मंसूर-ओ-कैस जिंदा है,
हमीं से बाकी है गुल-दामनी -ओ-कजकुलही ।
अबा-ऐ-शेख़ क़बा-ऐ-अमीर-ओ-ताज-ऐ-शही।
हमीं से सुन्नत-ऐ-मंसूर-ओ-कैस जिंदा है,
हमीं से बाकी है गुल-दामनी -ओ-कजकुलही ।
Monday, May 25, 2009
न पूछ- फ़ैज़ अहमद फ़ैज़
न पूछ जब से तेरा इंतज़ार कितना है,
के जिन दिनों से मुझे तेरा इंतज़ार नहीं।
तेरा ही अक्स है उन अजनबी बहारों में,
जो तेरे लब,तेरे बाज़ू,तेरा किनार नहीं।
के जिन दिनों से मुझे तेरा इंतज़ार नहीं।
तेरा ही अक्स है उन अजनबी बहारों में,
जो तेरे लब,तेरे बाज़ू,तेरा किनार नहीं।
लोह-ओ-कलम-फ़ैज़
हम परवरिश-ऐ-लोह-ओ-कलम करते रहेंगे,
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे।
असबाब-ऐ-ग़म -ऐ-अश्क़ बहम करते रहेंगे,
वीरानी-ऐ-दौराँ पे करम करते रहेंगे।
हाँ! तल्खी-ऐ अय्याम अभी और बढेगी,
हाँ! अहल-ऐ-सितम मश्क-ऐ-सितम करते रहेगी।
मन्ज़ूर ये तल्खी, ये सितम हमको गवारा,
दम है तो मुद्दवाले अलम करते रहेंगे।
मैखाना सलामत है तो हम सुर्खी-ऐ-मय से,
तज़इन दर-ओ-बाम-ऐ-हरम करते रहेंगे।
बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क़ से पैदा,
रंग-ऐ-लब-ओ-रुख़सार-ऐ-सनम करते रहेंगे।
इक तर्ज़-ऐ-तगाफ़ुल है सो वो अम्न को मुबारक,
इक अर्ज़-ऐ-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे।
जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे।
असबाब-ऐ-ग़म -ऐ-अश्क़ बहम करते रहेंगे,
वीरानी-ऐ-दौराँ पे करम करते रहेंगे।
हाँ! तल्खी-ऐ अय्याम अभी और बढेगी,
हाँ! अहल-ऐ-सितम मश्क-ऐ-सितम करते रहेगी।
मन्ज़ूर ये तल्खी, ये सितम हमको गवारा,
दम है तो मुद्दवाले अलम करते रहेंगे।
मैखाना सलामत है तो हम सुर्खी-ऐ-मय से,
तज़इन दर-ओ-बाम-ऐ-हरम करते रहेंगे।
बाक़ी है लहू दिल में तो हर अश्क़ से पैदा,
रंग-ऐ-लब-ओ-रुख़सार-ऐ-सनम करते रहेंगे।
इक तर्ज़-ऐ-तगाफ़ुल है सो वो अम्न को मुबारक,
इक अर्ज़-ऐ-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे।
Friday, May 22, 2009
तराना- फ़ैज़
दरबार-ऐ-वतन में जब एक दिन सब जाने वाले जायेंगे,
कुछ अपनी सज़ा को पहोचेंगे कुछ अपनी जज़ाले जायेंगे।
ऐ खाक़नशीनों उठ बैठो वोह वक़्त क़रीब आ पहुँचा है
जब तख्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे।
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िन्दानोंकी ख़ैर नहीं,
जो दरया झूम के उठ्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएंगे।
कटते भी चलो,बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहोत हैं सर भी बहोत,
चलते भी चलो के अब डेरे,मंज़िलपे ही डाले जायेंगे ।
ऐ ज़ुल्म के मातों लब खोलो चुप रहने वालों चुप कब तक
कुछ हश्र तो उनसे उठ्ठेगा,कुछ दूर तो नाले जायेंगे।
कुछ अपनी सज़ा को पहोचेंगे कुछ अपनी जज़ाले जायेंगे।
ऐ खाक़नशीनों उठ बैठो वोह वक़्त क़रीब आ पहुँचा है
जब तख्त गिराए जाएँगे जब ताज उछाले जाएँगे।
अब टूट गिरेंगी ज़ंजीरें अब ज़िन्दानोंकी ख़ैर नहीं,
जो दरया झूम के उठ्ठे हैं तिनकों से न टाले जाएंगे।
कटते भी चलो,बढ़ते भी चलो बाज़ू भी बहोत हैं सर भी बहोत,
चलते भी चलो के अब डेरे,मंज़िलपे ही डाले जायेंगे ।
ऐ ज़ुल्म के मातों लब खोलो चुप रहने वालों चुप कब तक
कुछ हश्र तो उनसे उठ्ठेगा,कुछ दूर तो नाले जायेंगे।
Thursday, May 21, 2009
Wednesday, May 20, 2009
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं- ग़ज़ल-फ़ैज़
दिल में अब यूँ तेरे भूले हुए ग़म आते हैं,
जैसे बिछडे हुए काबे में सनम आते हैं।
एक एक करके हुए जाते है तारे रोशन,
मेरी मंज़िलकी तरफ़ तेरे क़दम आते हैं।
रक़्स-ऐ-मय तेज़ करो साज़ की लय तेज़ करो ,
सू-ऐ-मैखाना सफीरान-ऐ-हरम आते हैं।
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने काम दिमाग़
वो तो जब आते हैं माइल ब करम आते हैं।
और कुछ देर न गुज़रे शब्-ऐ-फुरकत से कहो ,
दिल भी कम दुखता है,वो याद भी कम आते हैं।
सफीरान-दूत,नामावर,संदेश वाहक .
हरम - काबा,ख़ुदा का घर
सू-ऐ-मैखाना-मैखाने की तरफ,मैखाने की ओर।
माइल ब करम-कृपालू,कृपादृष्टि दिखाने की दृष्टी।
जैसे बिछडे हुए काबे में सनम आते हैं।
एक एक करके हुए जाते है तारे रोशन,
मेरी मंज़िलकी तरफ़ तेरे क़दम आते हैं।
रक़्स-ऐ-मय तेज़ करो साज़ की लय तेज़ करो ,
सू-ऐ-मैखाना सफीरान-ऐ-हरम आते हैं।
कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने काम दिमाग़
वो तो जब आते हैं माइल ब करम आते हैं।
और कुछ देर न गुज़रे शब्-ऐ-फुरकत से कहो ,
दिल भी कम दुखता है,वो याद भी कम आते हैं।
सफीरान-दूत,नामावर,संदेश वाहक .
हरम - काबा,ख़ुदा का घर
सू-ऐ-मैखाना-मैखाने की तरफ,मैखाने की ओर।
माइल ब करम-कृपालू,कृपादृष्टि दिखाने की दृष्टी।
This is how i start
Let me discribe here the way i learnt the language.I must clarify that i'm still not the master of the language and that was because i didn't persuade it with devotion.This subject however,can be discussed later but i must specify that my intention of starting the blog is to make people aware of the script and make the study as easy as not to get intimated by the script.
The concept here is that if you know hindi grammer,you would know urdu as well.Once you start getting hang of the scrpit and the way its read and written,everything else depend upon how viciously one would persuade the study.Let me come back to how i started.
I baught a book "Daag ki Shaayari" which was a collection of poems by Daagh Dehlvi,It had
the poems in urdu on one side and same in devnagri scrpit on other with explaination for difficult words.I tried comparing and kept an alpabet guide with me,I started writing the words with the help of the guide and found joining the alphabets to form a word was a difficult part.The alphabets changed their appearence once they became part of the words.
The letter ن which is "N" or "न " changed its appearance once an آ was connected to it and became نا
Lets see how "i" or "इ" changes its apperaence:
غ+آ+ل+ی+ب =غالیب
Did you notice how "इ " changed its appearence to two small dots and a curve connecting "ल " and "ब".
By the way the word you just learnt is "ग़ालिब "-Takhallus used by undisputed King of Urdu poetry Mirza Asadullah Khan.
The concept here is that if you know hindi grammer,you would know urdu as well.Once you start getting hang of the scrpit and the way its read and written,everything else depend upon how viciously one would persuade the study.Let me come back to how i started.
I baught a book "Daag ki Shaayari" which was a collection of poems by Daagh Dehlvi,It had
the poems in urdu on one side and same in devnagri scrpit on other with explaination for difficult words.I tried comparing and kept an alpabet guide with me,I started writing the words with the help of the guide and found joining the alphabets to form a word was a difficult part.The alphabets changed their appearence once they became part of the words.
The letter ن which is "N" or "न " changed its appearance once an آ was connected to it and became نا
Lets see how "i" or "इ" changes its apperaence:
غ+آ+ل+ی+ب =غالیب
Did you notice how "इ " changed its appearence to two small dots and a curve connecting "ल " and "ब".
By the way the word you just learnt is "ग़ालिब "-Takhallus used by undisputed King of Urdu poetry Mirza Asadullah Khan.
Saturday, May 16, 2009
रंग-ऐ-पैराहन-फ़ैज़
रंग-ऐ-पैराहन का,खुशबू-ऐ-ज़ुल्फ़ लहराने का नाम,
मौसम-ऐ-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम।
दोस्तों,उस चश्म-ओ-लब की कहो जिसके बगैर,
गुलिस्तान की बात रंगीं है न मैखाने का नाम।
फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शम्में जलीं,
फिर तसव्वुर ने किया उस बज़्म में जाने का नाम।
मौसम-ऐ-गुल है तुम्हारे बाम पर आने का नाम।
दोस्तों,उस चश्म-ओ-लब की कहो जिसके बगैर,
गुलिस्तान की बात रंगीं है न मैखाने का नाम।
फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शम्में जलीं,
फिर तसव्वुर ने किया उस बज़्म में जाने का नाम।
नज़राना-कैफ़ी आज़मी
तुम परेशां न हो बाब-ऐ-करम वाँ न करो ,
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊंगा
इस कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं ,शब्-ऐ-तारीक़ गुजारूँगा, चला जाऊँगा।
रास्ता भूल गया या यही मंजिल है मेरी,
कोई लाया है के ख़ुद आया हूँ मालूम नहीं
कहते हैं हुस्न की नज़रें भी हसीं होती हैं
मै भी कुछ लाया हूँ, क्या लाया हूँ मालूम नहीं ।
यूँ तो जो कुछ भी था मेरे पास मै सब बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं कीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रखा है
देख लो , और न देखो तो शिकायत भी नहीं।
एक तो इतनी हसीं दूसरे ये आराइश ,
जो नज़र पड़ती है चेहरे पे ठहर जाती है,
मुस्कुरा देती हो अगर रस्मन भी कभी महफिल में
एक धनक टूट के सीने में बिखर जाती है।
गर्म बोसों से तराशा हुआ नाज़ुक पैकर,
जिसकी इक आंच से हर रूह पिघल जाती है,
मैंने सोचा है तो सब सोचते होंगे शायद,
प्यास इस तरह भी क्या सांचे में ढल जाती है।
क्या कमी है जो करोगी मेरा नजराना कबूल,
चाहने वाले बहोत चाह के अफ़साने बहोत,
एक ही रात सही गर्मी-ऐ-हंगाम-ऐ-इश्क़,
एक ही रात में जल मरते हैं परवाने बहोत।
फिर भी एक रात में सौ तरह के मोड़ आते हैं,
काश तुमको कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो घेरे रहे दुनिया तुम को,
और इस तरह की जिस तरह कोई पास न हो।
आज की रात जो मेरी ही तरह तनहा है
मै किसी तरह गुजारूँगा, चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ऐ-करम-वाँ न करो
और कुछ देर पुकारूँगा,चला जाऊंगा।
और कुछ देर पुकारूँगा चला जाऊंगा
इस कूचे में जहाँ चाँद उगा करते हैं ,शब्-ऐ-तारीक़ गुजारूँगा, चला जाऊँगा।
रास्ता भूल गया या यही मंजिल है मेरी,
कोई लाया है के ख़ुद आया हूँ मालूम नहीं
कहते हैं हुस्न की नज़रें भी हसीं होती हैं
मै भी कुछ लाया हूँ, क्या लाया हूँ मालूम नहीं ।
यूँ तो जो कुछ भी था मेरे पास मै सब बेच आया
कहीं इनाम मिला और कहीं कीमत भी नहीं
कुछ तुम्हारे लिए आंखों में छुपा रखा है
देख लो , और न देखो तो शिकायत भी नहीं।
एक तो इतनी हसीं दूसरे ये आराइश ,
जो नज़र पड़ती है चेहरे पे ठहर जाती है,
मुस्कुरा देती हो अगर रस्मन भी कभी महफिल में
एक धनक टूट के सीने में बिखर जाती है।
गर्म बोसों से तराशा हुआ नाज़ुक पैकर,
जिसकी इक आंच से हर रूह पिघल जाती है,
मैंने सोचा है तो सब सोचते होंगे शायद,
प्यास इस तरह भी क्या सांचे में ढल जाती है।
क्या कमी है जो करोगी मेरा नजराना कबूल,
चाहने वाले बहोत चाह के अफ़साने बहोत,
एक ही रात सही गर्मी-ऐ-हंगाम-ऐ-इश्क़,
एक ही रात में जल मरते हैं परवाने बहोत।
फिर भी एक रात में सौ तरह के मोड़ आते हैं,
काश तुमको कभी तन्हाई का एहसास न हो
काश ऐसा न हो घेरे रहे दुनिया तुम को,
और इस तरह की जिस तरह कोई पास न हो।
आज की रात जो मेरी ही तरह तनहा है
मै किसी तरह गुजारूँगा, चला जाऊंगा
तुम परेशां न हो बाब-ऐ-करम-वाँ न करो
और कुछ देर पुकारूँगा,चला जाऊंगा।
Friday, May 15, 2009
रहिये अब ऐसी जगह-ग़ालिब
रहिए अब ऐसी जगह चल कर जहाँ कोई न हो,
हम सुखन कोई न हो और हम ज़बां कोई न हो।
बे दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए,
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो बीमार दार,
और अगर मर जाएँ तो नोचख्वां कोई न हो।
हम सुखन कोई न हो और हम ज़बां कोई न हो।
बे दर-ओ-दीवार सा इक घर बनाया चाहिए,
कोई हमसाया न हो और पासबाँ कोई न हो।
पड़िये गर बीमार तो कोई न हो बीमार दार,
और अगर मर जाएँ तो नोचख्वां कोई न हो।
Thursday, May 14, 2009
गई वो बात के - ग़ालिब
गयी वोह बात के हो गुफ्तगू "तो क्यों कर हो"
कहे से कुछ न हुआ , फिर हो ,तो क्यों कर हो ?
हमारे ज़हन में इस फ़िक्र का है नाम विसाल ,
के गरन हो तो कहाँ जाएँ, हो तो क्यों कर हो?
अदब है और यही कशमकश तो क्या कीजे,
हया है और यही गोमगो तो क्यों कर हो?
तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का,
बुतों की हो अगर ऐसी ही खु तो क्यों कर हो?
उलझते हो तुम अगर देखते हो आइना,
जो तुम से शहर में हों एक,दो,तो क्यों कर हो?
जिसे नसीब हो रोज़-ऐ-स्याह मेरा सा
वो शख्स दिन न कहे रात को,तो क्यों कर हो?
हमें फिर उन से उम्मीद, और उन्हें हमारी क़द्र!
हमारी बात ही पूछें न वो तो क्यों कर हो?
गल्त न था हमें ख़त पर गुमाँ तसल्ली का,
न माने दीद-ओ-दीदार जो, तो क्यों कर हो?
मुझे जुनूँ नहीं ग़ालिब! वले बकौल-ऐ-हुज़ूर,
फिराक-ऐ-यार में तस्कीँ हो,तो क्यों कर हो?
कहे से कुछ न हुआ , फिर हो ,तो क्यों कर हो ?
हमारे ज़हन में इस फ़िक्र का है नाम विसाल ,
के गरन हो तो कहाँ जाएँ, हो तो क्यों कर हो?
अदब है और यही कशमकश तो क्या कीजे,
हया है और यही गोमगो तो क्यों कर हो?
तुम्हीं कहो के गुज़ारा सनम परस्तों का,
बुतों की हो अगर ऐसी ही खु तो क्यों कर हो?
उलझते हो तुम अगर देखते हो आइना,
जो तुम से शहर में हों एक,दो,तो क्यों कर हो?
जिसे नसीब हो रोज़-ऐ-स्याह मेरा सा
वो शख्स दिन न कहे रात को,तो क्यों कर हो?
हमें फिर उन से उम्मीद, और उन्हें हमारी क़द्र!
हमारी बात ही पूछें न वो तो क्यों कर हो?
गल्त न था हमें ख़त पर गुमाँ तसल्ली का,
न माने दीद-ओ-दीदार जो, तो क्यों कर हो?
मुझे जुनूँ नहीं ग़ालिब! वले बकौल-ऐ-हुज़ूर,
फिराक-ऐ-यार में तस्कीँ हो,तो क्यों कर हो?
मेहरबां हो के-ग़ालिब
मेहरबां हो के बुला लो मुझे,चाहो जिस वक़्त,
मै गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूं ।
दअफ़ में ताना-ग़यारक्या शिकवा क्या है?
बात कुछ सर तो नहीं है के उठा भी न सकूं
ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर ! वरना
क्या क़सम है तेरे मिलने की के खा भी न सकूं ।
मै गया वक़्त नहीं हूँ के फिर आ भी न सकूं ।
दअफ़ में ताना-ग़यारक्या शिकवा क्या है?
बात कुछ सर तो नहीं है के उठा भी न सकूं
ज़हर मिलता ही नहीं मुझको सितमगर ! वरना
क्या क़सम है तेरे मिलने की के खा भी न सकूं ।
Wednesday, May 13, 2009
इंशाजी क्या बात बनेगी
इंशाजी क्या बात बनेगी,हम लोगों से दूर हुए,
हम किस दिल का रोग बने,किस सीने का नासूर हुए,
बस्ती बस्ती आग लगी थी,जलने पर मजबूर हुए,
रिन्दों में कुछ बात चली थी,शीशे चकनाचूर हुए।
लेकिन तुम क्यों बैठे बैठे आह भरे रंजूर हुए,
अब तो एक ज़माना गुज़रा,तुम से कोई क़सूर हुए।
ऐ लोगों क्यों भूली बातें याद करो,क्या याद दिलाव
काफ़िले वाले दूर गए,बुझने दो गर बुझता है अलाव.
एक मौज से रुक सकता है तूफानी दरिया का बहाव?
समय समय का राग अलग है समय समय का अपना भाव.
आस की उजड़ी फुलवारी में यादों के गुंचे न खिलाओ,
पिछले पहर के अंधियारे में काफुरी शम्में न जलाओ।
इंशाजी वही सुबह की लाली,इंशाजी वही शब् का समां,
तुम्ही ख़याल की जगर मगर में भटक रहे हों जहाँ तहां.
वही चमन वही गुल बूटे हैं,वही बहारें वही खज़ां,
इक कदम की बात है यूँ तो रूपहले खाबों का जहाँ.
लेकिन दूर उफ़क़ पर देखो लहराता घनघोर धुंवां,
बादल बादल उमड़ रहा है सहज सहज पेचां पेचां।
मंजिल दूर देखे तो राही राह में बैठा रहे सताए
हम भी तीस बरस के मांदे,यूंही रूप नगर हो आए
रूप नगर की राजकुमारी,सपनों में आए बहलाए,
क़दम क़दम पर मदमाती मुस्कान बिखेरे,हाथ न आए।
चंद्रमा महाराज की ज्योति ,तारे हैं आपस में छुपाए,
हम भी घूम रहे हैं ले कर कासा अंग भभूत रमाए,
जंगल जंगल घूम रहे हैं रमते जोगी सीस नवाए।
तुम परियों के राज दुलारे तुम ऊंचे तारों के कोई,
हम लोगों के पास यही उजड़ा अम्बर उजड़ी धरती.
तुम तो उड़न खटोले ले कर पहुँचो तारों की नगरी,
हम लोगों की रूह कमर तक धरती के दलदल में फँसी.
तुम फूलों की सेजें धुन्धो और नदिया संगीत भरी
हम पतझड़ की उजड़ी बेलें ज़र्द ,ज़र्द,उलझी,उलझी।
हम वो लोग हैं गिनते थे जिन को तुम प्यारों में,
हाल हमारा सुनते थे तो लोटते थे अंगारों में।
आज भी कितने नाग छुपे हैं,दुशमन के बमबारों में,
आते हैं नैपाम उगाते वहशी सब्ज़ जारों में ।
आह सी भर के रह जाते हो बैठ के दुनिया दारों में,
हाल हमारा छपता है जब ख़बरों में अखबारों में।
औरों की तो बातें छोडो, और तो जाने क्या क्या थे,
रुस्तम से कुछ और दिलावर,भीम से बढ़ कर योध्हा थे।
लेकिन हम भी तुंद बच्रती मौजों का इक धारा थे,
अन्याय के सूखे जंगल को झुलसाती इक ज्वाला थे।
ना हम इतने चुप चुप थे तब,ना हम इतने तनहा थे,
अपनी ज़ात में राजा थे हम,अपनी ज़ात में सेना थे।
तूफानों का रेला थे हम,बलवानों की सेना थे.
Tuesday, May 12, 2009
ग़ालिब
दाइम पड़ा हुआ तेरे दर पर नहीं हूँ मै,
खाक ऐसी जिंदगी पे के पत्थर नहीं हूँ मै ।
क्यों गर्दिश-ऐ-मुद्दाम से घबरा न जाए दिल ?
इंसान हूँ,प्याला-ओ-सागर नहीं हूँ मै।
या रब! ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए?
लोह-ऐ-जहाँ पे हर्फ़-ऐ-मुकद्दर नहीं हूँ मै।
हद चाहिए सज़ा में अकूबत के वास्ते,
आख़िर गुनाहगार हूँ,काफिर नहीं हूँ मै।
किस वास्ते अज़ीज़ नहीं जानते मुझे,
लाल-ओ-ज़म्रद-ओ-ज़ेर-ओ-गौहर नहीं हूँ मै।
रखते हो तुम क़दम मेरी आंखों से क्यों दरेग़,
रुतबे में महरो माह से कमतर नहीं हूँ मै
करते हो मुझको मना क़दमबोस किस लिए?
क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मै?
ग़ालिब ! वज़ीफ़ख्वार हूँ ,दूँ शाह को दुआ,
वोह दिन गए के कहते थे " नौकर नहीं हूँ मै"
दाइम -हमेशा,निरंतर।
गर्दिश-ऐ-मुद्दाम-निरंतर बदकिस्मती।
हर्फ़-अक्षर,लिखा हुआ।
अकूबत-दर्द।
काफिर-नास्तिक,न मानने वाला।
ज़म्रद-पन्ना।
ज़ेर-सोना।
गौहर-मोती।
दरेग़-दूर जाना,पल्ला झाड़ना।
क़दमबोस-पैर चूमना।
खाक ऐसी जिंदगी पे के पत्थर नहीं हूँ मै ।
क्यों गर्दिश-ऐ-मुद्दाम से घबरा न जाए दिल ?
इंसान हूँ,प्याला-ओ-सागर नहीं हूँ मै।
या रब! ज़माना मुझ को मिटाता है किस लिए?
लोह-ऐ-जहाँ पे हर्फ़-ऐ-मुकद्दर नहीं हूँ मै।
हद चाहिए सज़ा में अकूबत के वास्ते,
आख़िर गुनाहगार हूँ,काफिर नहीं हूँ मै।
किस वास्ते अज़ीज़ नहीं जानते मुझे,
लाल-ओ-ज़म्रद-ओ-ज़ेर-ओ-गौहर नहीं हूँ मै।
रखते हो तुम क़दम मेरी आंखों से क्यों दरेग़,
रुतबे में महरो माह से कमतर नहीं हूँ मै
करते हो मुझको मना क़दमबोस किस लिए?
क्या आसमान के भी बराबर नहीं हूँ मै?
ग़ालिब ! वज़ीफ़ख्वार हूँ ,दूँ शाह को दुआ,
वोह दिन गए के कहते थे " नौकर नहीं हूँ मै"
दाइम -हमेशा,निरंतर।
गर्दिश-ऐ-मुद्दाम-निरंतर बदकिस्मती।
हर्फ़-अक्षर,लिखा हुआ।
अकूबत-दर्द।
काफिर-नास्तिक,न मानने वाला।
ज़म्रद-पन्ना।
ज़ेर-सोना।
गौहर-मोती।
दरेग़-दूर जाना,पल्ला झाड़ना।
क़दमबोस-पैर चूमना।
Monday, May 11, 2009
हम पर तुम्हारी चाह का- फ़ैज़
हम पर तुम्हारी चाह का इल्ज़ामही तो है दुश्नाम तो नही है ये इकराम ही तो है।
करते हैं जिस पे तआना कोई जुर्म तो नहीं,शौक-ऐ-फिज़ूल उल्फ़त-ऐ-नाकाम ही तो है।
दिल मुद्दईके हर्फ़-ऐ-मलामत से शाद है, ऐ जानेजां ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है।
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-तकदीर तो नहीं,दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-अय्याम ही तो है।
आख़िर तू एक रोज़ करेगी नज़र-ऐ-वफ़ा,वोह यार खुश-ख़सालसर-ऐ-बाम ही तो है।
भीगी है रात फैज़ ग़ज़ल इब्तदा करो,वक़्त-ऐ-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है।
करते हैं जिस पे तआना कोई जुर्म तो नहीं,शौक-ऐ-फिज़ूल उल्फ़त-ऐ-नाकाम ही तो है।
दिल मुद्दईके हर्फ़-ऐ-मलामत से शाद है, ऐ जानेजां ये हर्फ़ तेरा नाम ही तो है।
दिल नाउम्मीद तो नहीं नाकाम ही तो है,लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है।
दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-तकदीर तो नहीं,दस्त-ऐ-फलक में गर्दिश-ऐ-अय्याम ही तो है।
आख़िर तू एक रोज़ करेगी नज़र-ऐ-वफ़ा,वोह यार खुश-ख़सालसर-ऐ-बाम ही तो है।
भीगी है रात फैज़ ग़ज़ल इब्तदा करो,वक़्त-ऐ-सरोद दर्द का हंगाम ही तो है।
- दुष्नाम-गाली
- इकराम-ईनाम
- उल्फ़त-प्यार
- मुद्दई-दुश्मन
- अय्याम-कुछ वक़्त ,कुछ दिन।
- हंगाम-वक़्त
Wednesday, May 6, 2009
जौहर
जौहर
मै शोला था------मगर यूँ राख के तूदे ने सर कुचला,
के इक सिले से पेंच ओ ख़म में ढल जाना पड़ा मुझको।
मै बिजली था------मगर वोह बर्फ आ गयी बदलियाँ छाईं ,
के दब के उन चट्टानों में पिघल जन पड़ा मुझको।
मै तूफ़ान था------मगर क्या कहें उस तशन समंदर को,
के सर टकरा के साहिल ही से रुक जाना पड़ा मुझको।
मै आंधी था-मगर वोह खाव्ब आलूदा फिजा पायी,
के ख़ुद अपनी ही ठोकर खा के झुक जाना पड़ा मुझको।
मगर अब इस का रोना क्या है, क्या था देखिये क्या हूँ!
मै इक ठिठुरा हुआ शआला हूँ,इक सिकुडी हुई बिजली,
अशर नश्व ओ नुमा पर डाल ही देता है गहवारा ,
मै इक सिमटा हुआ तूफ़ान हूँ,एक सहमी हुई आंधी।
मगर म्आबूद बेदारी ! कहिए,फितरत बदलती है,
धुवें को गर्म होने दे,भड़कना अब भी आता है,
मेरी जानिब से इत्मीनान रख आतिश-ऐ-नूर-ऐ-रहबर,
ज़रा बादल तो बिखराएं,कड़कना अब भी आता है।
थपेडे हाँ यूँहीं पैहम,थपेडे मौज-ऐ-आज़ादी,
बहा दूँगा मताअ कश्ती-ऐ-महकूमी बहा दूँगा,
झकोले हाँ यही झकोले सर सर-ऐ-हस्ती,
हिला दूँगा तदाद-ऐ- ज़िस्त की चूली हिला दूँगा।
मै शोला था------मगर यूँ राख के तूदे ने सर कुचला,
के इक सिले से पेंच ओ ख़म में ढल जाना पड़ा मुझको।
मै बिजली था------मगर वोह बर्फ आ गयी बदलियाँ छाईं ,
के दब के उन चट्टानों में पिघल जन पड़ा मुझको।
मै तूफ़ान था------मगर क्या कहें उस तशन समंदर को,
के सर टकरा के साहिल ही से रुक जाना पड़ा मुझको।
मै आंधी था-मगर वोह खाव्ब आलूदा फिजा पायी,
के ख़ुद अपनी ही ठोकर खा के झुक जाना पड़ा मुझको।
मगर अब इस का रोना क्या है, क्या था देखिये क्या हूँ!
मै इक ठिठुरा हुआ शआला हूँ,इक सिकुडी हुई बिजली,
अशर नश्व ओ नुमा पर डाल ही देता है गहवारा ,
मै इक सिमटा हुआ तूफ़ान हूँ,एक सहमी हुई आंधी।
मगर म्आबूद बेदारी ! कहिए,फितरत बदलती है,
धुवें को गर्म होने दे,भड़कना अब भी आता है,
मेरी जानिब से इत्मीनान रख आतिश-ऐ-नूर-ऐ-रहबर,
ज़रा बादल तो बिखराएं,कड़कना अब भी आता है।
थपेडे हाँ यूँहीं पैहम,थपेडे मौज-ऐ-आज़ादी,
बहा दूँगा मताअ कश्ती-ऐ-महकूमी बहा दूँगा,
झकोले हाँ यही झकोले सर सर-ऐ-हस्ती,
हिला दूँगा तदाद-ऐ- ज़िस्त की चूली हिला दूँगा।
- अशर-दुष्ट
- गहवारा-पलना,झूला।
- नश्व ओ नुमा-पालनपोषण
- म्आबूद-खुदा,परमेश्वर।
- बेदारी-जागृति,कृपा।
- पैहम-निरंतर
- मताअ-सम्पत्ती।
- महकूमी-गुलामी।
- तदाद-दुश्मनी।
- चूली-डरपोकपन,नामर्दगी।
- ज़िस्त-अस्तित्व,जिंदगी.
Tuesday, May 5, 2009
नाक़िस भारती
हुआ जब इलेक्शन का सूरज तलूअ,हुई लीग में आम भर्ती शुरू ,
निकाले हुए फिर बुलाए गए,दगाबाज़ सर पर बिठाए गए,
बहुत दिन से था दिल में ये पेंच ओ ताब,
मिले खिद्र का कोई बढ़िया जवाब ,
जो इतना ही भारी ज़मींदार हो,जो ऐसा ही महबूब सरकार हो,
पडी नून पर जब लीग की नज़र,गले से लगा ही लिया दौड़ कर।
"चमकदार कीडा जो भाया उसे,तो टोपी में झट पट छिपाया उसे "
Malik Sir Feroz Khan Noon was high commissioner of india to the united kingdom during 1936-1941 and seventh prime minister of Pakistan,The post here discribes the opportunistic move by Muslim League when it picked Noon from government service and appointed him in higher ranks of the party.In 1947,Noon was sent as Quaid-i-Azam Muhammad Ali Jinnah's special envoy to some countries of the Muslim world. This one-man delegation was the first official mission sent abroad by the Pakistani government.
निकाले हुए फिर बुलाए गए,दगाबाज़ सर पर बिठाए गए,
बहुत दिन से था दिल में ये पेंच ओ ताब,
मिले खिद्र का कोई बढ़िया जवाब ,
जो इतना ही भारी ज़मींदार हो,जो ऐसा ही महबूब सरकार हो,
पडी नून पर जब लीग की नज़र,गले से लगा ही लिया दौड़ कर।
"चमकदार कीडा जो भाया उसे,तो टोपी में झट पट छिपाया उसे "
Malik Sir Feroz Khan Noon was high commissioner of india to the united kingdom during 1936-1941 and seventh prime minister of Pakistan,The post here discribes the opportunistic move by Muslim League when it picked Noon from government service and appointed him in higher ranks of the party.In 1947,Noon was sent as Quaid-i-Azam Muhammad Ali Jinnah's special envoy to some countries of the Muslim world. This one-man delegation was the first official mission sent abroad by the Pakistani government.
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